तर्कसंग्रह एवं न्यायबोधिनी (अन्नम्भट्ट - पं. केदारनाथ त्रिपाठी सान्वय सटीक)
Tarkasangraha with Nyayabodhini of Annambhatta by Kedarnath Tripathi
अन्नम्भट्ट द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंन्यायबोधिनी-कलासंवलितः ७७ नित्यसम्बन्धः समवायः । अयुतसिद्धवृत्तिः । ययोर्द्वयोर्मध्ये एकमविनश्यदवस्थमपराश्रितमेवावतिष्ठते तावयुतसिद्धौ । यथा अवयवावयविनौ गुणगुणिनौ क्रियाक्रियावन्तौ जातिव्यक्ती विशेष- नित्यद्रव्ये चेति । नित्यसम्बन्ध को समवाय कहते हैं। यह अयुतसिद्ध पदार्थों में रहता है। जिन दो पदार्थों के मध्य एक अविनाश की अवस्था में रहता हुआ दूसरे के आश्रित ही रहता है, वे दोनों अयुतसिद्ध कहे जाते हैं। जैसे—अवयव-अवयवी, गुण-गुणी, क्रिया-क्रियावान्, जाति-व्यक्ति और विशेष-नित्यद्रव्य ये अयुतसिद्ध हैं। अर्थात् अवयवी जबतक रहेगा, अवयव के आश्रित ही होकर रहेगा। ऐसे ही गुण, क्रिया, जाति और विशेष क्रमशः गुणी, क्रियावान्, व्यक्ति और नित्यद्रव्य के आश्रित ही रहते हैं। इसलिये गुण-गुणी आदि भी अयुतसिद्ध पदार्थ हैं। न्यायबोधिनी वारणाय निरूपितान्तं प्रकारताविशेषणम् । एतेन 'व्यावर्तका' इत्यस्य नित्य- द्रव्यविशेष्यकेतरभेदानुमितिप्रयोजका इत्यर्थकतया लक्षणपरत्वेन साफल्ये- ऽपि नित्यद्रव्यवृत्तय इति विफलमेव, स्वरूपाख्यानस्यापि कृतत्वादिति प्रत्युक्तम् । समवायं निरूपयति नित्येति । सम्बन्धत्वं विशिष्टप्रतीतिनियामक- त्वम् । तावन्मात्रोक्तौ संयोगेऽतिव्याप्तिरतो नित्य इति विशेषणम् । ययो- हिन्दी-कला विशेषपदार्थ के इतरव्यावर्तक होने में नित्यद्रव्यवृत्तित्वरूप पक्षधर्मता प्रयोजक है। यही प्रयोज्यप्रयोजकभाव प्रकट करने के लिये "नित्यद्रव्यवृत्तय" यह पद सार्थक होता है। अन्यथा 'व्यावर्तकाः' इस पद का ही 'नित्यद्रव्यविशेष्यकेतरभेदानुमिति- प्रयोजकाः' इतना अर्थ होने से लक्षण पर्यवसित हो जाता है, अतः 'नित्यद्रव्यवृत्तयः' यह पद निष्फल ही हो जाता। यह कहना कि—'नित्यद्रव्यवृत्तयः' यह पद लक्षणपरक न होने पर भी स्वरूपकथनमात्र के लिये है अर्थात् वस्तुस्थितिमात्र को बताता है, यही उसकी सार्थकता है—तो यह भी ठीक नहीं है। क्योंकि उक्त प्रयोजन भी 'व्यावर्तकाः' इस पद से ही सिद्ध हो जाता है। अतः प्रयोज्य-प्रयोजकभाव सूचित करने में ही 'नित्यद्रव्यवृत्तयः' इस पद की सार्थकता जाननी चाहिये। नित्यसम्बन्धत्व समवाय का लक्षण है। अन्य संयोगादि सम्बन्ध अनित्य होते हैं। विशिष्टप्रतीति का नियामकत्व सम्बन्ध का लक्षण है। समवाय के लक्षण में यदि नित्य-पद न दिया जाय, किन्तु सम्बन्धत्वमात्र कहा जाय तो संयोग में समवायलक्षण की अतिव्याप्ति हो जायगी, क्योंकि वह भी सम्बन्ध है। नित्य-पद देने से संयोग के अनित्य होने के कारण अतिव्याप्ति का वारण हो गया।