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तर्कसंग्रह एवं न्यायबोधिनी (अन्नम्भट्ट - पं. केदारनाथ त्रिपाठी सान्वय सटीक)

Tarkasangraha with Nyayabodhini of Annambhatta by Kedarnath Tripathi

अन्नम्भट्ट द्वारा

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

न्यायबोधिनी-कलासंवलितः ७५ नित्यमेकमनेकानुगतं सामान्यम्। द्रव्यगुणकर्मवृत्ति। परं सत्ता, अपरं द्रव्यत्वादि। जो नित्य हो, एक हो और अनेक में समवायसम्बन्ध से रहे, वह सामान्य है। वह द्रव्य, गुण और कर्म में रहता है। सामान्य दो प्रकार का होता है—परसामान्य और अपरसामान्य। सत्ता परसामान्य (परजाति) है तथा द्रव्यत्व आदि अपर- सामान्य (अपरजाति) है। न्यायबोधिनी सामान्यं निरूपयति—नित्यमेकमिति। नित्यत्वे सत्यनेकसमवेतत्वं सामा- न्यलक्षणम्। नित्यत्वविशेषणानुपादानेऽनेकसमवेतत्वस्य संयोगादौ सत्त्वा- तत्रातिव्याप्तिस्तद्वारणाय नित्यत्वविशेषणम्। अनेकसमवेतत्वानुपादाने नित्यत्वमात्रोपादाने आकाशादावतिव्याप्तिस्तद्वारणायनेकसमवेतत्वम्। अनेकसमवेतत्वानुपादाने नित्यत्वविशिष्टसमवेतत्वमात्रोक्तावाकाशगतैकत्व- परिमाणादौ जलपरमाणुगतरूपादौ चातिव्याप्तिः, जलपरमाणुगतरूपादेरा- काशगतैकत्वपरिमाणादेर्नित्यत्वात् समवेतत्वाच्च, अतः अनेकेति समवेत- विशेषणम्। हिन्दी-कला “नित्यमेकमनेकानुगतं सामान्यम्” यह मूलोक्त सामान्य का स्वरूप है। “नित्यत्वे सति अनेकसमवेतत्वं सामान्यत्वम्” यह सामान्य का परिष्कृत लक्षण है। इसमें “नित्यत्वे सति” यह पद न दिया जाय तो अनेकसमवेतत्व (समवायसम्बन्ध से अनेक में रहना) संयोगादि में भी है, अतः उसमें सामान्यलक्षण की अतिव्याप्ति हो जायगी। उसके वारण के लिये नित्यत्वविशेषण दिया। संयोग तो द्विष्ठ होने से अनेक- समवेत है। यदि “अनेकसमवेतत्व” विशेषण न दिया जाय और नित्यत्वमात्र लक्षण किया जाय तो आकाशादि नित्यपदार्थ में अतिव्याप्ति हो जायगी, उसके वारणार्थ 'अनेकसमवेत' पद दिया। आकाश के नित्य होने पर भी समवेत (समवायसम्बन्ध से वर्तमान) नहीं होने से अतिव्याप्ति नहीं हुई। 'अनेकसमवेतत्व' के अन्तर्गत 'अनेक' पद न दिया जाय, अर्थात् “नित्यत्वविशिष्टसमवेतत्व” मात्र लक्षण किया जाय तो आकाशगत एकत्व एवं परिमाण आदि में तथा जलीयपरमाणुगत रूपादि में भी सामान्यलक्षण की अ तव्याप्ति होने लगेगी। क्योंकि जलीयपरमाणुगतरूप आदि तथा आकाशगत एकत्व-संख्या एवं परिमाण आदि नित्य होते हुए समवेत (समवायसम्बन्ध से रहने वाला) पदार्थ है। अतः 'अनेक' यह समवेत का विशेषण दिया। जलीयपरमाणुगत रूपादि एवं आकाशगत एकत्व-परिमाण आदि एक एक में समवेत होने से अनेकसमवेत नहीं हैं। अतः अतिव्याप्तिदोष का वारण हो गया।

७६ तर्कसंग्रहः [ अवशिष्टपरिच्छेदः नित्यद्रव्यवृत्तयो व्यावर्तका विशेषाः । जो नित्य द्रव्य में रहने वाला एवं इतर का व्यावर्तक ( भेदक ) है, वह विशेष- नामक पदार्थ कहाता है । न्यायबोधिनी नित्यद्रव्यवृत्तय इति । नित्यद्रव्येषु परमाण्वादिषु वर्तमानाः, अत एव व्यावर्तकाः = इतरभेदानुमितिहेतवः = नित्यद्रव्यवृत्तित्वरूपपक्षधर्मताप्रयो- ज्येतरभेदानुमापकताशालिन इत्यर्थः । नित्यद्रव्यनिष्ठविशेष्यता निरूपितैक- मात्रवृत्तिभेदानुमितिजनकतावच्छेदकप्रकारताश्रयत्वं विशेषाणां लक्षणमिति भावः । पार्थिवपरमाणौ जलादिभेदानुमापकगन्धेऽतिव्याप्तिवारणाय एकमात्र- वृत्तित्वं भेदविशेषणम् । घटादौ तदितरभेदानुमापके तद्रूपादावतिव्याप्ति- हिन्दी-कला नित्य द्रव्य में वर्तमान हों और इतर व्यावर्तक हों, वे विशेष हैं। इस मूलोक्त विशेषलक्षण का स्पष्टार्थ यों है—नित्य द्रव्य जो परमाणु आदि हैं, उनमें वर्तमान हों, और इसीलिये व्यावर्तक अर्थात् इतरभेदानुमिति के हेतु हैं। तात्पर्य यह है कि नित्य द्रव्य पक्ष है, उसमें विशेष-हेतु का वर्तमान रहना ही पक्षधर्मता है। इस प्रकार नित्यद्रव्यवृत्तित्वरूप पक्षधर्मता के बल से विशेषपदार्थ इतरभेदानुमापक होता है। इस प्रकार विशेष का यह लक्षण हेतुगर्भ है। अर्थात् नित्यद्रव्यवृत्ति होने के कारण इतरव्यावर्तक ( इतरभेदानुमापक ) विशेष हैं । विशेष का परिष्कृत लक्षण यह है—नित्यद्रव्यनिष्ठ जो विशेष्यता, उससे निरूपिता तथा एकमात्रवृत्तिभेदानुमितिजनकता की अवच्छेदिका जो प्रकारता, उसका आश्रयत्व विशेष का लक्षण है । इस परिष्कृत लक्षण का स्पष्टीकरण 'संस्कृत- कला' व्याख्या में द्रष्टव्य है । भेद में एकमात्रवृत्तित्वविशेषण देने का यह प्रयोजन है कि नित्यद्रव्य पार्थिव परमाणु में जलादिभेद का अनुमापक गन्ध होता है, ( जैसे, पार्थिवपरमाणुः जलादि- भिन्नः गन्धवत्त्वात् ) वहाँ गन्ध में विशेषलक्षण की अतिव्याप्ति न हो । "तद्घटः तदितरभिन्नः, तदीयरूपात्" यहाँ पर एक द्रव्य तद्घट में इतरभेद का अनुमापक तद्रूप में विशेषलक्षण की अतिव्याप्ति न हो जाय, इसके लिये लक्षण में "नित्यद्रव्यनिष्ठ- विशेष्यतानिरूपित" यह प्रकारता का विशेषण कहा । घट के अनित्य द्रव्य होने से तद्रूपनिष्ठा प्रकारता नित्यद्रव्यनिष्ठविशेष्यतानिरूपिता नहीं है । इसलिये अति- व्याप्ति नहीं हुई । मूलोक्त लक्षण में "नित्यद्रव्यवृत्तयः" यह पद प्रयोजकत्व के अभिप्राय से दिया गया है, तथा 'व्यावर्तकाः' यह पद प्रयोज्यत्व के अभिप्राय से दिया गया है । अर्थात्

न्यायबोधिनी-कलासंवलितः ७७ नित्यसम्बन्धः समवायः । अयुतसिद्धवृत्तिः । ययोर्द्वयोर्मध्ये एकमविनश्यदवस्थमपराश्रितमेवावतिष्ठते तावयुतसिद्धौ । यथा अवयवावयविनौ गुणगुणिनौ क्रियाक्रियावन्तौ जातिव्यक्ती विशेष- नित्यद्रव्ये चेति । नित्यसम्बन्ध को समवाय कहते हैं। यह अयुतसिद्ध पदार्थों में रहता है। जिन दो पदार्थों के मध्य एक अविनाश की अवस्था में रहता हुआ दूसरे के आश्रित ही रहता है, वे दोनों अयुतसिद्ध कहे जाते हैं। जैसे—अवयव-अवयवी, गुण-गुणी, क्रिया-क्रियावान्, जाति-व्यक्ति और विशेष-नित्यद्रव्य ये अयुतसिद्ध हैं। अर्थात् अवयवी जबतक रहेगा, अवयव के आश्रित ही होकर रहेगा। ऐसे ही गुण, क्रिया, जाति और विशेष क्रमशः गुणी, क्रियावान्, व्यक्ति और नित्यद्रव्य के आश्रित ही रहते हैं। इसलिये गुण-गुणी आदि भी अयुतसिद्ध पदार्थ हैं। न्यायबोधिनी वारणाय निरूपितान्तं प्रकारताविशेषणम् । एतेन 'व्यावर्तका' इत्यस्य नित्य- द्रव्यविशेष्यकेतरभेदानुमितिप्रयोजका इत्यर्थकतया लक्षणपरत्वेन साफल्ये- ऽपि नित्यद्रव्यवृत्तय इति विफलमेव, स्वरूपाख्यानस्यापि कृतत्वादिति प्रत्युक्तम् । समवायं निरूपयति नित्येति । सम्बन्धत्वं विशिष्टप्रतीतिनियामक- त्वम् । तावन्मात्रोक्तौ संयोगेऽतिव्याप्तिरतो नित्य इति विशेषणम् । ययो- हिन्दी-कला विशेषपदार्थ के इतरव्यावर्तक होने में नित्यद्रव्यवृत्तित्वरूप पक्षधर्मता प्रयोजक है। यही प्रयोज्यप्रयोजकभाव प्रकट करने के लिये "नित्यद्रव्यवृत्तय" यह पद सार्थक होता है। अन्यथा 'व्यावर्तकाः' इस पद का ही 'नित्यद्रव्यविशेष्यकेतरभेदानुमिति- प्रयोजकाः' इतना अर्थ होने से लक्षण पर्यवसित हो जाता है, अतः 'नित्यद्रव्यवृत्तयः' यह पद निष्फल ही हो जाता। यह कहना कि—'नित्यद्रव्यवृत्तयः' यह पद लक्षणपरक न होने पर भी स्वरूपकथनमात्र के लिये है अर्थात् वस्तुस्थितिमात्र को बताता है, यही उसकी सार्थकता है—तो यह भी ठीक नहीं है। क्योंकि उक्त प्रयोजन भी 'व्यावर्तकाः' इस पद से ही सिद्ध हो जाता है। अतः प्रयोज्य-प्रयोजकभाव सूचित करने में ही 'नित्यद्रव्यवृत्तयः' इस पद की सार्थकता जाननी चाहिये। नित्यसम्बन्धत्व समवाय का लक्षण है। अन्य संयोगादि सम्बन्ध अनित्य होते हैं। विशिष्टप्रतीति का नियामकत्व सम्बन्ध का लक्षण है। समवाय के लक्षण में यदि नित्य-पद न दिया जाय, किन्तु सम्बन्धत्वमात्र कहा जाय तो संयोग में समवायलक्षण की अतिव्याप्ति हो जायगी, क्योंकि वह भी सम्बन्ध है। नित्य-पद देने से संयोग के अनित्य होने के कारण अतिव्याप्ति का वारण हो गया।

