भारतकोश
तर्कसंग्रह एवं न्यायबोधिनी (अन्नम्भट्ट - पं. केदारनाथ त्रिपाठी सान्वय सटीक)

तर्कसंग्रह एवं न्यायबोधिनी (अन्नम्भट्ट - पं. केदारनाथ त्रिपाठी सान्वय सटीक)

Tarkasangraha with Nyayabodhini of Annambhatta by Kedarnath Tripathi

अन्नम्भट्ट द्वारा

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

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न्यायबोधिनी-कलासंवलितः ७५ नित्यमेकमनेकानुगतं सामान्यम्। द्रव्यगुणकर्मवृत्ति। परं सत्ता, अपरं द्रव्यत्वादि। जो नित्य हो, एक हो और अनेक में समवायसम्बन्ध से रहे, वह सामान्य है। वह द्रव्य, गुण और कर्म में रहता है। सामान्य दो प्रकार का होता है—परसामान्य और अपरसामान्य। सत्ता परसामान्य (परजाति) है तथा द्रव्यत्व आदि अपर- सामान्य (अपरजाति) है। न्यायबोधिनी सामान्यं निरूपयति—नित्यमेकमिति। नित्यत्वे सत्यनेकसमवेतत्वं सामा- न्यलक्षणम्। नित्यत्वविशेषणानुपादानेऽनेकसमवेतत्वस्य संयोगादौ सत्त्वा- तत्रातिव्याप्तिस्तद्वारणाय नित्यत्वविशेषणम्। अनेकसमवेतत्वानुपादाने नित्यत्वमात्रोपादाने आकाशादावतिव्याप्तिस्तद्वारणायनेकसमवेतत्वम्। अनेकसमवेतत्वानुपादाने नित्यत्वविशिष्टसमवेतत्वमात्रोक्तावाकाशगतैकत्व- परिमाणादौ जलपरमाणुगतरूपादौ चातिव्याप्तिः, जलपरमाणुगतरूपादेरा- काशगतैकत्वपरिमाणादेर्नित्यत्वात् समवेतत्वाच्च, अतः अनेकेति समवेत- विशेषणम्। हिन्दी-कला “नित्यमेकमनेकानुगतं सामान्यम्” यह मूलोक्त सामान्य का स्वरूप है। “नित्यत्वे सति अनेकसमवेतत्वं सामान्यत्वम्” यह सामान्य का परिष्कृत लक्षण है। इसमें “नित्यत्वे सति” यह पद न दिया जाय तो अनेकसमवेतत्व (समवायसम्बन्ध से अनेक में रहना) संयोगादि में भी है, अतः उसमें सामान्यलक्षण की अतिव्याप्ति हो जायगी। उसके वारण के लिये नित्यत्वविशेषण दिया। संयोग तो द्विष्ठ होने से अनेक- समवेत है। यदि “अनेकसमवेतत्व” विशेषण न दिया जाय और नित्यत्वमात्र लक्षण किया जाय तो आकाशादि नित्यपदार्थ में अतिव्याप्ति हो जायगी, उसके वारणार्थ 'अनेकसमवेत' पद दिया। आकाश के नित्य होने पर भी समवेत (समवायसम्बन्ध से वर्तमान) नहीं होने से अतिव्याप्ति नहीं हुई। 'अनेकसमवेतत्व' के अन्तर्गत 'अनेक' पद न दिया जाय, अर्थात् “नित्यत्वविशिष्टसमवेतत्व” मात्र लक्षण किया जाय तो आकाशगत एकत्व एवं परिमाण आदि में तथा जलीयपरमाणुगत रूपादि में भी सामान्यलक्षण की अ तव्याप्ति होने लगेगी। क्योंकि जलीयपरमाणुगतरूप आदि तथा आकाशगत एकत्व-संख्या एवं परिमाण आदि नित्य होते हुए समवेत (समवायसम्बन्ध से रहने वाला) पदार्थ है। अतः 'अनेक' यह समवेत का विशेषण दिया। जलीयपरमाणुगत रूपादि एवं आकाशगत एकत्व-परिमाण आदि एक एक में समवेत होने से अनेकसमवेत नहीं हैं। अतः अतिव्याप्तिदोष का वारण हो गया।