भारतकोश
तत्त्वार्थ सूत्र (मोक्षशास्त्र - संस्कृत सूत्र एवं हिन्दी व्याख्या)

तत्त्वार्थ सूत्र (मोक्षशास्त्र - संस्कृत सूत्र एवं हिन्दी व्याख्या)

Tattvartha Sutra / Mokshashastra with Hindi Commentary

आचार्य उमास्वामी (उमास्वाति) / आचार्य पूज्यपाद द्वारा

DevanagariHindipublished177 पृष्ठ

पृष्ठ 142, कुल 177 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 142

अध्याय - ९ मार्गाच्चवननिर्जरार्थं परिषोढव्याः परीषहाः ॥८॥ [ मार्गाच्चवननिर्जरार्थं ] संवर के मार्ग से च्युत न होने और कर्मों की निर्जरा के लिये [ परीषहाः परिषोढव्याः ] बाईस परीषह सहन करने योग्य हैं। (यह संवर का प्रकरण चल रहा है, अतः इस सूत्र में कहे गये 'मार्ग' शब्द का अर्थ 'संवर का मार्ग' समझना।) The afflictions are to be endured so as not to swerve from the path of stoppage of karmas and for the sake of dissociation of karmas. क्षुत्पिपासाशीतोष्णदंशमशकनाग्न्यारतिस्त्रीचर्यानिषद्या- शय्याक्रोशवधयाचनाऽलाभरोगतृणस्पर्शमल- सत्कारपुरस्कारप्रज्ञाऽज्ञानादर्शनानि ॥९॥ [ क्षुत्पिपासाशीतोष्णदंशमशकनाग्न्यारतिस्त्रीचर्यानिषद्या- शय्याक्रोशवधयाचनाऽलाभरोगतृणस्पर्शमल- सत्कारपुरस्कारप्रज्ञाऽज्ञानादर्शनानि ] क्षुधा, तृषा, शीत, उष्ण, दंशमशक, नग्न्य, अरति, स्त्री, चर्या, निषद्या, शय्या, आक्रोश, वध, याचना, अलाभ, रोग, तृणस्पर्श, मल, सत्कारपुरस्कार, प्रज्ञा, अज्ञान और अदर्शन, ये बाईस परीषह हैं। 129