७८ तर्कसंग्रहः [ अवशिष्टपरिच्छेदः अनादिः सान्तः प्रागभावः, उत्पत्तेः पूर्वं कार्यस्य । सादिरनन्तः प्रध्वंसः, उत्पत्त्यनन्तरं कार्यस्य । त्रैकालिकसंसर्गावच्छिन्नप्रतियोगिताकोऽत्यन्ताभावः । यथा- भूतले घटो नास्तीति । जो अनादि होता हुआ सान्त ( अन्तवान् ) हो, उसे प्रागभाव कहते हैं । जैसे— उत्पत्ति के पूर्व कार्य का प्रागभाव रहता है । जो सादि ( आदिमान् ) होता हुआ अनन्त हो, उसे प्रध्वंस कहते हैं । जैसे— कार्य का अपनी उत्पत्ति के अनन्तर प्रध्वंस उत्पन्न होता है । त्रैकालिकसंसर्ग से अवच्छिन्न है प्रतियोगिता जिस अभाव की, वह अभाव अत्यन्ताभाव कहाता है । जैसे—"भूतले घटो नास्ति" यह अभाव अत्यन्ताभाव है । न्यायबोधिनी द्वयोर्मध्य इति । यन्निष्ठकालनिरूपिताधेयतासामान्यं यदवच्छिन्नं तदुभया- न्यतरत्वमयुतसिद्धत्वमित्यर्थः । अत्यन्ताभावं निरूपयति--त्रैकालिकेति । ( प्रागभावाप्रतियोगित्वे सति ध्वंसाप्रतियोगित्वे सत्यन्योन्याभावभिन्नत्वे सति अभावत्वमत्यन्ताभावस्य लक्षणम् । ध्वंसप्रागभावान्योन्याभावाकाशादीनां वारणाय यथाक्रमं विशेष- णोपादानम् । वस्तुतस्तु संसर्गाभावत्वं तादात्म्यभिन्नसम्बन्धावच्छिन्नप्रति- हिन्दी-कला यद्वृत्तिकालनिरूपित-आधेयतासामान्य जिससे अवच्छिन्न होकर रहे, वे दोनों परस्पर में अयुतसिद्ध कहे जाते हैं । जैसे घट-घटत्व दोनों अयुतसिद्ध हैं, अर्थात् जुदा होकर नहीं रहते । घट को छोड़कर घटत्व कहीं अन्यत्र नहीं रहता और घटत्वविहीन होकर घट भी नहीं रहता । दोनों साथ-साथ काल में रहते हैं । विशेष स्पष्टीकरण 'संस्कृत-कला' में द्रष्टव्य है । पूर्वोक्त चतुर्विध अभावों में अत्यन्ताभाव का लक्षण कहते हैं— त्रैकालिकससर्गा- वच्छिन्नप्रतियोगिताक अभाव अत्यन्ताभाव है । अर्थात् पूर्वकालिकसंसर्गावच्छिन्नप्रतियो- गिताक प्रागभाव होता है तथा ध्वंसोत्तरकालि ससर्गावच्छिन्नप्रतियोगिताक प्रध्वंसा- भाव होता है । किन्तु अत्यन्ताभाव तो त्रैकालिकसंसर्गावच्छिन्नप्रतियोगिताक होता है । न्यायबोधिनीकार अत्यन्ताभाव का परिष्कृत लक्षण कहते हैं—जो प्रागभाव का अप्रतियोगी होता हुआ ध्वंस का भी अप्रतियोगी हो तथा अन्योन्याभाव से भिन्न अभाव हो, वह अत्यन्ताभाव है । ध्वंस प्रागभाव का प्रतियोगी होता है तथा प्रागभाव ध्वंस का प्रतियोगी होता है, इसलिये ये दोनों छूट गये । तृतीय विशेषण से अन्योन्याभाव छूट गया । और चतुर्थ 'अभावत्व' विशेषण कहने से आकाश का वारण हो गया । इस प्रकार

न्यायबोधिनी-कलासंबलितः ७९ तादात्म्यसम्बन्धावच्छिन्नप्रतियोगिताकोऽन्योन्याभावः, यथा- घटः पटो नेति । सर्वेषां पदार्थानां यथायथमुक्तेष्वन्तर्भावात्सप्तैव पदार्था इति सिद्धम् । तादात्म्यसम्बन्ध से अवच्छिन्न है प्रतियोगिता जिस अभाव की, वह अभाव अन्योन्याभाव है। जैसे—"घटः पटो न, पटो घटो न" इत्यादि अभाव अन्योन्या- भाव है। न्यायसूत्रोक्त प्रमाण-प्रमेयादि सोलह तथा अन्यों द्वारा स्वीकृत शक्ति-सादृश्य- स्वत्व आदि सभी पदार्थों का यथायोग्य उक्त द्रव्य-गुण-कर्म-सामान्य-विशेष-समवाय और अभाव में ही अन्तर्भाव हो जाने से पदार्थ के सात ही भेद हैं, यह सिद्ध हुआ। न्यायबोधिनी योगिताकाभावत्वम् । ध्वंसप्रागभावयोश्च न संसर्गावच्छिन्नप्रतियोगिताक- त्वमिति तेनैव तद्वारणे त्रैकालिकेति स्वरूपाख्यानमेवेति बोध्यम् ) अन्योन्याभावं निरूपयति—तादात्म्येति । अभावत्रयवारणाय विशेष- णम् । घटाभाववान्नेति प्रतीतिविषयघटादिवारणाय विशेष्यम् । ननु सादृश्यादीनामतिरिक्तपदार्थानामनिरूपणेन न्यूनतेत्यत आह — हिन्दी-कला लक्षणोक्त सभी पदों का उपादान सार्थक है। वस्तुतः मूलोक्त संसर्गाभावत्व का अभिप्राय है—तादात्म्य से भिन्नसम्बन्धावच्छिन्नप्रतियोगिताकाभावत्व । और यही अत्यन्ताभाव का मूलानुसारी लक्षण है। ध्वंस और प्रागभाव तो ससर्गविच्छिन्नप्रतियोगिताक नहीं होते हैं अर्थात् इनकी प्रतियोगिता संसर्गविच्छिन्ना नहीं होती है, इसी से उनका वारण हो जायगा। अतः मूलोक्त लक्षण में जो त्रैकालिक-पद दिया है, वह केवल स्वरूप- कथन के लिये है, न कि ध्वंस ओर प्रागभाव में अतिव्याप्तिवारण करने के लिये है। अतः लक्षण में त्रैकालिकत्व का सन्निवेश नहीं है । "भूतले घटो नास्ति" यह अत्यन्ता- भाव का उदाहरण है। तादात्म्यसम्बन्धावच्छिन्नप्रतियोगिताक अभाव अन्योन्याभाव है। इसमें तादात्म्य- सम्बन्धावच्छिन्नत्वविशेषण देने से शेष तीनों अभावों का वारण हो गया। यदि तादात्म्यसम्बन्धावच्छिन्नप्रतियोगिताकत्व न कह कर तादात्म्यसम्बन्धावच्छिन्नप्रति- गितावगाहिज्ञानविषयत्व लक्षण किया जाय तो "घटाभाववान्न" इस ज्ञान के विषय घटादि में भी अन्योन्याभावलक्षण की अतिव्याप्ति हो जायगी। अतः "प्रति- योगिताक" यह विशेष्य पद दिया। यहाँ प्रतियोगितानिरूपक घट नहीं हो सकता। शङ्का—मीमांसकोक्त सादृश्य-शक्ति आदि तथा न्यायसूत्रोक्त प्रमाण आदि अतिरिक्त पदार्थों का यहाँ निरूपण नही करने से ग्रन्थकार की न्यूनता क्यों न सिद्ध हुई ?

