भारतकोश
तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ)

तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ)

पण्डित तेनाली रामकृष्णन / लोक संकलन द्वारा

स्रोत: तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ) · भारतीय लोक साहित्य संकलन · 1950 (उद्गम)

DevanagariHindipublished118 पृष्ठ

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संचालन कर रहे थे इसलिए दरबार में तेनाली राम की भूमिका सीमित रह गई थी। महाराज कृष्णदेव राय की इस अतिरिक्त व्यस्तता के समय विजयनगर में विजयादशमी का त्योहार मनाया जाना था। प्रत्येक वर्ष विजयादशमी पर विजयनगर में ‘विजयोत्सव’ मनाने की परम्परा थी। इस विजयोत्सव में राज्य के कोने-कोने से कलाकार आते थे और अपनी कला का प्रदर्शन करके महाराज कृष्णदेव राय से पुरस्कार प्राप्त करते थे। इन कलाकारों को पुरस्कारस्वरूप महाराज से इतना धन अवश्य प्राप्त हो जाता था जिससे वे साल भर अपना गुजर-बसर कर सकें। इस विजयोत्सव में भाग लेने के लिए कलाकार वर्ष भर अपनी कला का अभ्यास करते। किसी मौलिक कला की प्रस्तुति के लिए यत्नपूर्वक अपनी साधना में जुटे रहते। विजयोत्सव की प्रतीक्षा विजयनगर के प्रजाजनों को भी रहता था जो दूर-दूर से यह विजयोत्सव देखने के लिए वर्ष में एक बार राजधानी अवश्य आया करते थे। विजयोत्सव के समय विजयनगर की राजधानी की सड़कें जन सैलाब में डूब सी जाती थीं। नवरात्रि के प्रथम दिन से आरम्भ होनेवाला यह विजयोत्सव दशहरा की रात को आरम्भ पुरस्कार वितरण समारोह के साथ सम्पन्न होता था। विजयनगर की प्रजा विजयोत्सव की प्रतीक्षा में थी कि इसी बीच विजयनगर के गाँवों में महाराज के आदेश पर डुग्गी पिटवाई गई और यह सन्देश प्रसारित किया गया कि इस बार विजयोत्सव पर राजधानी में नवनिर्मित रंगशाला में विजयनगर की सेना के जवानों का शौर्य प्रदर्शन होगा। विजयनगर का प्रत्येक निवासी अपने सुरक्षा-प्रहरियों के शौर्य प्रदर्शन का आनन्द उठाने के लिए अवश्य आए। तेनाली राम को भी इस सन्देश-प्रसारण की सूचना मिली। इस सूचना के बाद तेनाली राम ने कई बार महाराज कृष्णदेव राय से मिलने का प्रयास किया मगर उसे प्रयास में सफलता नहीं मिली। अन्ततः उसने साधु का रूप धारण कर लिया और गेरुवा वस्त्रा पहनकर राजभवन के सामने एक वृक्ष के नीचे कम्बल बिछाकर ध्यान की मुद्रा में बैठ गया। राजमार्ग से गुजरनेवाले लोग श्रद्धा से कुछ चढ़ावा प्रदान करते जिससे तेनाली राम की क्षुधा-तृप्ति हो जाती। इस तरह कई दिन बीत गए। एक दिन महाराज कृष्णदेव राय अपने घोड़े पर सवार होकर निकले ही थे कि राजभवन के मुख्य द्वार पर ही उन्हें एक गम्भीर आवाज सुनाई पड़ी, "रुक जाओ राजन!" महाराज कृष्णदेव राय ने घोड़े की लगाम खींच ली। सामने देखा तो वृक्ष के तने के पास बैठा साधु उन्हें इशारे से अपनी ओर आने के लिए प्रेरित कर रहा था। महाराज घोड़े से उतर गए और साधु के पास पहुँचकर विनम्रता से हाथ जोड़कर पूछा, "क्या आज्ञा है महाराज?" "मैं तुच्छ प्राणी आज्ञा देने का विश्वासी नहीं। मैं तो तुम्हें सचेत करना चाहता हूँ कि तुम अपनी प्रजा की खुशहाली की आशा में जिस मार्ग पर जा रहे हो, वह तुम्हें अन्तहीन भटकन की ओर ले जानेवाला है। राज्य के वैभव का प्रदर्शन तुम्हारे खजाने को रीता छोड़ा देगा

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