भारतकोश
तर्कसंग्रह एवं न्यायबोधिनी (अन्नम्भट्ट - पं. केदारनाथ त्रिपाठी सान्वय सटीक)

तर्कसंग्रह एवं न्यायबोधिनी (अन्नम्भट्ट - पं. केदारनाथ त्रिपाठी सान्वय सटीक)

Tarkasangraha with Nyayabodhini of Annambhatta by Kedarnath Tripathi

अन्नम्भट्ट द्वारा

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

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७६ तर्कसंग्रहः [ अवशिष्टपरिच्छेदः नित्यद्रव्यवृत्तयो व्यावर्तका विशेषाः । जो नित्य द्रव्य में रहने वाला एवं इतर का व्यावर्तक ( भेदक ) है, वह विशेष- नामक पदार्थ कहाता है । न्यायबोधिनी नित्यद्रव्यवृत्तय इति । नित्यद्रव्येषु परमाण्वादिषु वर्तमानाः, अत एव व्यावर्तकाः = इतरभेदानुमितिहेतवः = नित्यद्रव्यवृत्तित्वरूपपक्षधर्मताप्रयो- ज्येतरभेदानुमापकताशालिन इत्यर्थः । नित्यद्रव्यनिष्ठविशेष्यता निरूपितैक- मात्रवृत्तिभेदानुमितिजनकतावच्छेदकप्रकारताश्रयत्वं विशेषाणां लक्षणमिति भावः । पार्थिवपरमाणौ जलादिभेदानुमापकगन्धेऽतिव्याप्तिवारणाय एकमात्र- वृत्तित्वं भेदविशेषणम् । घटादौ तदितरभेदानुमापके तद्रूपादावतिव्याप्ति- हिन्दी-कला नित्य द्रव्य में वर्तमान हों और इतर व्यावर्तक हों, वे विशेष हैं। इस मूलोक्त विशेषलक्षण का स्पष्टार्थ यों है—नित्य द्रव्य जो परमाणु आदि हैं, उनमें वर्तमान हों, और इसीलिये व्यावर्तक अर्थात् इतरभेदानुमिति के हेतु हैं। तात्पर्य यह है कि नित्य द्रव्य पक्ष है, उसमें विशेष-हेतु का वर्तमान रहना ही पक्षधर्मता है। इस प्रकार नित्यद्रव्यवृत्तित्वरूप पक्षधर्मता के बल से विशेषपदार्थ इतरभेदानुमापक होता है। इस प्रकार विशेष का यह लक्षण हेतुगर्भ है। अर्थात् नित्यद्रव्यवृत्ति होने के कारण इतरव्यावर्तक ( इतरभेदानुमापक ) विशेष हैं । विशेष का परिष्कृत लक्षण यह है—नित्यद्रव्यनिष्ठ जो विशेष्यता, उससे निरूपिता तथा एकमात्रवृत्तिभेदानुमितिजनकता की अवच्छेदिका जो प्रकारता, उसका आश्रयत्व विशेष का लक्षण है । इस परिष्कृत लक्षण का स्पष्टीकरण 'संस्कृत- कला' व्याख्या में द्रष्टव्य है । भेद में एकमात्रवृत्तित्वविशेषण देने का यह प्रयोजन है कि नित्यद्रव्य पार्थिव परमाणु में जलादिभेद का अनुमापक गन्ध होता है, ( जैसे, पार्थिवपरमाणुः जलादि- भिन्नः गन्धवत्त्वात् ) वहाँ गन्ध में विशेषलक्षण की अतिव्याप्ति न हो । "तद्घटः तदितरभिन्नः, तदीयरूपात्" यहाँ पर एक द्रव्य तद्घट में इतरभेद का अनुमापक तद्रूप में विशेषलक्षण की अतिव्याप्ति न हो जाय, इसके लिये लक्षण में "नित्यद्रव्यनिष्ठ- विशेष्यतानिरूपित" यह प्रकारता का विशेषण कहा । घट के अनित्य द्रव्य होने से तद्रूपनिष्ठा प्रकारता नित्यद्रव्यनिष्ठविशेष्यतानिरूपिता नहीं है । इसलिये अति- व्याप्ति नहीं हुई । मूलोक्त लक्षण में "नित्यद्रव्यवृत्तयः" यह पद प्रयोजकत्व के अभिप्राय से दिया गया है, तथा 'व्यावर्तकाः' यह पद प्रयोज्यत्व के अभिप्राय से दिया गया है । अर्थात्

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