८० तर्कसंग्रहः [ अवशिष्टपरिच्छेदः काणादन्यायमतयोर्बालव्युत्पत्तिसिद्धये । अन्नम्भट्टेन विदुषा रचितस्तर्कसंग्रहः ॥ कणादमुनिद्वारा प्रतिपादित वैशेषिक एवं गौतममुनिद्वारा प्रतिपादित न्यायमतों में बालकों की व्युत्पत्ति ( बोध ) सिद्धि के लिए विद्वान् अन्नम्भट्ट ने इस तर्कसंग्रहनामक ग्रन्थ की रचना की । ॥ इति श्रीमन्महामहोपाध्यायान्नम्भट्टविरचितस्तर्कसंग्रहः समाप्तः ॥ न्यायबोधिनी सर्वेषामिति । प्रमाण-प्रमेय-संशय-प्रयोजन-दृष्टान्त-सिद्धान्तावयव-तर्क- निर्णय-वादजल्प-वितण्डा-हेत्वाभास-च्छल-जाति-निग्रहस्थानानां तत्त्वज्ञा- नान्निःश्रेयसाधिगम' इति न्यायस्यादिमसूत्र उक्तानां प्रमाणप्रमेयादीना- मित्यर्थः । तद्भिन्नत्वविशिष्टतद्गतभूयोधर्मरूपसादृश्यस्यापि घटपटादिरूपत्वेन नातिरिक्तत्वम् । एवमन्येषामप्यूह्यम् । काणादेति । कणादस्येदं काणादम् । काणादन्यायमते इति द्वन्द्वगर्भकर्म- धारयः । कणादप्रोक्तगौतमप्रोक्तमतयोरिति यावत् । काणादन्यायाभिन्नम- तद्वयविषय ( क ) बालसमवेताभिन्नव्युत्पत्तिसिद्धिप्रयोजकान्नंभट्टविद्वन्निष्ठभूत- कालीनकृतिविषयाभिन्नस्तर्कसंग्रहाख्यग्रन्थ इत्यन्वयबोधः । हिन्दी-कला समाधान— न्यायसूत्रोक्त प्रमाणप्रमेयसंशयप्रयोजनादि का यथायोग्य इन्हीं सात पदार्थों में अन्तर्भाव होने से न्यूनता नहीं है । इसी प्रकार "तद्भिन्नत्वे सति तद्गत- भूयोधर्मवत्त्वरूप सादृश्य भी घट-पटादि द्रव्यरूप होगा तथा कहीं गवादिरूप होगा, अतः यह सप्तातिरिक्त नहीं है । विशेष स्पष्टीकरण 'संस्कृत-कला' व्याख्या में द्रष्टव्य है । ग्रन्थ के अन्त में उल्लिखित "काणादन्यायमतयोः" इस श्लोक में काणादपद कणादप्रोक्तपरक है, तथा न्यायपद गौतमप्रोक्तपरक है । अतः पहले काणादपद और न्यायपद में द्वन्द्वसमास होगा, जिसका अर्थ होगा "दोनों महर्षियों द्वारा प्रोक्त । पुनः काणादन्यायपद का द्विवचनान्त 'मते' इस पद के साथ कर्मधारयसमास होगा । इस प्रकार काणाद और न्याय से अभिन्न जो मतद्वय अर्थात् कणादप्रोक्त ओर गौतम- प्रोक्त से अभिन्न जो मतद्वय, तद्विषयक बालक में समवेत ( समवायसम्बन्ध से वर्तमान ) जो व्युत्पत्ति, उसकी सिद्धि की प्रयोजिका जो अन्नंभट्टनामक विद्वान् में स्थित भूतकालीना कृति, उसका विषय यह तर्कसंग्रहनामक ग्रन्थ है । इस प्रकार का अन्वयबोध उक्त श्लोक से होता है ।

न्यायबोधिनी-कलासंवलितः ८१ न्यायबोधिनी कृष्णावलम्बिनो गाः पूषा गोवर्धनस्तमभ्यर्चन् । विपुलाभीरसभाजनजितविबुधेन्द्रस्तवाभिरचनाभिः ॥ २ ॥ ॥ इति तर्कसंग्रह-न्यायबोधिनी समाप्ता ॥ हिन्दी- "हे कृष्ण ! सच्चिदानन्दघन परमात्मन् ! मेरी समस्त इन्द्रियों को अपने चरणारविन्द में लगाते हुए रक्षा करो" इस बुद्धि से समस्त संसार के प्रकाशक भगवान् भास्कर के समान जिज्ञासुजन को न्यायशास्त्र के व्याख्यान से समस्त पदार्थों का बोध कराने वाले गोवर्धन सुधी, रसों के शिरोमणिभूत भक्तिरस से पूरित होने के कारण महापण्डितों द्वारा की गई स्तुतियों को भी जीतने वाले अपने प्रशस्त वाणी- विलासों द्वारा उस परमात्मभूत भगवान् कृष्ण की अभ्यर्चंना करते हैं । इति न्यायवेदान्तसांख्ययोगाचार्यश्रीकेदारनाथत्रिपाठि- प्रणीतायां तर्कसंग्रहन्यायबोधिन्याः 'हिन्दी-कला' व्याख्यायामवशिष्टपरिच्छेदः पूर्णः ।

प्रदीपः सर्वविद्यानामुपायः सर्वकर्मणाम् । आश्रयः सर्वधर्माणां विद्योद्देशे प्रकीर्तिता ॥ इति न्यायविद्याप्रशस्तिः

अथ तर्कसङ्ग्रहन्यायबोधिन्याः ‘संस्कृत-कला’ व्याख्या प्रत्यक्षपरिच्छेदः विश्ववन्द्यपदपद्मरेणुभिः स्पर्शमात्रधृततारणव्रतैः। ईश्वरस्य भवलीनमानसान् स्वान् कथं नहि पुनीमहि द्रुतम् ? ॥ यं तमीश्वरममन्यतैवं वै भिन्नधीमिरखिलोऽपि मानवः। न्यायतोऽपि मतिमानयन्नयं तं नमंश्च कुरुते कुतूहलम् ॥ न्या.बो. शास्त्राण्यप्यञ्जसा भान्ति भास्वतो यस्य सत्तया। पृ.१. सूर्य्यनारायणं शुक्लं गुरुं तं नौमि विश्रुतम् ॥ “समाप्तिकामो मङ्गलमाचरेदिति” श्रुतिप्रामाण्यात् चिकीर्षितस्य ग्रन्थस्य निर्विघ्नपरिसमाप्त्यर्थं मङ्गलकरणं नितरामावश्यकमिति निश्चित्य मनसि विधीयमानं मङ्गलं शिष्या अप्येवं कुर्युुरिति बुद्ध्या ग्रन्थादौ निबध्नन् चिकीर्षितं प्रतिजानीते—अखिलेति। अखिलानागमान् सञ्चरति तच्छीलमिति विग्रहे ‘सुप्यजातौ णिनिस्ताच्छील्ये’ इति पाणिनिसूत्रेण णिनिः। तत् = समस्तागमजन्य- प्रतिपत्तिविषयमित्यर्थः। समस्तागमप्रतिपाद्यमिति यावत्। भूप्रभृतिभागानां मनुष्यादिकर्तृकसञ्चाराश्रयत्ववत् आगमानां भगवत्कर्तृकयथाश्रुतसञ्चाराना- श्रयत्वादिति भावः। कृष्ण इति आख्या यस्य तत् कृष्णाख्यम् इति पूर्वं बहुव्रीहिः समासः, पश्चात् श्रिया युक्तं कृष्णाख्यं श्रीकृष्ण्णाख्यमिति मध्यमपदलोपिसमासः, न तु श्रिया युक्तः कृष्णः श्रीकृष्णः, श्रीकृष्ण इति आख्या यस्य तत् श्रीकृष्ण- ख्यमिति रीत्या समासः, श्रीशब्दस्य नामानन्तर्गतत्वात्। श्रीशब्दस्यापि नामान्त- र्गत्वे तु हर्यादिपदानां द्व्यक्षरत्वानुपपत्तिः। परं—लोकोत्तरम्, महः—तेजः। “तस्य भासा सर्वमिदं विभाति” इति श्रुतिबलाद् भगवतस्तेजोरूपतोक्तियुक्त्तैव। ध्यात्वा—तद्विषयकध्यानान्तरमित्यर्थः। क्त्वाप्रत्ययस्य अव्यवहितोत्तराथंकत्वा- दिति भावः। सुष्ठु ध्यायतीति सुधीः—विद्वान्। गोवर्धननामा सुधीः गोवर्धन- सुधीरिरिति शाकपार्थिवादिपदवत् मध्यमपदलोपिसमासः। न्यायबोधिनीम्— एतन्नाम्नीं न्यायपदार्थबोधिकां व्याख्यां, तनुते—विस्तारयति, विवरणग्रन्थनिर्माणेण बहुतरसम्बद्धां करोति। तर्कसंग्रहग्रन्थस्थार्थान् भूयसः शिष्यान् बोधयतीति तु फलितोऽर्थः।

