भारतकोश
तत्त्वार्थ सूत्र (मोक्षशास्त्र - संस्कृत सूत्र एवं हिन्दी व्याख्या)

तत्त्वार्थ सूत्र (मोक्षशास्त्र - संस्कृत सूत्र एवं हिन्दी व्याख्या)

Tattvartha Sutra / Mokshashastra with Hindi Commentary

आचार्य उमास्वामी (उमास्वाति) / आचार्य पूज्यपाद द्वारा

DevanagariHindipublished177 पृष्ठ

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अध्याय - ५ प्रदेशसंहारविसर्पाभ्यां प्रदीपवत् ॥१६॥ [ प्रदीपवत् ] दीप के प्रकाश की भांति [ प्रदेशसंहारविसर्पाभ्यां ] प्रदेशों के संकोच और विस्तार के द्वारा जीव लोकाकाश के असंख्यातादिक भागों में रहता है। (It is possible) by the contraction and expansion of the space-points (of a soul) as in the case of the light of a lamp. गतिस्थित्युपग्रहौ धर्माधर्मयोरुपकारः ॥१७॥ [ गतिस्थित्युपग्रहौ ] स्वयमेव गमन तथा स्थिति को प्राप्त हुए जीव और पुद्गलों के गमन तथा ठहरने में जो सहायक है सो [ धर्माधर्मयोः उपकारः ] क्रम से धर्म और अधर्म द्रव्य का उपकार है। The functions of the media of motion and rest are to assist motion and rest respectively. आकाशस्यावगाहः ॥१८॥ [ अवगाहः ] समस्त द्रव्यों को अवकाश-स्थान देना यह [ आकाशस्य ] आकाश का उपकार है। (The function) of space (is to) provide accommodation. 71