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तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ)

तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ)

पण्डित तेनाली रामकृष्णन / लोक संकलन द्वारा

स्रोत: तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ) · भारतीय लोक साहित्य संकलन · 1950 (उद्गम)

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दिनचर्या में रुचि लेने लगा। उसने दो-तीन दिनों में ही जान लिया कि महाराज कृष्णदेव राय रातों को भी अपने शयनकक्ष में बेचैनी से टहलते रहते हैं और दिन में भी उनींदे-से किसी विचार में लिप्त महाराज कृष्णदेव राय की भंगिमा ऐसी थी कि कोई इन्हें कुछ कह नहीं पाता था। तेनाली राम भी उचित अवसर की प्रतीक्षा में मौन था। समय बीत रहा था। महाराज कृष्णदेव राय की अनियमितता और शिथिलता बढ़ती जा रही थी। एक रात अचानक अपने शयनकक्ष में चहल-कदमी करते हुए महाराज कृष्णदेव राय एक निष्कर्ष पर पहुँचे और फिर उन्होंने एक लम्बी साँस ली। साँस छोड़ते समय उनका सारा तनाव जाता रहा। उस रात महाराज कृष्णदेव राय गहरी नींद में सोए। सुबह बिस्तर छोड़ने के बाद उन्होंने महामंत्री को बुलवाया। महामंत्री के उपस्थित होने पर वे महामंत्री के साथ मंत्रणा कक्ष में चले गए। उन्होंने महामंत्री से कहा, "महामंत्री जी! अपने राज्य पर पड़ोसी राज्य सप्तद्वीप नवखंड ने मात्रा इसलिए आक्रमण करने का साहस किया कि वह हमें कमजोर समझ रहा था। सच्चाई यह है कि हमारी सामरिक सामर्थ्य अपने किसी भी पड़ोसी राज्य से लोहा लेने के योग्य है। कोई भी राज्य हमारा सामना नहीं कर सकता। मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ कि विजयनगर की खुशहाली से पड़ोसी राज्यों में ईर्ष्या का भाव जन्म ले रहा है। इसी ईर्ष्या के कारण सप्तद्वीप नवखंड की सेना ने हम पर आक्रमण किया। भविष्य में ऐसा न हो, इसके लिए हमें अपने ऐश्वर्य और सैन्य बल का प्रदर्शन करने की आवश्यकता है। हम युयुत्सु नहीं हैं किन्तु पड़ोसी राज्य कोई युद्धक विचार से प्रेरित होकर हमारे राज्य की ओर न देखें, इसकी व्यवस्था करना अनिवार्य है।" महामंत्री महाराज कृष्णदेव राय की भंगिमा देखकर कुछ बोलने का साहस नहीं कर पाए। उस दिन ही विजयनगर के राजभवन के सामने के सार्वजनिक मैदान में अत्याधुनिक सुविधाओंवाले विलास-तालाब का निर्माण कार्य आरम्भ हो गया। उस दिन ही राजभवन के पार्श्व के खुले स्थान पर मनोरम क्रीड़ा-स्थल का निर्माण-कार्य आरम्भ हुआ और उस दिन ही राजभवन के दूसरे पार्श्व में रंगशाला का निर्माण-कार्य आरम्भ कराया गया। इस तरह के आभिजात्य निर्माणों की अन्य कई योजनाएँ राजधानी में आरम्भ हो चुकी थीं। विजयनगर की प्रजा को भूलकर महाराज कृष्णदेव राय स्वयं इन निर्माण-कार्यों को देखने में रुचि लेने लगे। उनकी व्यस्तता इस तरह बढ़ गई कि वे अपनी प्रजा की ओर देखने का अवकाश निकाल पाने में पूरी तरह असमर्थ हो गए। तेनाली राम महाराज की गतिविधियों से बेचैन हो उठा मगर चाहकर भी वह महाराज से मिल नहीं पाया। महाराज की दिनचर्या उनकी स्वेच्छाचारिता की सनद बन गई थी। तेनाली राम समझ रहा था कि महाराज की गतिविधियों पर अंकुश नहीं लगाया जाएगा तो विजयनगर की प्रजा में अराजकता फैलते देर नहीं लगेगी। उसकी चिन्ता थी कि क्या होगा उस राज्य का जिसके राजा के पास प्रजा की देखभाल के लिए अवकाश नहीं हो? महाराज कृष्णदेव राय की इस अतिरिक्त व्यस्तता के समय महामंत्री राज-काज का