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तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ)

तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ)

पण्डित तेनाली रामकृष्णन / लोक संकलन द्वारा

स्रोत: तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ) · भारतीय लोक साहित्य संकलन · 1950 (उद्गम)

DevanagariHindipublished118 पृष्ठ

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मैत्री सन्देश एक दिन महाराज कृष्णदेव राय अपने दरबार में बैठे-बैठे ज्ञान-मीमांसा के लिए यह चर्चा छेड़ बैठे कि मनुष्य का सबसे बड़ा सौभाग्य और सबसे बड़ा दुर्भाग्य क्या है। महाराज कृष्णदेव राय को उनके दरबारी बहुत दिनों के बाद अपनी स्वाभाविक मुद्रा में देख रहे थे। पड़ोसी राज्य 'सप्तद्वीप नवखंड' के साथ युद्ध होने के बाद से दरबार में किसी ने महाराज कृष्णदेव राय को मुस्कुराते नहीं देखा था। इसलिए जब महाराज ने यह चर्चा छेड़ी तो दरबारी इस चर्चा में उत्साहपूर्वक भाग लेने लगे। एक दरबारी ने कहा, “महाराज! मनुष्य की इच्छाओं की पूर्ति सबसे बड़ा सौभाग्य है और प्रयासों के बाद भी कामनाओं की पूर्ति नहीं हो पाना सबसे बड़ा दुर्भाग्य!” एक अन्य दरबारी ने कहा, "महाराज! अपनी भूलों को समझकर अपने आचरण में सुधार करना सौभाग्य है और अपनी भूलों को समझे बिना गतिशील रहना दुर्भाग्य है।” महाराज कृष्णदेव राय बहुत देर तक इसी तरह की बातों में लगे रहे। उनके दरबार में विद्वानों की कमी तो थी नहीं इसलिए सौभाग्य और दुर्भाग्य पर अनेक विचार प्रकट हुए। महाराज अपने सभासदों की वाक्पटुता और विचारों से कई बार प्रभावित और पुलकित हुए। उन्हें लगा कि इस चर्चा के क्रम में ऐसी वाणी भी प्रकट हो रही है जिसका उपयोग भविष्य में भी किया जा सकता है। उन्होंने महामंत्री से कहा, “आप वक्ताओं के कथनों के सार एक स्थान पर लिपिबद्ध करते रहें। मैं एकान्त में पुनः इस चर्चा पर विचार करना चाहूँगा।” महाराज के निर्देश पर महामंत्री सभासदों के विचार लिपिबद्ध करने में लग गए। उस समय महाराज कृष्णदेव राय का एक ऐसा दरबारी अपने विचार व्यक्त कर रहा था जो एक प्रखर वक्ता था। इस सभासद का नाम था-सुबाहु। सुबाहु के विचारों में स्पष्टता थी और वाणी में संयम। वह गम्भीर था और प्रभावशाली भी। उसने कहा, ”महाराज! भूलों को समझने की आवश्यकता सौभाग्य और दुर्भाग्य की चर्चा के बीच एक विद्वान मित्र ने की है। मेरी समझ से क्रिया, बस, क्रिया होती है। क्षण विशेष में उसका घटित होना मानो अनिवार्यता है। जैसे सूरज निकलता है। हवा चलती है। सूरज ढलता है। वायु प्रवाह मुक्त होती है। ये क्रियाएँ क्षण विशेष की महत्ता हैं। फिर भूल क्या और सुधार क्या? मनुष्य तो आरम्भ से ही भूल करने का आदी है। जब से इस पृथ्वी पर मनुष्य अनुभव अर्जित कर बौद्धिक प्राणी बना हैं तब से ही सम्भवतः यह स्थिति है कि वह