तर्कसंग्रह एवं न्यायबोधिनी (अन्नम्भट्ट - पं. केदारनाथ त्रिपाठी सान्वय सटीक)
Tarkasangraha with Nyayabodhini of Annambhatta by Kedarnath Tripathi
अन्नम्भट्ट द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंन्यायबोधिनी-कलासंवलितः ६१ इच्छा कामः । क्रोधो द्वेषः । कृतिः प्रयत्नः । कामना को इच्छा कहते हैं । किसी के प्रति क्रोध को द्वेष कहते हैं । कृति को प्रयत्न कहते हैं । न्यायबोधिनी ज्ञानविशेष्यत्वस्य घटादावपि सत्त्वाद् घटादावतिव्याप्तिरिति । सुखेच्छाधीने भोजनादावतिव्याप्तिवारणाय इतरेच्छानधीनेतीच्छाविशेषणम् । सुखेच्छा तु सुखत्वप्रकारकज्ञानमात्रजन्यैव । दुःखं निरूपयति—प्रतिकूलेति । अत्रापीतरद्वेषानधीनद्वेषविषयत्वमिति निष्कृष्टलक्षणम् । द्वेषविषयत्वमात्रोक्तौ सर्पादावतिव्याप्तिस्तत्रापि द्वेष- विषयत्वसत्त्वादतस्तत्रातिव्याप्तिवारणायेतरद्वेषानधीनेति द्वेषविशेषणम् । सर्पजन्यदुःखादौ द्वेषात्सर्पेऽपि द्वेष इति सर्पद्वेषस्य सर्पजन्यदुःखद्वेषजन्यत्वा- दन्यद्वेषाजन्यद्वेषविषयत्वरूपदुःखलक्षणस्य सर्पादौ नातिव्याप्तिः । फलेच्छा हिन्दी-कला लक्षण में भी यदि केवल इच्छाविषयत्व ही कहा जाय तो सुखेच्छाधीन-भोजनादि में भी सुखलक्षण की अतिव्याप्ति होने लगेगी । अतः 'इतरेच्छानधीन' यह द्वितीय इच्छा का विशेषण कहा । सुखेच्छा तो केवल सुखत्वप्रकारक ज्ञान से ही उत्पन्न होती है, न कि वह दूसरी इच्छा के अधीन होती है । अतएव सुख स्वतः काम्य होता है और इतर पदार्थ की कामना सुखेच्छा के अधीन होती है । 'प्रतिकूलवेदनीयत्व' दुःख का लक्षण मूल में कहा गया है । किन्तु यहाँ भी "इतर द्वेषानधीनद्वेषविषयत्व" ही दुःख का निष्कृष्ट लक्षण है । इस लक्षण में भी यदि केवल 'द्वेषविषयत्व' दुःख का लक्षण कहा जाय तो सर्प आदि में भी दुःखलक्षण की अतिव्याप्ति हो जायगी, क्योंकि सर्प में भी द्वेषविषयता है । अतः इस अतिव्याप्ति के निवारणार्थ 'इतरद्वेषानधीन' यह द्वेष का विशेषण कहा गया । सर्प से होने वाले दुःख के प्रति द्वेष के कारण ही सर्प में भी द्वेष होता है । इसलिये सर्पजन्य दुःख के प्रति द्वेष के अधीन ही सर्प के प्रति द्वेष होने से इतरद्वेषानधीनद्वेषविषयत्वरूप दुःखलक्षण की सर्पादि में अतिव्याप्ति न होगी । सुख और दुःख के उक्त निष्कृष्टलक्षण बनाने का रहस्य यह है कि फलेच्छा उपायेच्छा का कारण होती है, इसी लिये फलेच्छा के अधीन उपायेच्छा होती है । इसी प्रकार फल के प्रति द्वेष होने से उपाय के प्रति द्वेष उत्पन्न होता है, इसलिये फलद्वेष के अधीन उपायद्वेष होता है । फल दो हैं—अनुकूल फल सुख तथा प्रति- कूल फल दुःख ।