८४ तर्कसंग्रहे [ प्रत्यक्षपरिच्छेदः चिकीर्षितस्य तर्कसंग्रहग्रन्थस्य निर्विघ्नसमाप्त्यर्थं श्रीमदन्नम्भट्टेन कृतस्येष्ट- देवतानमस्कारात्मकमङ्गलस्य तेनैव यो ग्रन्थादौ निबन्धः कृतस्तस्य शिष्यशिक्षा- रूपप्रयोजनं ज्ञापयितुं न्यायबोधिनीकारः—चिकीर्षितस्येत्यादिना । न्या.बो. ‘अथ पदार्थान् विभजते’ इत्यत्र ‘अथेति’ शब्द आनन्तर्यार्थः, मङ्गलकरणा- पृ.२. नन्तरमित्यर्थः । वस्तुतस्तु तर्कसंग्रहग्रन्थस्य बालानां सुखबोधार्थं कृतत्वात् ये ग्रहण- धारणपटवस्तेषामेवात्र बालत्वात्—शिष्याणां पठिष्यमाणविषयग्रहणधारणपटुत्व- सम्पत्त्यनन्तरमित्यर्थः । ‘पदार्थान् विभजते’ इत्यत्र द्वितीयाविभक्तेः कर्मत्व- मर्थः । धातूत्तरप्रत्ययस्य कृतिमत्त्वमर्थः । तथा च पदार्थकर्मकविभागानुकूलकृतिमान् मूलकार इति सम्पूर्णवाक्याद् बोधः । विभागपदार्थश्च स्वसमभिव्याहृतपदार्थता- वच्छेदकव्याप्यमिथोविरुद्धयावद्धर्मप्रकारकबोधानुकूलो व्यापारः । अत्र च स्वपदेन विपूर्वकभज्धातुः ग्राह्यः । तत्समभिव्याहृतम् अर्थात् तत्संनिकटे विद्यमानं पदं—पदार्थानिति पदं, तदर्थतावच्छेदकं पदार्थत्वम्, तद्व्याप्या मिथोविरुद्धाश्च यावन्तो धर्माः—द्रव्यत्व, गुणत्व, कर्मत्व, सामान्यत्व, विशेषत्व, समवायत्वा- भावत्वधर्माः । यतो हि यथा यत्र यत्र धूमोऽस्ति तत्र तत्र वह्निरवश्यं विद्यते तस्माद् धूमो वह्निव्याप्य इति कथ्यते । तथैव यत्रयत्र द्रव्यत्वादयः सप्त धर्माः सन्ति तत्र तत्र पदार्थत्वमवश्यमस्ति, तस्मात् पदार्थत्वव्याप्या द्रव्यत्वादिधर्माः । मिथो विरुद्धास्ते द्रव्यत्वादिधर्मा इत्यत्र तु शङ्कैव नास्ति । नहि द्रव्यत्वाधिकरणे गुणत्वम्, गुणत्वाधिकरणे द्रव्यत्वं वास्ति । एवमन्यत्रापि । यावद्धर्मप्रकारकबोधाः— इदं द्रव्यम्, अयं गुणः, इदं कर्म, इदं सामान्यं, अयं विशेषः, अयं समवायः, अयमभाव इति बोधाः सन्ति ! तथा हि प्रत्येकं सविकल्पके ज्ञाने कश्चित् प्रकारो भवति कश्चिद् विशेष्य इति । यथा अयं घट इति ज्ञाने घटत्वं प्रकारः घटश्च विशेष्यो भवति, तथा इदं द्रव्यमित्यादिपूर्वोक्तज्ञानेष्वपि द्रव्यत्वगुणत्वादयः प्रकाराः सन्ति, तस्मात् पूर्वोक्ता बोधाः द्रव्यत्वादिप्रकारकाः जाताः, तादृश- बोधानामनुकूलो व्यापारः द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य विशेष, समवायाभावा इति रीत्या पृथक्-पृथक् लेखनकथनादिरूपः, स एव च विभागपदेन कथ्यते । अग्रेप्येव- मेव द्रव्याणि विभजते, गुणान् विभजते इत्यादिस्थलेषु विभागपदार्थो वेदितव्यः । ननु द्रव्यगुणकर्मसामान्यविशेषसमवायाभावाः पदार्थाः इति लेखनमात्रेण गणयित्वैव सप्त पदार्था इति ज्ञानसंभवे सप्तग्रहणं किमर्थमित्यत आह—तत्रेत्यादि । तत्र—द्रव्यगुणेत्यादिवाक्ये, सप्तग्रहणम्-सप्तपददानमित्यर्थः। व्याप्तिलाभायेति । साहचर्यनियमो हि व्याप्तिः । तथाहि यत्र यत्र धूमो विद्यते तत्र तत्र वह्निरस्तीति धूमो वह्निव्याप्यो भवति, तथा यत्र यत्र पदार्थत्वं तत्र तत्र द्रव्यादिसप्तान्यतमत्व- मस्ति, अर्थात् स स द्रव्यादिसप्तानाम् अन्यतम एव भवति । यथा पदार्थत्वं द्रव्ये-

न्यायबोधिनी-संस्कृत-कला [८५]

ऽस्ति तर्हि द्रव्यमपि सप्तसु अन्यतममेव वर्तते । एवं पदार्थत्वाश्रयाः प्रत्येकं गुणा- दयोऽपि द्रव्यादिषु सप्तसु अन्यतमा एव वर्तन्ते । अतः पदार्थत्वं द्रव्यादिसप्तान्य- तमत्वव्याप्यमिति सिद्धमेव । तथा चैतादृशव्याप्तिलाभायैव सप्तग्रहणमिति । अयं भावः—यथा धूमो वह्निव्याप्यः सन् वह्न्यभावस्थाने न भवति किन्तु वह्न्यधिकरणे एवोत्पद्यते, तथैव पदार्थत्वमपि द्रव्यादिसप्तान्यतमत्वव्याप्यं सत् द्रव्यादिसप्तान्यतममतिक्रम्य न तिष्ठति किन्तु तदन्तर्गतमेव तिष्ठति । अर्थात् द्रव्यादिसप्तभ्योऽन्योऽष्टमः कश्चित् पदार्थ एव न भवतीति स्पष्टं भवति । सप्तैव पदार्था इति पूर्वोक्तं दूषयितुं शक्तिरूपमष्टमं पदार्थमाशङ्कते- नन्विति । तथाहि मण्यादीति । अयमत्र पूर्वपक्षाशयः । काष्ठादिरूपेन्धनादौ वह्नेः संयागे सति दाहो जायते, किन्तु तत्रैव चन्द्रकान्तमणिसंयोगे कृते वह्निसत्त्वे- ऽपि दाहो न जायते, तस्य मणेरपसारणे तु जायते । अतः कल्प्यते यत् मणिसमवधाने वह्नेः दाहकताशक्तिर्नश्यति, सैव शक्तिर्मण्यभावदशायामुत्पद्यते इति । तस्मादेतत् सिद्ध्यति यत् अस्त्येका शक्तिर्या उत्पद्यते विनश्यति चेति । सैव चाष्टमः पदार्थ इति । अत्रोत्तरमाह—मणेः प्रतिबन्धकत्वेनेति । अयमत्र समाधानाश्यः—यथा कुलालो यदा घटं कर्तुमारभते तदैव यदि कश्चित् राजपुरुष आयाति तदा इच्छन्नपि स घटं कर्तुं न पारयति, तेन किं कुलालस्य घटकरणशक्तिर्नष्टा ? नहि, किन्तु तत्र राज- पुरुषस्य प्रतिबन्धकत्वं मन्यते तदभावस्य च कारणत्वं मन्यते । तथैव मणिसमवधाने वह्निसत्त्वेऽपि यदि दाहो न जायते तदा वह्नेर्दाहकताशक्ति- र्नष्टा इति न मन्तव्यम्, किन्तु मणेर्दाहं प्रति प्रतिबन्धकत्वमेव तत्र स्वीकरणीयम् । प्रतिबन्धकसत्त्वे कार्य्यासञ्जनात् प्रतिबन्धकाभावस्यापि कार्यं प्रति कारणत्व- स्वीकारात् । तदानीं प्रतिबन्धकाभावरूपं कारणमेव नास्तीति कुतो दाहो जायेत ? मण्यभावदशायान्तु प्रतिबन्धकाभावरूपकारणसत्त्वात् दाहो भविष्यत्येवेति न काचित् क्षतिः । तस्मादनेनैव पथा सर्वनिर्वाहे व्यर्था शक्तिकल्पना । नहि युक्त्य- भावादेव शक्तिरस्वीकारार्हा, दोषादपि नाङ्गीकारार्हेत्याह अनन्तेति । तथा च वारं वारं मण्यपसारणेऽनन्ताः शक्तयः, मणिस्थापने चानन्तास्तासां ध्वंसाः प्राग- भावाश्च स्वीकरणीया भविष्यन्तीति महदन्याय्यमिति भावः । अक्षराथंस्तु व्याख्यानुसारी स्वयं करणीयः । न्या.बो. द्रव्याणि विभजते इति । अस्यापि द्रव्यकर्मकविभागानुकूलव्यापारवान् पृ.३. मूलकार इति पूर्वरीत्यैवार्थ : पूर्वाचार्यैः नवानामेव पृथिव्यादीनां द्रव्याणां स्वीकृतत्वात् तद्दूषयितुं तमोरूपं दशमं द्रव्यमाशङ्कते—नन्वित्यादिना । तथाहितीति । नीलं तमश्चल- तीति प्रतीतिः तमसि नीलरूपं चलनक्रियाञ्च बोधयति । यद् गुणवत् क्रियावद्

