भारतकोश
तर्कसंग्रह एवं न्यायबोधिनी (अन्नम्भट्ट - पं. केदारनाथ त्रिपाठी सान्वय सटीक)

तर्कसंग्रह एवं न्यायबोधिनी (अन्नम्भट्ट - पं. केदारनाथ त्रिपाठी सान्वय सटीक)

Tarkasangraha with Nyayabodhini of Annambhatta by Kedarnath Tripathi

अन्नम्भट्ट द्वारा

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

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पृष्ठ 97

७८ तर्कसंग्रहः [ अवशिष्टपरिच्छेदः अनादिः सान्तः प्रागभावः, उत्पत्तेः पूर्वं कार्यस्य । सादिरनन्तः प्रध्वंसः, उत्पत्त्यनन्तरं कार्यस्य । त्रैकालिकसंसर्गावच्छिन्नप्रतियोगिताकोऽत्यन्ताभावः । यथा- भूतले घटो नास्तीति । जो अनादि होता हुआ सान्त ( अन्तवान् ) हो, उसे प्रागभाव कहते हैं । जैसे— उत्पत्ति के पूर्व कार्य का प्रागभाव रहता है । जो सादि ( आदिमान् ) होता हुआ अनन्त हो, उसे प्रध्वंस कहते हैं । जैसे— कार्य का अपनी उत्पत्ति के अनन्तर प्रध्वंस उत्पन्न होता है । त्रैकालिकसंसर्ग से अवच्छिन्न है प्रतियोगिता जिस अभाव की, वह अभाव अत्यन्ताभाव कहाता है । जैसे—"भूतले घटो नास्ति" यह अभाव अत्यन्ताभाव है । न्यायबोधिनी द्वयोर्मध्य इति । यन्निष्ठकालनिरूपिताधेयतासामान्यं यदवच्छिन्नं तदुभया- न्यतरत्वमयुतसिद्धत्वमित्यर्थः । अत्यन्ताभावं निरूपयति--त्रैकालिकेति । ( प्रागभावाप्रतियोगित्वे सति ध्वंसाप्रतियोगित्वे सत्यन्योन्याभावभिन्नत्वे सति अभावत्वमत्यन्ताभावस्य लक्षणम् । ध्वंसप्रागभावान्योन्याभावाकाशादीनां वारणाय यथाक्रमं विशेष- णोपादानम् । वस्तुतस्तु संसर्गाभावत्वं तादात्म्यभिन्नसम्बन्धावच्छिन्नप्रति- हिन्दी-कला यद्वृत्तिकालनिरूपित-आधेयतासामान्य जिससे अवच्छिन्न होकर रहे, वे दोनों परस्पर में अयुतसिद्ध कहे जाते हैं । जैसे घट-घटत्व दोनों अयुतसिद्ध हैं, अर्थात् जुदा होकर नहीं रहते । घट को छोड़कर घटत्व कहीं अन्यत्र नहीं रहता और घटत्वविहीन होकर घट भी नहीं रहता । दोनों साथ-साथ काल में रहते हैं । विशेष स्पष्टीकरण 'संस्कृत-कला' में द्रष्टव्य है । पूर्वोक्त चतुर्विध अभावों में अत्यन्ताभाव का लक्षण कहते हैं— त्रैकालिकससर्गा- वच्छिन्नप्रतियोगिताक अभाव अत्यन्ताभाव है । अर्थात् पूर्वकालिकसंसर्गावच्छिन्नप्रतियो- गिताक प्रागभाव होता है तथा ध्वंसोत्तरकालि ससर्गावच्छिन्नप्रतियोगिताक प्रध्वंसा- भाव होता है । किन्तु अत्यन्ताभाव तो त्रैकालिकसंसर्गावच्छिन्नप्रतियोगिताक होता है । न्यायबोधिनीकार अत्यन्ताभाव का परिष्कृत लक्षण कहते हैं—जो प्रागभाव का अप्रतियोगी होता हुआ ध्वंस का भी अप्रतियोगी हो तथा अन्योन्याभाव से भिन्न अभाव हो, वह अत्यन्ताभाव है । ध्वंस प्रागभाव का प्रतियोगी होता है तथा प्रागभाव ध्वंस का प्रतियोगी होता है, इसलिये ये दोनों छूट गये । तृतीय विशेषण से अन्योन्याभाव छूट गया । और चतुर्थ 'अभावत्व' विशेषण कहने से आकाश का वारण हो गया । इस प्रकार