तर्कसंग्रह एवं न्यायबोधिनी (अन्नम्भट्ट - पं. केदारनाथ त्रिपाठी सान्वय सटीक)
Tarkasangraha with Nyayabodhini of Annambhatta by Kedarnath Tripathi
अन्नम्भट्ट द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५४ तर्कसंग्रहः [ अनुमानपरिच्छेदः सर्वसपक्षविपक्षव्यावृत्तः पक्षमात्रवृत्तिरसाधारणः । यथा— शब्दो नित्यः शब्दत्वादिति । (अत्र) शब्दत्वं सर्वेभ्यो नित्येभ्योऽ- नित्येभ्यश्च व्यावृत्तं शब्दमात्रवृत्ति । अन्वयव्यतिरेकदृष्टान्तरहितोऽनुपसंहारी । यथा—सर्वमनित्यं प्रमेयत्वादिति । अत्र सर्वस्यापि पक्षत्वाद् दृष्टान्तो नास्ति । जो हेतु सभी सपक्षों और विपक्षों से व्यावृत्त हो अर्थात् उनमें न रहने वाला हो, किन्तु पक्षमात्र में रहे, वह असाधारणनामक अनैकान्तिक हेत्वाभास है। जैसे- "शब्दो नित्यः शब्दत्वात्" इस अनुमान में शब्दत्व-हेतु असाधारण अनैकान्तिक है। क्योंकि शब्दत्व-हेतु सपक्षभूत सभी नित्य पदार्थों से और विपक्षभूत सभी अनित्य पदार्थों से व्यावृत्त रहता हुआ शब्दरूप पक्षमात्र में रहता है । जो हेतु अन्वय-दृष्टान्त और व्यतिरेक-दृष्टान्त से रहित हो, वह अनुपसंहारी- नामक अनैकान्तिक हेत्वाभास है। जैसे—"सर्वमनित्यं प्रमेयत्वात्" इस अनुमान में प्रमेयत्व हेतु अनुपसंहारी अनैकान्तिक है । क्योंकि सभी पदार्थों के पक्षकोटि में आ- जाने से पक्षातिरिक्त कोई बचा नहीं, जो अन्वय-दृष्टान्त या व्यतिरेक-दृष्टान्त बन सके । न्यायबोधिनी मान् प्रमेयत्वादित्यत्र प्रमेयत्वहेतौ वह्न्यभाववद्वृत्तित्वरूपव्यभिचारे ज्ञाते वह्न्यभाववद्वृत्तित्वरूपव्याप्तिज्ञानप्रतिबन्धः फलम् । असाधारण इति । सर्वसपक्षव्यावृत्तत्वं निश्चितसाध्यवदवृत्तित्वम् । साध्यवदवृत्तित्वं च साध्यासामानाधिकरण्यम् । हेतौ साध्यासामानाधि- करण्ये निश्चिते साध्यसामानाधिकरण्यरूपव्याप्तिज्ञानप्रतिबन्धः फलम् । हिन्दी-कला व्याप्ति का ज्ञान प्रतिबन्धित हो जाता है, और व्याप्तिज्ञान के अभाव में अनुमिति नहीं हो पाती । इस प्रकार साधारणज्ञान का फल व्याप्तिज्ञान का प्रतिबन्ध कर देना है । सर्व सपक्ष-विपक्ष से जो हेतु व्यावृत्त हो और पक्षमात्र में रहे, वह असाधारण अनैकान्तिक है। सर्वसपक्षव्यावृत्तत्व का अर्थ है—निश्चितसाध्यवान् में हेतु का न रहना। साध्यवदवृत्तित्व का अभिप्राय है-साध्य के साथ सामानाधिकरण्य का अभाव । इस प्रकार हेतु में साध्य के साथ सामानाधिकरण्याभाव का निश्चय होने पर साध्य- सामानाधिकरण्यरूप व्याप्ति का ज्ञान प्रतिबन्धित हो जाता है। और यही इस हेत्वा- भास के ज्ञान का फल है ।