८६ तर्कसंग्रहे [ प्रत्यक्षपरिच्छेदः वा भवति तद् द्रव्यं भवति, तस्मात् तमोऽपि नीलरूपगुणवत् चलनक्रियावच्च वर्ततेऽतः तदपि द्रव्यं सिद्धं भवति इति भावः । नवद्रव्यवादी शङ्कते-न चेति । कॢप्तद्रव्येषु-निश्चितेषु नवद्रव्येष्वित्यर्थः । अन्तर्भावात् तेष्वेवान्तःपातित्वात्, दशमं द्रव्यं तमो नास्तीत्याशयः । दशमद्रव्यत्ववाद्युत्तरयति-तमसो रूपवत्त्वा- दिति । अयं भावः-तमसो वायौ, आकाशकालदिगात्ममनःसु च नान्तर्भावः, तमसो रूपवत्त्वात् तेषाञ्च नीरूपत्वात् । न पृथिव्यामन्तर्भावः, तस्या गन्धवत्त्वात् तमसश्च गन्धरहितत्वात् । न जलतेजसोरन्तर्भावः, तयोःक्रमेण शीतोष्णस्पर्शवत्त्वात् तमसश्च निःस्पर्शत्वात् । तस्मान्नवसु कुत्राप्यनन्तर्भावात् तमसो दशमद्रव्यत्वम् सिद्धमेवेति । अत्र सिद्धान्ती समाधत्ते-नेति । अयं भावः-तमो न कश्चित् भावपदार्थो येन तस्य दशमद्रव्यत्वशङ्कापि स्यात् । यतो हि भावपदार्थ एव द्रव्यं कथ्यते, तमस्तु तेजोऽभावरूपं सत् सप्तमे पदार्थ एवान्तर्भवति । तस्मात् तमसो दशमद्र- व्यत्वं दूरमास्ताम्, द्रव्यत्वमेव तस्य नास्तीति भावः । अतिरिक्तकल्पनायाम्- दशमद्रव्यत्वकल्पनायाम् । द्रव्यत्वमेव तस्य नास्तीति भावः । तेजोऽभावरूपत्वेने- वोपपत्तौ-तेजोऽभावस्वरूपस्य तस्याङ्गीकारेणैव सर्वदोषपरिहारे । अतिरिक्त- कल्पनायाम्-दशमद्रव्यत्वकल्पनायाम् । मानाभावात्-प्रमाणं नास्तीत्यर्थः । न्या.बो. ननु तेजोऽभावरूपं तम इति भवतोच्यते, तेज एव तमोऽभावस्वरूपं कथन्न पृ.४. मन्यते ? अयमेव पक्षो युक्तोऽयं न युक्त इत्यत्र विनिगमनाया अर्थात् एकतरपक्षसाधि- काया युक्तेरभावादिति शङ्कते-न चेत्यादिना । समाधत्ते-तेजसोऽभावरूपत्वे- ति । अयं सारः-तेजो यदि भावपदार्थो न स्यात् तर्हि सर्वैरनुभूयमानस्योष्णस्प- र्शस्य किं द्रव्यमाश्रयः स्यात् ? पृथिव्यादयस्तु नाश्रयो भवितुमर्हन्ति, तेषामनुष्ण- त्वात् । किन्तु अतिरिक्तमेव किमपि द्रव्यं कल्पनीयं स्यात् । तथाच यदि तेजो द्रव्यमपलप्यते तदान्यद् द्रव्यं शिरस्यापतत्येवेति गौरवं स्यात् । तस्मादुष्णस्पर्श- गुणाश्रयतया तेजो द्रव्यं स्वीकरणीयम्, तमश्च तेजोऽभावरूपमङ्गीकरणीयमिति । तर्हि नीलं तमञ्चलतीति प्रतीतेः का गतिर्भविष्यतीत्यत आह-तमसीति । नीलरूपप्रतीतिश्चलनक्रियाप्रतीतिश्च तमसि भ्रमात्मिके एव स्त इति । दीपञ्च- लति न तम इति भावः । न्या.बो. समवायेन गन्धवत्त्वं पृथिव्या लक्षणमित्यर्थः । अस्य लक्षणस्य पृथिवी लक्ष्या । पृ.५. अयं भावः-लक्ष्यते ज्ञायतेऽनेनेति व्युत्पत्त्या करणे ल्युट्प्रत्ययेन लक्षणपदं सिद्धयति । अर्थात् येन स्वरूपेण पदार्थो ज्ञायते तदेव स्वरूपम् लक्षणं कथ्यते । यथा-सास्नया अयं गौरिति ज्ञायते स्मात् सास्ना गोलक्षणम् । अत्रैव गन्धेनैव ज्ञायते इयं पृथिवीति तस्मात् गन्धवत्त्वं पृथिव्या लक्षणमिति । लक्षणेन च यज्- ज्ञायते तदेव लक्ष्यमिति कथ्यते । यथा सास्नारूपलक्षणेन गोर्ज्ञानं भवति 'अयं

३. अनुमान, उपमान एवं शब्द प्रमाण प्रकरण

न्यायबोधिनी-संस्कृत-कला ८७

न्या.बो.गौरिति' तस्माद् गौर्लक्ष्यः । अत्रापि गन्धेन लक्षणेन पृथिवी ज्ञायते 'इयं पृथिवीति' पृ.१. तस्मात् पृथिवी लक्ष्या । एवमेवान्यत्रापि लक्ष्यलक्षणव्यवस्था ज्ञेया । वर्तमानत्व- स्मिन्नर्थे निष्ठशब्दो नव्यनैयायिकैर्व्यवह्रियते । लक्ष्यस्य भावो लक्ष्यता । सा च लक्ष्यता पृथिवीरूपे लक्ष्ये वर्ततेऽतो वक्तव्यं 'लक्ष्यता पृथिवीनिष्ठेति । एवमेव ब्राह्मणत्वं यज्ञदत्तेऽस्ति चेत् यज्ञदत्तनिष्ठब्राह्मणत्वमिति वक्तव्यम् । एवमन्यत्रापि । पृथिवीनिष्ठा या लक्ष्यता तस्या अवच्छेदकं पृथिवीत्वम् । तदेतोपपादयति बोधिनीकारः—यद्धर्मावच्छिन्नमिति । अर्थात् लक्ष्यं पृथिव्यादिकं येन धर्मेणावच्छिन्नं ( विशिष्टं ) स धर्मो लक्ष्य- वच्छेदकः । प्रकृते लक्ष्या पृथिवी पृथिवीत्वेन धर्मेण अवच्छिन्ना अस्ति, तस्मात् पृथिवीनिष्ठलक्ष्यतावच्छेदकं पृथिवीत्वम् । अयमत्र सारसारः—लक्ष्यता सर्वेष्वेव पदार्थेष्वस्ति । न हि जगति कोऽपि पदार्थोऽस्ति यो लक्ष्यो न भवेत् । तथा सर्वोऽपि पदार्थो यदि लक्ष्योऽस्ति तदा लक्ष्यताऽपि पृथिवीजलादिसकलनिष्ठाऽस्ति । अवच्छिनत्ति—विशिनष्टि—व्याव- र्तयतीत्यवच्छेदकम् । तथा च प्रकृते पृथिवीत्वं धर्मः पृथिवीनिष्ठां लक्ष्यतां जलादिनिष्ठलक्ष्यताभ्यो व्यावर्तयति । तस्मात् पृथिवीत्वं पृथिवीनिष्ठलक्ष्यताव- च्छेदकं भवति । अश्वत्वम् अश्वनिष्ठलक्ष्यतावच्छेदकं भवतीति । निष्ठपदार्थो न विस्मरणीयः, अन्यथाऽसामञ्जस्यमुत्पद्येत । एवं पृथिवीनिष्ठा लक्ष्यता पृथिवीत्वावच्छिन्ना । अत्र नियममाह—यो धर्मो यस्यावच्छेदकः स तद्धर्मावच्छिन्न इति । प्रकृते पृथिवीत्वं लक्ष्यताया अव- च्छेदकं विद्यतेऽतो लक्ष्यता पृथिवीत्वावच्छिन्ना । अत एव पृथिवीत्वावच्छिन्न- पृथिवीनिष्ठलक्ष्यतानिरूपितेत्यादिरीत्या योजयित्वा लम्बायमानं वाक्यं रचयन्ति नव्याः । एतच्चाग्रे स्फुटीभविष्यति । लक्ष्यतावत् प्रतियोगिता—अनुयोगिता— विधेयता—उद्देश्यता—आधेयता—अधिकरणता—कार्यता— कारणता-पक्षता- साध्यता—हेतुता—प्रतिबध्यता—प्रतिबन्धकता—शक्यता— शक्तता—इत्यादी- न्यपि भवन्ति । लक्ष्यतावच्छेदकवच्च प्रतियोगितावच्छेदकम्—अनुयोगितावच्छे- दकं—विधेयतावच्छेदकमित्यादीनि भवन्ति । स्थाने स्थाने सर्वाणि विविच्य दर्शयिष्यन्ते । अत्र तावदेषां नाममात्रं स्मरणीयम् । ननु यदि गन्धवत्त्वं पृथिव्या लक्षणं तदोत्पत्तिकालिनो घटः पृथिवी न स्यात्, तदानीं तत्र घटे गन्धवत्त्वलक्षणाभावात् । यतो हि नैयायिका मन्यन्ते— उत्पन्नं द्रव्यं क्षणमगुणं निष्क्रियञ्च तिष्ठतीति । तथा चोक्तलक्षणस्योत्पत्तिका- लीने घटेऽव्याप्तिरिति शङ्कायां लक्षणान्तरमाह—गन्धसमानाधिकरणेति । गन्धेन समानमधिकरणं यस्याः सा गन्धसमानाधिकरणा, सा चासौ द्रव्यत्वव्या- प्यजातिश्चेति गन्धसमानाधिकरणद्रव्यत्वव्याप्यजातिरिति समस्तं पदम् ।

९० तर्कसंग्रहे [ प्रत्यक्षपरिच्छेदः

नाधिकरणस्य लक्ष्यतावच्छेदकसमानाधिकरणत्वस्य च पूर्वार्धस्य शृङ्गत्वे सत्त्वात् शृङ्गत्वं न गोलक्षणम्, अतिव्याप्तिदोषेण ग्रस्तत्वादिति भावः । अव्याप्तेर्निष्कृष्टलक्षणमाह - लक्ष्यतावच्छेदकसमानाधिकरणात्यन्ता- भावप्रतियोगित्वमिति । अयमर्थः - लक्ष्यतावच्छेदकसमानाधिकरणो योऽ- त्यन्ताभावस्तत्प्रतियोगित्वमव्याप्तिरिति । यथा गोर्यदि नीलरूपवत्त्वं लक्षणं कृतं स्यात् तदा तदव्याप्तिदोषेण ग्रस्तं स्यात् । यतो हि लक्ष्यतावच्छेदकं गोत्वं, तत्समानाधिकरणोऽर्थात् गोत्वाधिकरणे वर्तमानोऽत्यन्ताभावो नीलरूपवत्त्वाभाव एव, गोत्वाधिकरणे श्वेतगवि नीलरूपवत्त्वाभावात् । तादृशात्यन्ताभावप्रतियोगित्वं नीलरूपवत्त्वेऽस्ति । एवञ्च लक्ष्यतावच्छेदकगोत्वसमानाधिकरणात्यन्ताभावप्रतियो- गित्वात् इदं लक्षणमव्याप्तिदोषयुक्तम् । असंभवस्य निष्कृष्टलक्षणमाह-लक्ष्यतावच्छेदकव्यापकीभूताभाव- प्रतियोगित्वमिति । लक्ष्यतावच्छेदकव्यापकीभूतो योऽभावस्तत्प्रतियोगित्व- मित्यर्थः । यथा गोरेकशफवत्त्वं लक्षणं कृतं स्यात् तदा तल्लक्षणमसंभव- दोषग्रस्तम् । लक्ष्यतावच्छेदकं गोत्वम्, तद्व्यापकीभूतोऽभावः एकशफ- वत्त्वाभावः, तत्प्रतियोगिताया एकशफवत्त्वे सत्त्वात् । यथा यत्र यत्र धूमो वर्तते तत्र तत्र वह्नेः सत्त्वात् धूमस्य वह्निर्व्यापको भवति, तथैव गोत्वं सर्वत्र गवि वर्तते तत्र चैकशफवत्त्वाभावस्यापि सत्त्वात् एकशफवत्त्वाभावो गोत्वव्यापकः । तथा च लक्ष्यतावच्छेदकव्यापकीभूताभावप्रतियोगित्वात् एकशफवत्त्वमपि न गोलक्षणम् । किन्तु एतत्त्रितयदोषरहितत्वात् सास्नावत्त्वमेवादुष्टं गोलक्षणं मन्तव्यम् । एवं रीत्यैव रूपरहितत्वे सति स्पर्शवत्त्वमेव वायोरदुष्टं लक्षणम् । न्या.बो. मूलकृता कृतमाकाशलक्षणं व्याख्यातुमाह-आकाशं लक्षयतीति । "शब्द- पृ.६. गुणकमिति" इत्यत्रेतिशब्देन शब्दगुणकत्वमाकाशलक्षणमिति निर्दिश्यते । शब्दो गुणो यस्य तदाकाशमित्यर्थः । ननु शब्दोऽस्यास्तीति शब्दवत् तस्य भावः शब्दवत्त्वम् । तथा च समवायेन सम्बन्धेन शब्दवत्त्वमात्रस्याकाशलक्षणस्य सम्यक्त्वे गुणपदं किमर्थमत आह-गुणपदमिति । पृथिव्यादौ रूपरसादयोऽनेके विशेष- गुणाः ❀ सन्ति आकाशे तु केवलः शब्द एव विशेषगुणोऽस्तीति सूचनाय गुणपदं दत्तमिति भावः । न्यायबोधिन्यां द्योतनायेति पदं द्योतनार्थैवेत्यर्थकम् । तथा चैतेन यद् व्यवच्छेद्यं तदाह-न त्वतिव्याप्तिवारणायेति । विशेषणानामितरव्यावर्तक- त्वात् अन्यत्र अतिव्याप्तिवारणप्रयोजनकत्वेऽपि अत्र तथाविधप्रयोजनासंभवादिति भावः ।


