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तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ)

तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ)

पण्डित तेनाली रामकृष्णन / लोक संकलन द्वारा

स्रोत: तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ) · भारतीय लोक साहित्य संकलन · 1950 (उद्गम)

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क्या तुम जीवित रहोगे? इन पेड़ों का एक फल भी क्या तुम्हें नसीब होगा?” वृद्ध ने हँसकर जवाब दिया, “जहाँपनाह! अब तक तो मैं अपने पूर्वजों के लगाए पेड़ों से फल खाता रहा हूँ। मैं जो बीज लगा रहा हूँ उसके फलों का आनन्द आनेवाली पीढ़ी लेगी। मैं सन्तुष्ट हूँ कि मैं अपनी पिछली पीढ़ी का ऋण उतार रहा हूँ।” बाबर इस उत्तर से बहुत प्रसन्न हुए और स्वर्णमुद्राओं की एक थैली उस वृद्ध को भेंट कर दी। बादशाह से स्वर्णमुद्राओं की थैली भेंट में मिलने से वृद्ध आनन्दित होकर बोल उठा, “जहाँपनाह! आप सचमुच महान हैं। लोगों को तो वृक्ष बड़े होकर ही फल प्रदान करते हैं किन्तु आपने तो बीज उगने से पहले ही मुझे फल प्रदान कर दिया!” वृद्ध को आनन्दित देखकर बाबर प्रसन्न हुआ और वहाँ से आगे बढ़ गया। दूसरे दिन दिल्ली दरबार में वही वृद्ध बाबर के समक्ष उपस्थित हुआ। बाबर ने उससे पूछा, “क्यों, क्या बात है बाबा? यहाँ क्यों आए हो?” “अपने सिर से यह बोझ उतारने आया हूँ-जहाँपनाह, आपके दरबार में!“ यह कहते हुए वृद्ध ने अपने सिर से बाल और गाल पर चढ़ी दाढ़ी उतारकर कन्धे से लटके झोले में डाल ली और हाथ में रखी थैली बाबर की ओर बढ़ाते हुए कहा, “जहाँपनाह! अब वह वृद्ध ही नहीं है-जो इस इनाम का हकदार था!” बाबर ने अपने सामने दो पल में बदले वृद्ध के चेहरे को देखकर पहचाना, ”अरे! यह तो तेनाली राम है!“ बाबर ने ताली बजाते हुए कहा, “मान गए तेनाली राम...तुमने मुझे आनेवाली पीढ़ी के लिए कुछ कर जाने की नसीहत दी है। इस थैली के तुम ही हकदार हो। इसे अपने पास रखो।” इसके बाद बाबर ने अपने दरबारियों को बीती शाम की घटना सुनाकर तेनाली राम के फन की तारीफ की। दिल्ली दरबार एकबारगी तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठा। थोड़ी देर के बाद बादशाह बाबर ने तेनाली राम से कहा, “मैंने तुम्हारी विद्वता की चर्चा सुनी है-मेरे दरबारियों को कोई पैगाम दो कि ये तुम्हें याद रखें।” तेनाली राम ने अपने स्थान से बिना हिले कहा, “यह व्यवस्था ‘हाँ’, कहने के सिवा कुछ और कहने की इजाजत नहीं देती। परम्परागत रूप से व्यवस्था ‘हाँ’ कहना सिखलाने का ही काम करती है। मैं भी ‘हाँ’ कह रहा हूँ और आपकी आज्ञा मानकर बोल रहा हूँ।...पुरानी सारी व्यवस्थाएँ भी हाँ कहना ही सिखलाती रही हैं। इन ‘हाँ’ कहनेवालों के कारण ही