भारतकोश
तर्कसंग्रह एवं न्यायबोधिनी (अन्नम्भट्ट - पं. केदारनाथ त्रिपाठी सान्वय सटीक)

तर्कसंग्रह एवं न्यायबोधिनी (अन्नम्भट्ट - पं. केदारनाथ त्रिपाठी सान्वय सटीक)

Tarkasangraha with Nyayabodhini of Annambhatta by Kedarnath Tripathi

अन्नम्भट्ट द्वारा

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

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पृष्ठ 87

६८ तर्कसंग्रहः [ अवशिष्टपरिच्छेदः व्याप्यारोपेण व्यापकारोपस्तर्कः । यथा—यदि वह्निर्न स्यात्तर्हि धूमोऽपि न स्यादिति । स्मृतिरपि द्विविधा—यथार्था अयथार्था च । प्रमाजन्या यथार्था, अप्रमाजन्या अयथार्था । सर्वेषामनुकूलवेदनीयं सुखम् । प्रतिकूलवेदनीयं दुःखम् । व्याप्य के आरोप से व्यापक का आरोप तर्क है । जैसे—"पर्वत में यदि वह्नि न हो तो धूम भी न हो" इस प्रकार का आरोप करना तर्क है । यहाँ वह्न्यभाव व्याप्य है और धूमाभाव व्यापक है । स्मृति भी दो प्रकार की होती है—यथार्थ स्मृति और अयथार्थ स्मृति । प्रमात्मक ज्ञान से हुई स्मृति यथार्थ स्मृति है और अप्रमात्मक ज्ञान ( भ्रमात्मक ज्ञान ) से हुई स्मृति अयथार्थ स्मृति है । सभी के लिये अनुकूल प्रतीत होने वाला सुख है, और प्रतिकूल प्रतीत होने वाला दुःख है । न्यायबोधिनी व्याप्यारोपेणेति । तर्के व्याप्यस्य व्यापकस्य च बाधनिश्चयः कारणम्, अन्यथा बाधनिश्चयाभाव इष्टापत्तिदोषेण तर्कानुत्पत्तेः । सुखं निरूपयति—सर्वेषामिति । इतरेच्छानधीनेच्छाविषयत्वमिति निष्कर्षः । यथाश्रुते घटोऽनुकूल इत्याकारकज्ञानदशायामनुकूलत्वप्रकारक- हिन्दी-कला व्याप्य के आरोप से व्यापक का आरोप तर्क है । जैसे—पर्वत में यदि वह्नि का अभाव हो तो धूम का भी अभाव होना चाहिये । यहाँ वह्न्यभाव व्याप्य है । इसलिये उसका आरोप होने पर व्यापकीभूत धूमाभाव का भी आरोप होगा । तर्क में वादी प्रतिवादी दोनों को व्याप्य और व्यापक का बाधनिश्चय होना चाहिये, तभी तर्कप्रयोग हो सकता है । इसलिए तर्क में उक्त बाधनिश्चय कारण है ( यदि बाध- निश्चय न हो तो इष्टापत्तिदोष के कारण तर्क उत्पन्न ही न हो सकेगा । सुख का निष्कृष्ट लक्षण है—इतरेच्छानधीनेच्छाविषयत्व । अर्थात् जो स्वतः एव इच्छा का विषय हो, अन्य इच्छा के अधीन इच्छा विषय न हो, वह सुख है । यहाँ यदि मूलोक्त यथाश्रुत लक्षण रहने दिया जाय तो "घटोऽनुकूलः" इस प्रकार के अनुकूलत्वप्रकारक ज्ञान की विशेष्यता के घट में भी होने से घट में भी सुख-लक्षण की अतिव्याप्ति हो जायगी । इसलिये 'अनुकूलत्व' सुख का लक्षण नहीं है । परिष्कृत