* रूपं गन्धो रसः स्पर्शः स्नेहः सांसिद्धिको द्रवः । बुद्ध्यादिभावनान्ताश्च शब्दो वैशेषिका गुणाः ॥ इति विशेषगुणाः ।

न्यायबोधिनी-संस्कृत-कला ९९ तच्चैकमिति मूलोक्ते प्रमाणमाह—अनेकत्वे मानाभावादिति । आकाशं विभ्विति मूले प्रोक्तम्, तत्र किं विभुत्वमिति जिज्ञासायामाह—सर्वेति । सर्वैः मूर्तैः द्रव्यैः संयोगोऽस्यास्तीति सर्वमूर्तद्रव्यसंयोगी, तस्य भावः सर्वमूर्तद्रव्यसंयो- गित्वम् । इदमेव विभुत्वमिति भावः । ननु किं मूर्तत्वं ? तत्राह—मूर्तत्वञ्चेति । तथा च क्रियावत्वात् पृथिव्यप्तेजोवायुमनांसि मूर्तानि कथ्यन्ते । पृथिव्यप्ते- जोवाय्वाकाशानि पञ्च लक्षितानि, एतान्येव पञ्च भूतानि सन्तीत्याह—भूतपद- वाच्यमिति । भूतलक्षणमाह—भूतत्वं नामेति । बहिरिन्द्रियग्राह्यविशेषगुण- वत्त्वमिति । बहिरिन्द्रियैः—चक्षूरसनघ्राणत्वक्श्रोत्रैः ग्राह्या ये विशेषगुणाः— रूपरसगन्धस्पर्शशब्दास्तद्वत्त्वमित्यर्थः । न्या.बो. अतीतादिव्यवहारहेतुत्वं मूलकारकृतं काललक्षणम् । अत्रादिपदेन वर्तमान- पृ.१०. भविष्यतोर्ग्रहण्म् । अत्रैव लक्षणेऽतीतादीति विशेषणस्य फलमाह बोधिनीकारः— व्यवहारहेतुत्वस्येति । अयं भावः—यदि व्यवहारहेतुत्वमात्रं लक्षणं स्यात् तदा 'अयं घट' इत्यस्य वाक्यप्रयोगस्यापि व्यवहारत्वात्, तत्र च विषयविधया घटस्यापि हेतुत्वात्, घटेऽतिव्याप्तिरतोऽतीतादीति पदम् । तथा चातीतमिति व्यवहारहेतुत्वस्य काले एव सत्त्वान्न घटेऽतिव्याप्तिरिति भावः । न्या.बो. मूलकारकृतं दिग्लक्षणं व्याख्यातुमाह—दिशो लक्षणमाहेति । प्राच्या- पृ.११. दिसंज्ञायां हेतुमाह—उदयाचलेति । एतत् सुस्पष्टम् । मूलकृता कृतमात्मनिरूपणं व्याख्यातुमाह—आत्मानं निरूपयतीति । ज्ञानाधिकरणमितीति । अत्र ज्ञानाधिकरणमिति कथनेनात्मनि प्रमाणमपि दर्शितं भवति । तथा हि—गुणा गुणिनमाश्रित्य तिष्ठन्तीत्यस्ति नियमः । ज्ञान- मपि गुण एवास्ति । तस्याप्यवश्यं केनचिदाश्रयेण भवितव्यम् । तत्र पृथिव्यप्ते- जोवाय्वाकाशकालदिङ्मनसां ज्ञानाश्रयत्वासंभवेन आत्मैव तदधिकरणत्वेन निश्चीयते । ननु ज्ञानवानात्मेत्येव वक्तव्यम् लाघवात्, अधिकरणपदन्तु किमर्थं दत्त- मित्यत आह—अधिकरणपदमिति । अयं भावः—पदार्था हि विभिन्नसम्बन्धेन विभिन्नस्थाने तिष्ठन्ति । सम्बन्धास्तावत् न्यायनये संयोगसमवायकालिक- स्वरूपाख्याः मुख्याः । तादात्म्य, विषयित्व, विषयत्वादयस्त्वमुख्याः । तत्र संयोगसम्बन्धः पृथक्सिद्धद्रव्ययोरेव भवति । यथा घटः संयोगेन भूतले वर्तत इति । समवायसम्बन्धश्च गुणगुणिनोरवयवावयविनोः, क्रियाक्रियावतोः, जातिजाति- मतोः, नित्यद्रव्यविशेषयोश्च भवति । गुणगुणिनोर्यथा-नीलरूपं घटे समवायेन वर्तते । अवयवावयविनोर्यथा-घटः कपालयोः पटश्च तन्तुषु समवायसम्बन्धेन वर्तते । क्रियाक्रियावतोर्यथा—गमनक्रिया वाजिनि समवायेन वर्तते । जातिजाति-

९२ तर्कसंग्रहे [ प्रत्यक्षपरिच्छेदः मतोर्या—घटत्वं जातिः समवायेन घटेऽस्तीति । एवं षष्ठः पदार्थो विशेषः समवायेनैव सम्बन्धेन नित्यद्रव्येषु वर्तते । कालिकसम्बन्धेन घटादयः काले कालो- पाधिषु च वर्तन्ते, कालस्य सर्वाधारत्वात् । जन्यपदार्था एव कालोपाधय उच्यन्ते । कालोपाधयश्च काल एवेति ज्ञेयम् । येन सम्बन्धेनाभावो भूतलादौ तिष्ठति स स्वरूपसम्बन्धः । अर्थात् घटाभाववद्भूतलमित्यत्र घटाभावो भूतले स्वरूपसम्बन्धेन तिष्ठति । तदात्मनो भावः तादात्म्यम् । तेन सम्बन्धेन घटो घटे एव वर्तते । तादात्म्येन सर्वं वस्तु स्वस्मिन् सम्बद्धं भवति । ज्ञानं विषयतासम्बन्धेन विषये तिष्ठति । विषयश्च विषयितासम्बन्धेन ज्ञाने तिष्ठतीति । एवं प्रदर्शितरीत्या गुणगुणिनोः समवायात् ज्ञानमात्मनि समवायेन सम्बन्धेन स्थास्यति । तदेव च ज्ञानम् विषयतासंबन्धेन विषये वर्तते । तथा च यद्यधिकरणपदं न स्यात् किन्तु ज्ञानवानात्मा इत्येव कथ्येत, तदा विषयतासम्बन्धेन घटादिविषयस्यापि ज्ञानवत्त्वात् तत्रात्मलक्षणस्यातिव्याप्तिः स्यात्, अतोऽधिकरणपदं दत्तम् । तथा च तेन समवायसम्बन्धेन ज्ञानाश्रयत्वलाभात् समवायेन आत्मन्येव ज्ञानस्य सत्त्वात् न कोऽपि दोषः पदमादधाति । उपरिष्टादुक्ततः सम्बन्धविवेकः सदा स्मृतो रक्षणीयो येन नाग्रेऽपि काठिन्यनुभूयेत । मनोलक्षणं व्याख्यातुमारभते— मनो निरूपयतीत्यादिना । सुखाद्युप- लब्धिसाधनमिन्द्रियं मन इत्यत्रोपलब्धिपदेन साक्षात्कार एव ग्रहीतव्योऽन्यथा सुखादीनां स्मृत्यात्मकोपलब्धि प्रति चक्षुरादेरप्युद्बोधकज्ञापकतया साधनत्वात्त- त्रातिव्याप्तिः प्रसज्ज्येतेति भावः । पर्यवसितं लक्षणमाह-तथाचेति । मनसि सुखदुःखादिसाक्षात्कारकारणत्वस्येन्द्रियत्वस्य च सत्त्वाल्लक्षणसमन्वयः । अत्र यदीन्द्रियत्वमेव मनसो लक्षणं स्यात् तदा चक्षुरादेरपीन्द्रियत्वात् तत्रातिव्याप्तिः स्यात्, अतः सुखादिसाक्षात्कारकारणत्वविशेषणम् । तथा च चक्षुरादेः सुखादि- साक्षात्कारेऽकारणत्वान्नातिव्याप्तिः । एतत्सर्वमाह - इन्द्रियत्वमात्रोक्तावित्या- दिना विशेषणमित्यन्तेन । विशेष्यस्येन्द्रियत्वस्य फलमाह - विशेष्यानुपादाने इति । आत्मन्यतिव्याप्तिरिति । अत्र हेतुमाह--आत्मन इति । सुखादिकं प्रति—सुखादिसाक्षात्कारं प्रति । समवायिकारणत्वादिति । विशेष्योपादानम्- इन्द्रियत्वस्य लक्षणे प्रवेश इत्यर्थः । एवञ्चात्मन इन्द्रियत्वाभावान्न तत्र मनो- लक्षणातिव्याप्तिरिति भावः । न्या.बो. पूर्वं सर्वाणि द्रव्याणि लक्षितानि, इतो गुणान् लक्षयितुमारभमाणस्य पृ.१२. मूलकारस्य 'चक्षुर्मात्रग्राह्यो गुणो रूपमिति' रूपलक्षणं व्याख्यातुमाह-रूपं लक्षयतीति । मूलवाक्यतो लक्षणांशं पृथक्कृत्य दर्शयति-चक्षुर्मात्रग्राह्यत्व- विशिष्टगुणत्वमिति । रूपं हि केवलेन चक्षुषा ग्राह्यमर्थात् ज्ञेयमस्ति गुणश्चा- स्तीति तत्र लक्षणसमन्वयः । अत्र लक्षणे चक्षुर्मात्रग्राह्यत्वं विशेषण, गुणत्वञ्च

