तर्कसंग्रह एवं न्यायबोधिनी (अन्नम्भट्ट - पं. केदारनाथ त्रिपाठी सान्वय सटीक)
Tarkasangraha with Nyayabodhini of Annambhatta by Kedarnath Tripathi
अन्नम्भट्ट द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७२ तर्कसंग्रहः [ अवशिष्टपरिच्छेदः न्यायबोधिनी स्वाव्यहितपूर्वक्षणोत्पन्नदण्डज्ञानात्मकानुभवजन्यं जनिष्यमाणे दण्डी पुरुष इत्याकारकस्मरणे कारणं च, स्मृतिं प्रत्यनुभवस्य कारणत्वात् । तथा चानु- भवजन्यत्वे सति स्मृतिहेतुत्वरूपभावनालक्षणस्य यथोक्त 'दण्डी पुरुष' इत्या- कारकानुभवे विद्यमानत्वादतिव्याप्तिरिति चेत्— अत्र ब्रूमः—अनुभवजन्यत्वं हि अनुभवत्वावच्छिन्नकारणतानिरूपितकार्य- ताश्रयत्वम् । तत्र कारणतायामनुभवत्वावच्छिन्नत्वं निवेश्यते । तथा चानु- भवत्वावच्छिन्नकारणतानिरूपितकार्यताश्रयत्वमिति फलितम्, अतो नोक्ताति- व्याप्तिः । तथा हि - दण्डप्रकारकबुद्धित्वावच्छिन्नकार्यता निरूपितदण्डज्ञान- निष्ठा या कारणता, तस्या न दण्डानुभवत्वमवच्छेदकं, दण्डानुभवादिव दण्ड- स्मरणादपि दण्डप्रकारकबुद्धेरुत्पत्तेः । अतो दण्डप्रकारकबुद्धित्वावच्छिन्नं प्रति अनुभवस्मरणसाधारणदण्डज्ञानत्वेनैव दण्डज्ञानस्य कारणतायाः स्वीक- रणीयत्वेन दण्डज्ञानत्वस्यैव तदवच्छेदकत्वात् । तथा चानुभवत्वावच्छिन्न- कारणतानिरूपितकार्यत्वस्योक्तप्रत्यक्षेऽभावान्नातिव्याप्तिः । हिन्दी-कला पूर्वोक्त भावनालक्षण की अतिव्याप्ति हो जायगी । क्योंकि 'दण्डी पुरुषः' यह प्रत्यक्ष- ज्ञान अपने अव्यवहित पूर्वक्षण में उत्पन्न दण्डज्ञानरूप अनुभव से जन्य है, तथा भावी 'दण्डी पुरुषः' इत्याकारक स्मृति के प्रति हेतु भी है, क्योंकि स्मृति के प्रति अनुभव कारण होता है । इस प्रकार "अनुभवजन्यत्वे सति स्मृतिहेतुत्व" रूप भावनालक्षण के 'दण्डी पुरुषः' इत्याकारक अनुभव में वर्तमान होने से यहाँ भावनालक्षण की अति- व्याप्ति हो गयी । समाधान — लक्षण में उक्त अनुभवजन्यत्व का अर्थ है— अनुभवत्वावच्छिन्न जो कारणता, उससे निरूपितकार्यता का आश्रयत्व । यहाँ कारणता में अनुभवत्वा- वच्छिन्नत्व का निवेश किया गया है। इसीलिये पूर्वोक्त अतिव्याप्ति नहीं होगी । क्योंकि दण्डप्रकारक ( 'दण्डी पुरुषः' इत्याकारक ) बुद्धित्वावच्छिन्नकार्यता निरूपिता जो दण्डज्ञाननिष्ठा कारणता है, उसमें दण्डानुभवत्व अवच्छेदक नहीं है । अर्थात् उक्त कारणता दण्डानुभवत्वावच्छिन्ना नहीं है । क्योंकि जैसे दण्डानुभव से दण्डप्रकारक बुद्धि उत्पन्न होती है, वैसे ही दण्डस्मरण से भी वह होती है । इसलिये दण्डप्रकारक- बुद्धित्वावच्छिन्न के ( 'दण्डी पुरुषः' इस बुद्धि के ) प्रति अनुभव-स्मरणसाधारण दण्ड- ज्ञानस्वरूप से ही दण्डज्ञान की कारणता स्वीकार्य होने से दण्डज्ञानत्व ही कारणता का अवच्छेदक होगा, न कि दण्डानुभवत्व । अतः "अनुभवत्वावच्छिन्नकारणतानिरूपित- कार्यताश्रयत्व" लक्षण की अतिव्याप्ति 'दण्डी पुरुष' इस प्रत्यक्ष में नहीं होगी ।