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तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ)

तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ)

पण्डित तेनाली रामकृष्णन / लोक संकलन द्वारा

स्रोत: तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ) · भारतीय लोक साहित्य संकलन · 1950 (उद्गम)

DevanagariHindipublished118 पृष्ठ

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महाराज कृष्णदेव राय पसीने से तरबतर थे। यह पसीना उनके शरीर से इस अप्रत्याशित दृश्य के कारण निकल रहा था। यह श्रमजनित स्वेद नहीं था। किंकर्तव्यविमूढ़ से महाराज ने घोड़े को एड़ लगाई। घोड़ा सरपट भागने लगा। एक स्थान विशेष पर साधुवेशी तेनाली राम ने महाराज कृष्णदेव राय को रुकने का संकेत किया। महाराज ने घोड़े की लगाम खींच ली और घोड़े से उतर गए। साधुवेशी तेनाली राम भी घोड़े से उतर आया और महाराज से कहा, “राजन! घोड़े को यहाँ विश्राम करने के लिए छोड़ दो और मेरे साथ आओ। अब कुछ दूर हमें पैदल चलना होगा,“ यह कहते हुए साधुवेशी तेनाली राम एक दिशा में चल पड़ा। विवश थे महाराज कृष्णदेव राय! साधु के साथ चलने के सिवा कोई चारा उनके पास नहीं था मगर वे आशंकित थे कि न जाने यह साधु उन्हें कहाँ ले जा रहा है क्योंकि जिस दिशा में वह साधुवेशी तेनाली राम बढ़ रहा था उस दिशा में कहीं कोई सड़क नहीं थी, न कोई ऐसी पगडंडी कि जिससे पता चले कि यहाँ से किसी मानव-बस्ती की ओर जाया जा सकता है! थोड़ी दूरी दोनों ने मौन रहकर पूरी की। फिर पेड़ों की झुरमुटों में कुछ झोंपड़ियाँ दिखने लगीं। महाराज कृष्णदेव राय आश्वस्त हो गए कि वे किसी मानव-बस्ती के ही निकट हैं। एक झोंपड़ी के निकट पहुँचकर साधुवेशी तेनाली राम ने आवाज दी, "माँ!" झोंपड़ी के भीतर से एक क्लान्त महिला का स्वर उभरा, “आती हूँ...बेटा!...कौन है तू...द्वार पर...किसे पुकार रहा है? यहाँ तो कोई आता नहीं कभी भी...आवाज देने!” कुछ ही देर में झोंपड़ी के द्वार पर एक वृद्ध महिला आकर खड़ी हो गई और कहा, “बोल...क्या कहना है? कौन हो तुम? क्या चाहिए तुम्हें?” साधुवेशी तेनाली राम ने अपने कंधे से लटके कमंडल से कुछ फल निकालकर उस वृद्धा को दिया और कहा, “यही देने आया था, “माँ!” वृद्धा चकित दृष्टि से साधुवेशी तेनाली राम और उसके साथ राजसी परिधान में खड़े महाराज कृष्णदेव राय को देख रही थी और साधुवेशी तेनाली राम महाराज कृष्णदेव राय से मन्द स्वर में कह रहा था, “देखो राजन! यह वृद्धा भी तुम्हारे वैभवशाली विजयनगर की प्रजा है। इसके प्रति भी तुम्हारा कुछ कर्तव्य है।... अब चलो! मैंने वृथा ही तुम्हें कष्ट नहीं दिया। अब सूरज ढलने से पहले तुम्हें तुम्हारे राजभवन के द्वार तक पहुँचाना मेरा कर्तव्य है। यहाँ के मार्ग तुम्हारे लिए अपरिचित से हैं...कहीं भटक न जाओ...” महाराज कृष्णदेव राय के लिए वह वृद्धा और वहाँ का सम्पूर्ण परिवेश पूरी तरह