न्या.बो. विशेष्यमस्ति । विशेष्यस्य गुणत्वमात्रस्य लक्षणत्वे दोषमाह — विशेष्यमात्रो- पृ.१२. पादान इति । रसादावतिव्याप्तिरिति । तस्यापि गुणत्वादिति शेषः । चक्षुर्मात्रग्राह्यत्वविशेषणदाने तु नातिव्याप्तिः, रसादेः रसनादिग्राह्यत्वेन चक्षुर्ग्र्रा- ह्यत्वाभावात् । चक्षुर्मात्रग्राह्यत्वमात्रस्योपादाने गुणत्वस्य चानुपादाने दोषमाह- रूपत्वेऽतिव्याप्तिरिति । यथा रूपं चक्षुर्मात्रग्राह्यं तथा रूपत्वस्यापि चक्षुर्मात्र- ग्राह्यत्वादित्यर्थः । कथं रूपवत् रूपत्वमपि चक्षुर्मात्रग्राह्यमित्यत्र हेतुं नियममाह— यो गुण इति । रूपादिचतुर्विंशतिगुणमध्ये यो गुणो येनेन्द्रियेण गृह्यते तद्गुण- निष्ठा या रूपत्वादिजातिः सापि तेनैवेन्द्रियेण गृह्यते इति नियमार्थः । तथा च रूपत्वेऽतिव्याप्तिवारणाय गुणत्वेति विशेष्योपादानम् । एवं सति रूपत्वं सामान्यं (जातिः) न तु गुण इति नातिव्याप्तिः । चक्षुर्मात्रग्राह्यत्वमित्यस्यार्थमाह—चक्षुर्मात्रग्राह्यत्वं नामेति । चक्षु- र्भिन्नानि यानि रसनादीनीन्द्रियाणि तैरग्राह्यत्वे सति चक्षुर्ग्राह्यत्वमित्यर्थः । ननु चक्षुर्ग्राह्यत्वे सति गुणत्वमित्येवं रूपलक्षणमस्तु मात्रपदं किमर्थमत आह— मात्रपदानुपादान इति । अयमेको घट इत्यत्र संख्यायास्त्वचा घटस्पर्शे कृते यथा ज्ञानं भवति तथा चक्षुषाऽपि भवतीति तस्या अपि चक्षुर्ग्राह्यगुणत्वादति- व्याप्तिरिति भावः । तदेवाह—तत्रापीति । मात्रपददाने तु नातिव्याप्तिरित्याह— संख्यादेरिति । अत्र लक्षणे ग्राह्यत्वं प्रत्यक्षविषयत्वम्, चक्षुर्ग्राह्यत्वं चक्षुर्जिन्य- प्रत्यक्षविषयत्वम् इत्यनुपदं वक्ष्यति बोधिनीकारः । तथाचैतादृशचक्षुर्ग्राह्यत्वानु- पादानेऽतीन्द्रियगुरुत्वादावतिव्याप्तिः स्यादतस्तद्वाररणाय चक्षुर्ग्राह्यत्वोपादानम् । तथा सति नातिव्याप्तिः, तस्यातीन्द्रियत्वेन चक्षुषाऽग्राह्यत्वात् इत्याशनेनाह— अतीन्द्रियेति । ग्राह्यत्वार्थं उक्तः । अग्राह्यत्वस्यार्थमाह—अग्राह्यत्वं नामेति । तदविषयत्वम् — प्रत्यक्षाविषयत्वमित्यर्थः । मात्रपदार्थसहकृतमुक्त- लक्षणस्य फलितार्थमाह — तथा चेति । स्पष्टोऽस्यार्थः । एवं फलितार्थेऽपि दिवसे सूर्यस्य रात्रौ चन्द्रस्य दीपस्य वा प्रभया सह घटस्य यः संयोगस्तत्रातिव्याप्तिरित्याशङ्कते—नन्विति । अतिव्याप्तौ हेतुमाह—चक्षुर्मात्रग्राह्यगुणत्वादिति । चक्षुर्भिन्नेन्द्रिय- जन्यप्रत्यक्षाविषयत्वे सति चक्षुर्जन्यप्रत्यक्षविषयत्वे च सति गुणत्वात् इत्यर्थः । अतिव्याप्तिवारणोपायमाह—गुणपदस्येति । तथा चात्र गुणपदस्य ‘रूपं गन्धो रसः स्पर्शः’ इति श्लोके उक्ता ये विशेषगुणास्तत्परत्वात्, संयोगस्य च पठितविशेषगुणानन्तर्गतत्वात् नातिव्याप्तिरित्याशयः । ननु यदि गुणपदं विशेष- गुणपरं तदा संख्यादावतिव्याप्तिवारणाय दत्तं मात्रपदं व्यर्थमेव, संख्याया विशेषगुणत्वाभावादेव तत्रातिव्याप्तेरभावादिति शङ्कते—न चैवमिति । मात्र- पदस्य अन्यप्रयोजनप्रदर्शनेनोत्तरयति—जलमात्रेति । तथा च सांसिद्धिकद्रवत्वस्य चक्षुर्ग्राह्यविशेषगुणत्वात् तत्रैवातिव्याप्तिवारणाय मात्रपदसार्थक्यादिति भावः ।

... यथा च गुणपदं विशेषगुणपरमिति मन्तव्यमपि न भवेत्, एवं प्रभाघट- संयोगेऽतिव्याप्तिरपि न स्यात्तथा लक्षणमाह—अथवेति । चक्षुर्मात्रग्राह्या या जातिः रूपत्वजातिस्तादृशजातिमत्त्वं रूपे वर्तत इति लक्षणसमन्वयः । एवं सति प्रभाघटसंयोगेऽपि नातिव्याप्तिः, संयोगत्वजातेश्चक्षुर्मात्रग्राह्यत्वाभावात् । यतो हि घटपटसंयोगो यथा चक्षुषा गृह्यते तथा त्वचाऽपि गृह्यते । अतस्तन्निष्ठा संयोगत्वजातिरपि चक्षुष्ट्वग्भ्यां द्वाभ्यामेव गृह्यते, यो गुणो यदिन्द्रियग्राह्य इति न्यायात् । प्रभाघटसंयोगे चैकैव संयोगत्वजातिरस्ति । तथा च संयोगत्व- जातेश्चक्षुर्मात्रग्राह्यत्वाभावात्, चक्षुर्मात्रग्राह्यजातिमद्गुणत्वस्य प्रभाघटसंयोगेऽ- भावान्नातिव्याप्तिरिति भावः । जातिघटितलक्षणे गुणत्वोपादानस्य फलमाह— अन्नेति । अयं भावः—सुवर्णमिदमिति ज्ञानं चक्षुषैव भवति, चक्षुर्निमीलने केवलस्पर्शेन सुवर्णस्यापरिचयात् । तथा सुवर्णगतसुवर्णत्वजातिरपि चक्षुर्मात्र- ग्राह्या इति तादृशजातिमत्त्वस्य सुवर्णे सत्त्वादतिव्याप्तिरतस्तद्वारणाय गुणत्वोपादानमिति भावः । अग्रे रसादिलक्षणेऽपि विशेष्यविशेषणयोः प्रयोजनं सूचयति—एवमिति । न्या.बो. मूलकृत्कृतं स्पर्शलक्षणं व्याख्यातुमाह—स्पर्शं लक्षयतीति । अत्रापि पृ.१५. त्वग्भिन्नेन्द्रियाग्राह्यत्वे सति त्वगिन्द्रियग्राह्यत्वमिति स्पर्शलक्षणनिष्कर्षः । अत्र लक्षणे त्वग्भिन्नेन्द्रियाग्राह्यत्वार्थकमात्रपदस्य प्रयोजनमाह—अत्रापीति । यथा रूपलक्षणे तथा स्पर्शलक्षणेऽपीति भावः । संख्यादिसामान्येति । अयं भावः—स्पर्शलक्षणे यदि मात्रपदं न स्यात् तदा त्वगिन्द्रियग्राह्यगुणत्वमेव लक्षणं स्यात् । तथा च संख्याया अपि त्वगिन्द्रियग्राह्यगुणत्वमस्ति, यतो हि चक्षुषी पिधायापि स्पृष्ट्वैव द्वौ त्रयो वा घटा इति ज्ञानं जायत एव । तस्मात् संख्यायामुक्तलक्षणातिव्याप्तिरतो मात्रपदं देयम् । तथा सति नातिव्याप्तिः, तस्याः चक्षुषापि ग्राह्यत्वेन त्वगिन्द्रियमात्रग्राह्यत्वाभावात् । अन्यविशेषण- कृत्यम्—त्वगिन्द्रियग्राह्यत्वपदस्य गुणत्वपदस्य च प्रयोजनमित्यर्थः । पूर्ववत् रूपलक्षणे इवेत्यर्थः । अर्थात् अतीन्द्रियगुरुत्वादौ स्पर्शत्वे चातिव्याप्तिवारणं क्रमेण प्रयोजनमिति भावः । ग्राह्यत्वपदार्थोऽपि स एवेत्याह—ग्राह्यत्व- पदार्थोऽपीति । रूपरसगन्धस्पर्शाः पृथिव्यां पाकजा अत एवानित्या इति मूलकारोक्तं व्याख्यातुमाह—रूपादिचतुष्टयमिति । एतत्तत्त्वनिर्णयः—रूपादीनां पृथिव्यां पाकजत्वनिर्णय इत्यर्थः । इत्थम्—अव्यवहितोत्तरवक्ष्यमाणप्रकारेणेत्यर्थः । पाक- शब्दस्यार्थमाह—पाको नामेति । विजातीयः—विलक्षणः । एवंविधः पाकः किं करोतीत्याह—स चेति । नानाजातीयरूपजनकः—नानाप्रकाररूपोत्पादक इत्यर्थः । रूपजनको यो विजातीयस्तेजःसंयोगः, तदपेक्षया रसजनकस्तेजःसंयोगो विलक्षण

