तर्कसंग्रह एवं न्यायबोधिनी (अन्नम्भट्ट - पं. केदारनाथ त्रिपाठी सान्वय सटीक)
Tarkasangraha with Nyayabodhini of Annambhatta by Kedarnath Tripathi
अन्नम्भट्ट द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंन्यायबोधिनी-कलासंवलितः ५३ न्यायबोधिनी पक्षासिद्धिबाधाः। एकज्ञानविषयप्रकृतहेतुतावच्छेदकवत्त्वसम्बन्धेन एतद्वि- शिष्टा हेतवो दुष्टहेतव इत्यर्थः। यद्विषयकत्वेन ज्ञानस्यानुमिति-तत्करणान्यतरप्रतिबन्धकत्वं तत्त्वं दोष- सामान्यस्य लक्षणम्। हेतौ दोषज्ञाने सत्यनुमितिप्रतिबन्धो जायते व्याप्तिज्ञान- प्रतिबन्धो वा। अतो वादिनिग्रहाय वादिनोद्भावितहेतौ दोषोद्भावनाय दुष्टहेतुनिरूपणमित्यर्थः। सव्यभिचारं विभज्य दर्शयति—साधारणेति। साधारणाद्यन्यतमत्वं सव्यभिचारसामान्यलक्षणम्। साधारणत्वं = साध्याभाववद्वृत्तित्वम्। वह्नि- हिन्दी-कला पांच प्रकार के होते हैं—व्यभिचार-विरोध-सत्प्रतिपक्ष-असिद्धि और बाध। एकज्ञान- विषयप्रकृतहेतुतावच्छेदकवत्त्वसम्बन्ध से दोषविशिष्ट जो हेतु, वे दुष्टहेतु हैं। तात्पर्य यह है कि जिस ज्ञान में दोष विषय होकर भासित होता है, उसमें हेतु भी विषय होता ही है। इसलिये एक ज्ञान का विषय होने से एकज्ञानविषयहेतुतावच्छेदक- वत्त्वरूप सम्बन्ध जब हेतु में गया, तब उस सम्बन्ध से दोषरूप सम्बन्धी भी उस हेतु में चला गया। इस प्रकार कहीं हेतु में साक्षात् दोषवत्ता न होने पर भी उक्त परम्परासम्बन्ध से दोषवत्ता चली जाती है, और वह बाधादिस्थलीय हेतु भी 'दुष्ट- हेतु' पद से व्यवहृत होता है। यद्विषयकत्वेन ज्ञान अनुमिति का या उसके करण (व्याप्तिज्ञान) का प्रतिबन्धक होता है, तत्त्व दोषसामान्य का लक्षण है। अर्थात् यद्विषयक ज्ञान अनुमिति या उसके करण का प्रतिबन्धक होता है, वह दोष (हेत्वाभास) है। चूंकि हेतु में दोषज्ञान होने पर अनुमिति का प्रतिबन्ध अथवा व्याप्तिज्ञान का प्रतिबन्ध हो जाता है, इसी- लिये वादी को निगृहीत करने के लिये वादीद्वारा उद्भावित जो स्वपक्षसाधक हेतु, उसमें दोषज्ञानपूर्वक दोष का उद्भावन किया जाय, एतदर्थ दुष्टहेतु का निरूपण किया जाता है। अर्थात् हेत्वाभास का निरूपण भी अप्रासङ्गिक या निरर्थक नहीं है। अतः उसका भी निरूपण यहाँ अवश्य कर्तव्य है। विभागपूर्वक सव्यभिचार को मूलकार प्रदर्शित करते हैं—साधारण, असाधारण और अनुपसंहारी तीन प्रकार का सव्यभिचार होता है। सव्यभिचार का ही दूसरा नाम अनैकान्तिक है। अतः 'अनैकान्तिकत्व' सव्यभिचार का लक्षण नहीं है। किन्तु 'साधारणादित्रितयान्यतमत्व' ही सव्यभिचारसामान्य का लक्षण है। पृथक्-पृथक् लक्षण यों है—हेतु का साध्याभाव के अधिकरण में रहना साधारण सव्यभिचार का लक्षण है। जैसे—'वह्निमान् प्रमेयत्वात्' यहाँ पर प्रमेयत्वहेतु में जब वह्न्यभावाधि- करणवृत्तित्वरूप व्यभिचार का ज्ञान हो जाता है, तब वहाँ साध्याभाववद्वृत्तित्वरूप