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तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ)

तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ)

पण्डित तेनाली रामकृष्णन / लोक संकलन द्वारा

स्रोत: तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ) · भारतीय लोक साहित्य संकलन · 1950 (उद्गम)

DevanagariHindipublished118 पृष्ठ

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और तुम्हें अपनी प्रजा के असन्तोष का प्रकोप झेलना पड़ेगा। तुम जिस गति से स्वेच्छाचारिता के मार्ग पर बढ़ रहे हो, उसी गति और तीव्रता के साथ विनाश अपना विकराल मुँह खोले तुम्हारी ओर बढ़ रहा है मगर तम्हारी आँखों पर आत्मप्रदर्शन की लिप्सा की पट्टी पड़ी हुई है जो तुम्हें...“ अभी साधुवेशी तेनाली राम की बातें पूरी भी नहीं हो पाईं थीं कि महाराज कृष्णदेव राय ने घबराकर पूछा, ”महाराज! आप यह क्या बोल रहे हैं? मैं तो अपनी प्रजा की सुरक्षा और सुविधा के निमित्त ही अनवरत प्रयास कर रहा हूँ। मेरा प्रत्येक पल अपनी प्रजा की भलाई के चिन्तन में ही व्यतीत हो रहा है!“ ”महाराज...“ बीच में ही साधु बने तेनाली राम ने हाथ उठाकर महाराज कृष्णदेव राय को चुप रहने का संकेत दिया और गम्भीर स्वरों में कहा, ”तुम जो कुछ भी कह रहे हो राजन! वह आत्मश्लाघा है। वास्तविकता यह है कि तुम्हें अपनी प्रजा की सही अवस्था का ज्ञान नहीं है। तुमने कैसे समझ लिया कि राजप्रासाद के चतुर्दिक वैभव का प्रदर्शन करके तुम अपनी प्रजा की भलाई कर रहे हो? क्या तुम जानते हो कि तुम्हारे राज्य में ऐसे लोग भी हैं। जो पेड़ों के पत्ते खाकर अपनी क्षुधा-तृप्ति करते हैं? उन साधनहीन बल-क्षीण लोगों की वेदना का ज्ञान कभी तुम्हें हुआ है?“ महाराज कृष्णदेव राय असमंजस-भरी दृष्टि से इस साधु को देख रहे थे। उनसे कहते नहीं बना। साधुवेशी तेनाली राम ने कहा, ”मेरी बातें मिथ्या नहीं हैं राजन! चाहो तो मुझे अपने घोड़े पर बैठा लो और मेरे संग चलो। मैं तुम्हें दिखलाऊँगा कि तुम्हारे राज्य की सम्पदा का उपयोग कहाँ होना चाहिए, कैसे होना चाहिए!“ महाराज कृष्णदेव राय संस्कारवश साधुवेशी तेनाली राम की बातों में आ गए और उन्होंने साधु समझकर उसे अपने घोड़े पर बैठा लिया। राजधानी से बाहर निकलने के मार्ग पर घोड़ा सरपट दौड़ने लगा। कुछ घंटों के बाद वे दोनों राजधानी के बाहर एक ऐसे स्थान पर थे जहाँ से वनों का सिलसिला आरम्भ होता था। हरियाली से आच्छादित इस स्थान पर ऊँची-नीची पहाड़ियों की तलहटी में कुछ पर्ण कुटीर बने हुए थे जिनमें अधनंगे लोग रहते थे। साधुवेशी तेनाली राम ने उन पर्ण कुटीरों की ओर इंगित कर महाराज कृष्णदेव राय से कहा, “राजन! यह देखो, तुम्हारे वैभवशाली राज्य की प्रजा का ऐसा हाल भी है।...अब यह भी विचार करो कि अभी तुम जिस मार्ग पर सरपट भाग रहे हो उससे तुम्हारी इस प्रजा की क्या भलाई होगी!” महाराज कृष्णदेव राय के लिए यह दृश्य अपरिचित था। वे वहाँ के लोगों को देखकर विस्मय में पड़ गए थे। साधुवेशी तेनाली राम ने उनसे फिर कहा, ”चलो राजन! तुम्हें तुम्हारे राज्य की एक और वास्तविकता दिखला दूँ।“