न्यायबोधिनी-संस्कृत-कला ९५ एवेत्याह—तदपेक्षयेति । रूपरसजनकविजातीयतेजःसंयोगापेक्षया गन्धजनकः, स्पर्शजनकश्च विजातीय एव तेजःसंयोग इत्याह — एवं गन्धजनकोऽपीति, एवं स्पर्शजनकोऽपीति चेति । एवं प्रकारेणेति । स्पष्टोऽस्यार्थः । उदाहरति—यथेति । तृणपुञ्जनिक्षिप्ते, धान्याद्यन्नेषु च निक्षिप्ते, आम्रादौ फले । उष्मनामकविलक्षणतेजःसंयोगात्, पूर्वरूपनाशेन अर्थात् आम्रे यत् पूर्वं हरितरूपमभूत् तस्य नाशेनेत्यर्थः, रूपान्तरस्य पीतादेरुत्पत्तिर्भवति, किन्तु रसस्तु स एवाम्लस्तिष्ठति । एतस्यैतदेव कारणं यदाम्रे एतादृशस्तेजः- संयोगो जातो येन केवलं रूपमेव परिवर्तितम्, रसस्तु अम्ल एव स्थितः । केवल- रसजनकं विलक्षणं तेजःसंयोगमुदाहरति —क्वचिदिति । रसपरावृत्तिः रसपरि- वर्तनम् । रूपं तु हरितमेव तिष्ठतीत्याशयः । एतदेवोपपादयति —विजातीय इति । निष्कर्षं ब्रूते—तस्मादिति । उक्तमनुभवं गन्धेऽपि विज्ञापयति—एवं गन्धजनक इति । रूपरस- योरिति । अपरावृत्तावपि —हरिताम्लौ एव रूपरसौ तिष्ठत इत्यर्थः । केवलो गन्ध एव सुरभिर्जायते । अत्रापि रूपादिजनकतेजःसंयोगापेक्षया विलक्षण एवायं गन्धजनकस्तेजःसंयोग इति तात्पर्यार्थम् । एतदेव स्पर्शेऽपि बोधयति—एवं स्पर्श- जनक इति । उपपादयति — पाकवशादिति । उपसंहरति—तस्मादिति । विलक्षणविलक्षणपाकस्यैवायं महिमा यत् समानेभ्यः परमाणुभ्यो जातान्यपि द्रव्याणि घट, पट, वृक्ष, पशु, मनुष्यादिनानारूपेणानुभूयन्ते इत्याह-अतएवेति । यथाकार्यं विलक्षणपाकस्वीकारादेवेत्यर्थः । पाकवशाद् विजातीयद्रव्यान्तरोत्पत्ति- मप्युदाहरति —यथेति । गोभिर्भुक्तानां खादितानां तृणानाम् । आपरमाण्वन्त- भङ्ग इति । न्यायमते परमाणूनां नित्यत्वात् तेषां नाशरूपभङ्गासंभवात्, तान् न्या.बो. विहाय द्व्यणुकपर्यन्तनाशे इत्यर्थः । तृणारम्भका ये परमाणवस्तेषु विजातीयतेजः- पृ. १६. संयोगात् पूर्वरूपादिश्चतुष्टयस्य तृणेषु ये हरितरूपादिविलक्षणरूपरसगन्धस्पर्शास्ते- षामित्यर्थः । तदनन्तरम् पूर्वरूपादिनाशानन्तरम् । दुग्धे यादृशं रूपं भवति, रसो भवति, गन्धो भवति, स्पर्शो भवति, तादृशरूपरसगन्धस्पर्शजनका विलक्षण- तेजःसंयोगाः जायन्ते, उत्पद्यन्ते इत्यर्थः । तदुत्तरं—दुग्धे यादृशं रूपादिकं भवति, तादृशरूपादिजनकविलक्षणतेजःसंयोगोत्पत्त्यनन्तरमित्यर्थः । तैरेव विलक्षणतेजः- संयोगैरेव । तादृशरूपरसादयः—दुग्धे यादृशा भवन्ति तादृशा इत्यर्थ । तादृश- रूपरसगन्धस्पर्शविशिष्टा ये दुग्धपरमाणवस्तैर्दुग्धद्व्यणुकमारभ्यते —उत्पाद्यते इत्यर्थः ! ततस्त्र्यणुकं ततो महादुग्धारम्भका अवयवाः उत्पद्यन्ते, ततो महादुग्धो- त्पत्तिर्भवतीति भावः । एवं रीत्यैव पाकमहिम्ना दुग्धस्य रूपादिनाशानन्तरं दध्युत्पाद्यते

९६ तर्कसंग्रहे [ प्रत्यक्षपरिच्छेदः इत्याह— एवं दुग्धाम्भकैरिति । एवं रीत्यैव नवनीतादिकमपीत्याह— एवं पाकमहिम्नेति । न्या.बो. विभागलक्षणं व्याख्यातुमाह— विभागं लक्षयतीति । निष्कृष्टलक्षणमाह— पृ.१७.संयोगेति । अत्र लक्षणे संयोगनाशकत्वं विशेषणम्, गुणत्वं विशेष्यम् । विशेषणा- नुपादाने गुणत्वमात्रोक्तौ रसादावतिव्याप्तिः, तद्वारणाय विशेषणोपादानम् । विशेष्यस्य स्वयं फलमाह— विशेषणमात्रोपादाने इति । यदि संयोगनाशकत्वं विभागत्वमित्युच्येत, तदा क्रियापि संयोगनाशिकाऽस्ति, नहि क्रियामन्तरा संयोगो नश्यति । तथा च क्रियायां विभागलक्षणातिव्याप्तिरतो गुणत्वमिति विशेष्योपादानम् । क्रियाया गुणभिन्नत्वात् नातिव्याप्तिरित्याशयः । न्या.बो. गुरुत्वलक्षणव्याख्यानायाह— गुरुत्वं लक्षयतीति । आद्यपतनासमवायि- पृ.१८.कारणत्वं गुरुत्वस्य लक्षणम् । समवायिकारणत्वासमवायिकारणत्वे त्वग्रे विस्तरेण प्रतिपादयिष्येते । अत्रैतावदेव ज्ञेयं यत् आद्यपतनं प्रति असमवायिकारणं गुरुत्वं, द्वितीयपतनं प्रति तु वेगोऽसमवायिकारणम् । अयं भावः— यदा लोष्ठमुपरि उत्क्षिप्यते तदा तल्लोष्ठं निमेषमात्रमाकाशे एवावस्थाय शनैः पतितुमारभते, तत्रैवारम्भिकपतने गुरुत्वमसमवायिकारणम् । यदि गुरुत्वं न स्यात्तदा लोष्ठं नभस्येवावरुद्धं स्यात्, न त्ववपतेत् । अतस्तत्र गुरुत्वमसमवायिकारणम्, किन्तु प्रारम्भिकपतनानन्तरम् शीघ्रतया यत् पतनं दृश्यते तत्र वेग एवासमवायिकारण- मित्यर्थं । तथा चाद्यपदादाने द्वितीयपतनासमवायिकारणे वेगेऽतिव्याप्तिरत आद्येति । तदेवाह— द्वितीयेति । उत्तरत्र द्रवत्वलक्षणे मूलकारेणाद्यपदं न दत्तम्, किन्तु वेगेऽतिव्याप्तिवारणाय तत्राप्याद्यपदमावश्यकमित्याह—उत्तरत्रेति । तथा चाद्यपदयोजनया आद्यस्यन्दनासमवायिकारणत्वं द्रवत्वस्य लक्षणं निष्पन्नं भवति । न्या.बो. स्नेहं लक्षणं व्याख्यातुं प्रक्रमते— स्नेहं लक्षयतीति । लक्षणस्य निष्कर्ष- पृ. १८. माह— चूर्णादीति । चूर्णशब्दस्य स्फुटार्थत्वात् पिण्डीभावशब्दार्थमाह— पिण्डी- भावो नामेति चूर्णादिर्धारणाकर्षणहेतुभूत इति । यतश्चूर्णा।दधार्यन्ते, आकृष्यते वा, स विलक्षणः संयोग एव पिण्डीभावः । ननु तादृशविलक्षणसंयोगात्मके पिण्डीभावे स्नेह एव हेतुः सिद्धान्तिना भवताऽभ्युपगम्यते, परन्तु जलादिगत- द्रवत्वमेव कारणं किं न स्यात् ? तथा चोक्तलक्षणं न युक्तमत आह— तादृश- संयोग इति । न तु जलादिगतद्रवत्वस्येति । अत्र युक्तिमाह-- तथा सतीति । तीव्राग्निसंयोगेन द्रुतं यत् सुवर्णं तत्संयोगेनापि सक्तूनां धूलीनां वा पिण्डीभावः स्यात्, किन्तु नैवं भव।त । उपसंहरति— अत इति । लक्षणे गुणपदोपादानफलमाह— विशेषणेति । कालस्य जन्यमात्रं प्रति हेतुत्वेन पिण्डीभावं प्रत्यपि हेतुत्वादिति भावः । अक्षरार्थः स्पष्टः । चूर्णादिपिण्डी-