भारतकोश
तर्कसंग्रह एवं न्यायबोधिनी (अन्नम्भट्ट - पं. केदारनाथ त्रिपाठी सान्वय सटीक)

तर्कसंग्रह एवं न्यायबोधिनी (अन्नम्भट्ट - पं. केदारनाथ त्रिपाठी सान्वय सटीक)

Tarkasangraha with Nyayabodhini of Annambhatta by Kedarnath Tripathi

अन्नम्भट्ट द्वारा

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

पृष्ठ 86, कुल 199 में से

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पृष्ठ 86

अथावशिष्टपरिच्छेदः अयथार्थानुभवस्त्रिविधः—संशय-विपर्यय-तर्कभेदात् । एकस्मिन्धर्मिणि विरुद्धनानाधर्मवैशिष्ट्यावगाहिज्ञानं संशयः । यथा—स्थाणुर्वा पुरुषो वेति । मिथ्याज्ञानं विपर्ययः । यथा—शुक्तौ 'रजतम्' इति । अयथार्थानुभव तीन प्रकार का होता है—संशय-विपर्यय और तर्क के भेद से । एक धर्मी में विरुद्ध नानाधर्म के वैशिष्ट्य (सम्बन्ध) का अवगाहन करने वाला ज्ञान संशय है । जैसे—"यह स्थाणु है या पुरुष है" इस प्रकार का अनिश्च- यात्मक ज्ञान संशय कहाता है । मिथ्याज्ञान को विपर्यय कहते हैं । जैसे—शुक्ति में हुआ रजत का ज्ञान मिथ्या- ज्ञान (भ्रमज्ञान) होने से विपर्यय है । न्यायबोधिनी यथार्थानुभवं निरूप्यायथार्थानुभवं विभजते—संशयेत्यादिना । एकेति । एकधर्मावच्छिन्नविशेष्यतानिरूपितभावाभावप्रकारकज्ञानं संशय इत्यर्थः । भावद्वयकोटिकसंशयाप्रसिद्धेः (पुरुषो वा) स्थाणुर्वेत्यत्र स्थाणुत्वस्थाणुत्वाभावपुरुषत्वपुरुषत्वाभावकोटिक एव संशय इत्यर्थः । मिथ्याज्ञानमिति । अयथार्थज्ञानमित्यर्थः । विपर्ययो नाम भ्रमः । हिन्दी-कला अब तक यथार्थानुभव का निरूपण हुआ । बुद्धि के दूसरे भेद अयथार्थानुभव का विभाग मूलकार करते हैं—अयथार्थानुभव तीन प्रकार का होता है—संशय-विपर्यय और तर्क के भेद से । मूलोक्त संशयलक्षण का परिष्कृत स्वरूप यों है—एकधर्मा- वच्छिन्ना जो विशेष्यता, उससे निरूपिता जो भावाभावनिष्ठा प्रकारता, तादृश- प्रकारताशाली जो ज्ञान, वह संशय है । जैसे, तमो द्रव्यं न वा' इस संशय में एक तम विशेष्य है, तथा द्रव्यत्व और द्रव्यत्वाभाव ये दो प्रकार हैं । इसलिये एक ही विशेष्य में भावाभावरूप दो विशेषणों का ज्ञान होने से यह संशय है । इस प्रकार संशय में एक कोटि भाव की होती है और दूसरी कोटि अभाव की । अतः भावद्वयकोटिक संशय के अप्रसिद्ध होने से "स्थाणुर्वा पुरुषो वा" इस स्थल में स्थाणुत्व और पुरुषत्वकोटिक संशय न होकर स्थाणुत्व-स्थाणुत्वाभाव एवं पुरुषत्व- पुरुषत्वाभावरूप भावाभावकोटिक ही संशय होता है, ऐसा अभिप्राय है । विपर्यय का अर्थ है—मिथ्याज्ञान अर्थात् भ्रम ।