भारतकोश
तर्कसंग्रह एवं न्यायबोधिनी (अन्नम्भट्ट - पं. केदारनाथ त्रिपाठी सान्वय सटीक)

तर्कसंग्रह एवं न्यायबोधिनी (अन्नम्भट्ट - पं. केदारनाथ त्रिपाठी सान्वय सटीक)

Tarkasangraha with Nyayabodhini of Annambhatta by Kedarnath Tripathi

अन्नम्भट्ट द्वारा

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

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पृष्ठ 89

७० तर्कसंग्रहः [ अवशिष्टपरिच्छेदः विहितकर्मजन्यो धर्मः । निषिद्धकर्मजन्यस्त्वधर्मः । बुद्ध्यादयोऽष्टावात्ममात्रविशेषगुणाः । बुद्धीच्छाप्रयत्ना नित्या अनित्याश्च । नित्या ईश्वरस्य, अनित्या जीवस्य । संस्कारस्त्रिविधः—वेगो भावना स्थितिस्यापकश्चेति । वेगः पृथिव्यादिचतुष्टयमनोवृत्तिः । अनुभवजन्या स्मृतिहेतुर्भावना, आत्मामात्रवृत्तिः । अन्यथाकृतस्य पुनस्तदवस्थापादकः स्थितिस्थापकः, कटादिपृथिवीवृत्तिः । इति गुणाः । वेदविहित कर्म के अनुष्ठान से उत्पन्न होने वाला धर्म है, और वेद द्वारा निषिद्ध कर्म के अनुष्ठान से उत्पन्न होने वाला अधर्म कहाता है । बुद्धि आदि आठ (बुद्धि-सुख-दुःख-इच्छा-द्वेष-प्रयत्न-धर्म और अधर्म) आत्मा- मात्र के विशेषगुण हैं। इनमें बुद्धि, इच्छा और प्रयत्न, ये तीन गुण नित्य भी हैं, अनित्य भी हैं। ईश्वर के ये तीनों गुण नित्य हैं और जीव के अनित्य हैं । संस्कार तीन प्रकार का होता है—वेग भावना और स्थितिस्थापक । वेग- नामक संस्कार पृथिवी-जल-तेज-वायु और मनमें रहता है । अनुभव से जो उत्पन्न हो और स्मृति का हेतु हो, उसे भावना कहते हैं । वह केवल आत्मा में रहती है । अन्य स्थिति में बना दी गई वस्तु को पुनः उसकी पहली अवस्था में ला देनेवाले संस्कार को स्थितिस्थापकनामक संस्कार कहते हैं । वह चटाई आदि पृथिवी-द्रव्य में रहता है । न्यायबोधिनी उपायेच्छां प्रति कारणम्, अतः फलेच्छावशादुपायेच्छा भवति । एवं फले द्वेषादुपाये द्वेषः । धर्माधर्मौ निरूपयति—विहितेति । वेदविहितेत्यर्थः । निषिद्धेति । वेद- निषिद्धेत्यर्थः । बुद्ध्यादयोऽष्टाविति । बुद्धिसुखदुःखेच्छाद्वेषप्रयत्नधर्माधर्मा इत्यर्थः । संस्कारं विभजते संस्कार इति । भावनां लक्षयति—अनुभवेति । अनुभवजन्यत्वे सति स्मृतिहेतुत्वं भावनालक्षणम् । अत्रानुभवजन्यत्वे सतीति हिन्दी-कला वेद में विहित कर्म से उत्पन्न धर्म है और वेद में निषिद्ध कर्म से उत्पन्न अधर्म है । बुद्धि से लेकर अधर्म तक अर्थात् बुद्धि-सुख-दुःख-इच्छा-द्वेष-प्रयत्न-धर्म और अधर्म ये आठ विशेषगुण आत्मा मात्र के हैं । संस्कार के तीन भेद हैं—वेग-भावना और स्थितिस्थापक । अनुभव से जो जन्य हो और स्मृति का हेतु हो, वह भावना है । इस लक्षण में यदि "अनुभव-जन्यत्वे