भारतकोश
तर्कसंग्रह एवं न्यायबोधिनी (अन्नम्भट्ट - पं. केदारनाथ त्रिपाठी सान्वय सटीक)

तर्कसंग्रह एवं न्यायबोधिनी (अन्नम्भट्ट - पं. केदारनाथ त्रिपाठी सान्वय सटीक)

Tarkasangraha with Nyayabodhini of Annambhatta by Kedarnath Tripathi

अन्नम्भट्ट द्वारा

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

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न्यायबोधिनी-कलासंबलितः ७३ चलनात्मकं कर्म । ऊर्ध्वदेशसंयोगहेतुरुत्क्षेपणम् । अधोदेश- संयोगहेतुरपक्षेपणम् । शरीरस्य सन्निकृष्टसंयोगहेतुराकुञ्चनम् । विप्रकृष्टसंयोगहेतुः प्रसारणम् । अन्यत्सर्वं गमनम् । चलनात्त्मक क्रिया को कर्म कहते हैं । कर्म के पाँच भेद हैं । उनमें ऊपर देश में संयोग का हेतु कर्म उत्क्षेपण है । नीचे के देश में संयोग का हेतु कर्म अपक्षेपण है । शरीर के निकट-देश में संयोग का हेतु कर्म आकुञ्चन है । शरीर के दूरवर्ती देश में संयोग का हेतु कर्म प्रसारण है । तथा इन चारों से भिन्न सभी प्रकार का कर्म गमन कहाता है । न्यायबोधिनी भावनायां तु लक्षणमिदं वर्तते । तथाहि—अनुभवेनैव भावनाख्य- संस्कारोत्पत्त्या भावनात्वावच्छिन्नं प्रत्यनुभवस्यानुभवत्वेनैव कारणतया भावनात्वावच्छिन्नकार्यतानिरूपितानुभवनिष्ठकारणतायामनुभवत्वमवच्छेद- कम् । अतोऽनुभवत्वावच्छिन्नकारणतानिरूपितकार्यताश्रयत्वं भावनायां वर्तते इति नासम्भवः । नन्वेवं स्मृतिहेतुत्वविशेषणवैयर्थ्यम् । तद्ध्यनुभवध्वंसेऽतिव्याप्तिवारणाय प्रागुपात्तम् न हि यथोक्तानुभवजन्यत्वविवक्षायामनुभवध्वंसेऽतिव्याप्तिः प्रसज्यते । तथाहि—ध्वंसत्वावच्छिन्नं प्रति प्रतियोगिनः कारणत्वं प्रतियोगि- त्वेन रूपेण, तत्तद्ध्वंसत्वावच्छिन्नं प्रति च तत्तत्प्रतियोगिव्यक्तेस्तत्तद्व्य- क्तित्वेनेत्येव ध्वंसप्रतियोगिनोः कार्यकारणभावः । तथा च ध्वंसनिष्ठकार्य- हिन्दी-कला भावना में तो उक्त परिष्कृत लक्षण संगत ही है। क्योंकि अनुभव से ही भावनाख्य संकार की उत्पत्ति होने से भावनात्वावच्छिन्न कार्य के प्रति केवल अनुभवत्वेन रूपेण अनुभव कारण होता है । इसलिये भावनात्वावच्छिन्ना जो भावनानिष्ठा कार्यता, उस कार्यता से निरूपिता जो अनुभवनिष्ठा कारणता, उसमें अनुभवत्व अवच्छेदक होगा । अतः “अनुभवत्वावच्छिन्नकारणतानिरूपितकार्यताश्रयत्व” लक्षण भावना में वर्तमान है । इसलिये उक्त लक्षण में असंभवदोष नहीं होगा । शङ्का—उक्त प्रकार से लक्षण का परिष्कार करने पर लक्षण में ‘स्मृतिहेतुत्व’ विशेषण देना व्यर्थ है । यह विशेषण अनुभवध्वंस में भावनालक्षण की अतिव्याप्ति का वारण करने के लिए पहले दिया गया था । किन्तु अनुभवत्वावच्छिन्नकारणतानिरूपित- कार्यताश्रयत्वरूप अनुभवजन्यत्व स्वीकार करने पर अनुभवध्वंस में लक्षण की अतिव्याप्ति प्रसक्त ही नहीं है । क्योंकि ध्वंसत्वावच्छिन्न के प्रति प्रतियोगित्वरूप से