भारतकोश
तर्कसंग्रह एवं न्यायबोधिनी (अन्नम्भट्ट - पं. केदारनाथ त्रिपाठी सान्वय सटीक)

तर्कसंग्रह एवं न्यायबोधिनी (अन्नम्भट्ट - पं. केदारनाथ त्रिपाठी सान्वय सटीक)

Tarkasangraha with Nyayabodhini of Annambhatta by Kedarnath Tripathi

अन्नम्भट्ट द्वारा

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

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न्यायबोधिनी-कलासंवलितः ५१ सन्दिग्धसाध्यवान् पक्षः । यथा धूमवत्त्वे हेतौ पर्वतः । निश्चितसाध्यवान् सपक्षः । यथा तत्रैव महानसम् । निश्चितसाध्याभाववान् विपक्षः । यथा तत्रैव महाह्रदः । जिसमें साध्य का सन्देह हो, उसे पक्ष कहते हैं । जैसे धूमवत्त्व के हेतु होने पर पर्वत पक्ष है । जिसमें साध्य का निश्चय हो, वह सपक्ष है । जैसे धूमवत्त्व-हेतु के लिये महानस सपक्ष है । क्योंकि वहाँ धूमवत्त्व के साथ-साथ वह्नि का भी निश्चय है । जिसमें साध्य के अभाव का निश्चय हो, उसे विपक्ष कहते हैं । जैसे धूमवत्त्व-हेतु के लिये महाह्रद विपक्ष है । क्योंकि वहाँ धूमाभाव के साथ साथ वह्नयभाव भी निश्चित है । न्यायबोधिनी वत्त्वात्, न तथा = इतरभेदाभाववती न किन्तु इतरभेदाभावाभाववती इतर- भेदवतीत्यर्थः । पक्षलक्षणमाह—सन्दिग्धेति । साध्यप्रकारक सन्देहविशेष्यत्वं पक्षत्वम् । सन्देहश्च पर्वतो वह्निमान्न वेत्याकारः । इदं च लक्षणमनुमितेः पूर्वं साध्य- सन्देहो नियमेन जायत इत्यभिप्रायेण प्राचीनैः कृतम् । गगनविशेष्यकमेघप्र- कारक सन्देहाभावदशायामपि गृहमध्यस्थपुरुषस्य घनगर्जितश्रवणेन गगनं मेघवदित्याकारिकाया गगनत्वावच्छिन्नोद्देश्यता निरूपितमेघत्वावच्छिन्नवि- धेयताकाया अनुमितेर्दर्शनात्प्राचीन लक्षणं विहाय नवीनैरनुमित्युद्देश्यत्वं पक्षत्वमिति स्थिरीकृतम् । हिन्दी-कला ‘सन्दिग्ध साध्यवान् पक्षः’ इस मूलोक्त पक्षलक्षण को बोधिनीकार स्पष्ट करते हैं—साध्यप्रकारक जो सन्देह (पर्वतो वह्निमान् नवा इत्याकारक) उसका विशेष्य पक्ष है । यह जो पक्ष का सन्देह घटित लक्षण है, वह प्राचीनों का लक्षण है । इसका अभिप्राय यह है कि अनुमिति के पूर्व नियमतः साध्य का सन्देह होता ही है । किन्तु गगनविशेष्यक मेघप्रकारक सन्देह की अभावदशा में भी गृह के मध्य स्थित पुरुष को घनगर्जन सुनकर “गगनं मेघवत्” इत्याकारक गगनत्वावच्छिन्न उद्देश्यता- निरूपित मेघत्वावच्छिन्नविधेयताक अनुमिति होती देखी जाती है । इस कारण से प्राचीनों के उक्त लक्षण को छोड़कर नवीन नैयायिकों ने “अनुमित्युद्देश्यत्वं पक्षत्वम्” यही पक्षलक्षण निर्धारित किया। अर्थात् अनुमिति का जो उद्देश्य है, वह पक्ष है ।