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तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ)

तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ)

पण्डित तेनाली रामकृष्णन / लोक संकलन द्वारा

स्रोत: तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ) · भारतीय लोक साहित्य संकलन · 1950 (उद्गम)

DevanagariHindipublished118 पृष्ठ

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श्रम और स्वाद एक बार महाराज कृष्णदेव राय तेनाली राम के साथ घोड़े पर सवार होकर शिकार के लिए विजयनगर के निकटवर्ती जंगल में गए। दोनों ने इच्छा भर शिकार किया और वापसी के लिए घोड़ा घुमा लिया। लेकिन थोड़ी ही देर के बाद उन्हें समझ में आ गया कि वे राह भटक गए हैं। दोनों भटकते-भटकते थककर चूर हो चुके थे। घोड़े पसीने से लथपथ थे। सूर्य दक्षिण-पश्चिम के कोण तक पहुँचने ही वाला था। महाराज यह सब देखकर हताश हो रहे थे। उन्होंने तेनाली राम से कहा, “अब क्या होगा तेनाली राम! आखिर हम लोग कब तक जंगल में भटकते रहेंगे? हमारे घोड़े भी थक चुके हैं, उन्हें भी विश्राम चाहिए। जिस तरह प्यास के मारे हमारा गला सूख रहा है, उसी तरह इन घोड़ों को भी प्यास लगी होगी। देखते नहीं, किस तरह हाँफ रहे हैं घोड़े!” “महाराज! धैर्य के अलावा और कोई उपाय नहीं है। अच्छा है कि हम एक ही दिशा में आगे बढ़ते रहें।” तेनाली राम ने कहा। दोनों के घोड़े दौड़ते रहे। थोड़ी देर के बाद तेनाली राम ने महाराज से खुश होते हुए कहा, “महाराज! सामने देखिए। पेड़ पर बगुलों का झुंड बैठा हुआ है।” “तो इसमें खुश होने की क्या बात है? तुम तो ऐसे खुश हो रहे हो तेनाली राम मानो विजयनगर वापसी की राह मिल गई हो!” महाराज ने तेनाली राम से कहा। “ जी हाँ, महाराज! बगुलों के दिखने से यह सम्भावना भी दिखने लगी है कि शीघ्र ही हमें नगर वापसी की राह बतानेवाला कोई-न-कोई मिल जाएगा। खाने के लिए कुछ मिले न मिले, पीने के लिए पानी अवश्य मिल जाएगा।” तेनाली राम ने कहा। “यह तुम किस आधार पर कह रहे हो?” महाराज ने पूछा। “महाराज, बगुलों के आधार पर।” तेनाली राम ने उत्तर दिया। “क्या मतलब?” महाराज ने पूछा। “मतलब यह महाराज कि बगुलों के झुंड का यहाँ होना यह संकेत दे रहा है कि आस-पास ही कोई नदी बह रही है।” तेनाली राम ने कहा।