तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ)
पण्डित तेनाली रामकृष्णन / लोक संकलन द्वारा
स्रोत: तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ) · भारतीय लोक साहित्य संकलन · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 111, कुल 118 में से
संदर्भ में पढ़ेंअपने लिए धरती तो सुरक्षित चाहता है किन्तु उसकी दृष्टि टँगी रहती है स्वर्ग पर! वह अपनी हर क्रिया को स्वर्ग-प्राप्ति का साधन बना लेना चाहता है। मनुष्य की यह प्रवृत्ति सौभाग्य भी है और दुर्भाग्य भी। सौभाग्य इसलिए कि स्वर्ग की कामना उसे किसी से भी ऐसा व्यवहार करने से रोकती है जो लोक-दृष्टि में अनुचित है और दुर्भाग्य इसलिए कि स्वर्ग की कामना में वह अपनी इच्छित क्रियाओं पर विवेक से अंकुश भी लगाता रहता है। इस तरह उसकी क्रियाएँ स्वस्फूर्त और आत्मप्रेरित नहीं रहपातीं। लोक-प्रचलन के आचार- व्यवहार और विचार के अंकुश नहीं होते तब जो क्रियाएँ होतीं उससे मनुष्य जो सन्तुष्टि प्राप्त करता वह सामाजिक वर्जनाओं से घिरकर की गई क्रियाओं से भिन्न होती।” सुबाहु के विचार स्पष्ट तो थे किन्तु दर्शन बोझिल भी। महाराज कुछ समय तक विचार- मग्न मुद्रा में बैठे रहे, फिर उन्होंने तेनाली राम की ओर देखा। वह सभासदों की बातें रुचिपूर्वक सुन रहा था। मगर अब तक कुछ बोला नहीं था और न ही उसमें इस सन्दर्भ में कुछ बोलने की उत्सुकता ही थी। महाराज कृष्णदेव राय ने तेनाली राम को मौन देखकर कहा, “क्यों तेनाली राम! तुम कुछ नहीं बोल रहे हो? तुम भी तो कुछ कहो!” तेनाली राम के होंठों पर एक हल्की सी स्मित की रेखा प्रकट हुई फिर तेनाली राम ने कहा, “महाराज! हमारे मित्रों ने जो विद्वतापूर्ण बातें कही हैं, उनसे मैं सहमत हूँ। इसलिए बीच में कुछ भी बोलना मैंने उचित नहीं समझा-यही है मेरे मौन का कारण। जहाँ तक मूल प्रश्न की बात है तो मैं भी कहूँगा कि मनुष्य का सबसे बड़ा सौभाग्य अथवा सबसे बड़ा दुर्भाग्य एक ही बात में है। वह बात यह है कि मनुष्य को प्रकृति के अन्य जीवों की तरह कोई सुनिश्चित स्वभाव नहीं मिला है। मनुष्य को छोड़कर प्रायः प्रत्येक जीव-जन्तु, कीट- पतंग, पंछी-पौधे, सभी एक निश्चित स्वभाव के साथ जन्म लेते हैं। मनुष्य को छोड़कर अन्य सभी प्राणी, चाहे वे जन्तु हों या वनस्पति, एक निश्चित स्वभाव के वशीभूत जीवन-यापन करते हैं। इस तरह उनके स्वभाव को ठोस कहा जा सकता है मगर मनुष्य का कोई निश्चित स्वभाव नहीं है इसलिए मनुष्य का स्वभाव ठोस नहीं, तरल है। वह जब चाहे पात्रता के अनुरूप बदल सकता है। परिस्थितियों से प्रभावित होकर बदल सकता है या कहें कि वह कैसा भी हो सकता है। उसे जैसा चाहें वैसा ढाला जा सकता है। “मनुष्य के स्वभाव का सरल होना सौभाग्य है, क्योंकि इसमें परिवर्तन- शीलता है। कुछ भी हो जाने की स्वतंत्रता है। किन्तु यह दुर्भाग्य भी है क्योंकि मनुष्य को स्वयं के निर्माण में अनेक भूलों से साबका पड़ता है। भूलें करना उसकी नियति होती है।” सभा में इस तरह की चर्चाएँ चल ही रही थीं कि इसी बीच महाराज कृष्णदेव राय को सूचना मिली कि दिल्ली के सम्राट बादशाह बाबर का दूत महाराज से मिलने की इच्छा रखता है। महाराज ने उस दूत को अपने दरबार में आदरपूर्वक लाए जाने और उचित आसन पर बैठाए जाने का निर्देश दे दिया। उन्हें सभास्थल पर हो रही चर्चाओं में कई तर्क