तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ)
पण्डित तेनाली रामकृष्णन / लोक संकलन द्वारा
स्रोत: तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ) · भारतीय लोक साहित्य संकलन · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें“महाराज, बड़ी कृपा होगी यदि आप वस्त्र बदल लें और इस समय नगर भ्रमण के लिए चलें। शाम को या दिन को जो नगर दिखता है वह नगर का एक रूप है। नगर का वास्तविक रूप तो रात को ही दिखता है।” तेनाली राम ने कहा। महाराज मान गए और तैयार होकर तेनाली राम के साथ धर्मशाला से बाहर आ गए। दोनों पैदल चलते हुए बाजार की ओर आ गए। शाम को इस बाजार में कितनी चहल- पहल थी! महाराज सोच रहे थे-कितना भव्य और सम्पन्न दिख रहा था बाजार! अभी किस तरह सन्नाटे में पड़ा है! मानो यहाँ कभी मनुष्य के पाँव ही न पड़े हों! दुकानों के आगे प्रकाश के स्थान पर अँधेरा था। वे दोनों चलते रहे। एक स्थान पर उन्होंने देखा, एक बेसहारा आदमी एक दुकान के पायों की ओट में ठिठुर कर लेटा हुआ है। ठंड से बचाव के लिए उसके पास कम्बल नहीं था। वे लोग धीमी चाल से उस व्यक्ति की ओर बढ़ने लगे। तभी उन्होंने देखा-विरोधी दिशा से एक व्यक्ति कम्बल ओढ़े चला आ रहा था। उसकी भी -ष्टि उस व्यक्ति पर पड़ी और वह तुरन्त उसके पास गया और अपना कम्बल उतारकर धीरे से उसने उस व्यक्ति को ओढ़ा दिया और स्वयं बिना कम्बल के ही तेज कदमों से वहाँ से चला गया। उसने उस व्यक्ति पर कम्बल डालते समय इतनी सतर्कता निभाई कि उस व्यक्ति की नींद न टूटे। महाराज यह -श्य देखकर चमत्कृत हो उठे। तेनाली राम ने कहा, “महाराज! ऐसे ही लोगों के कारण धरती टिकी हुई है। असल दान तो यही है। बाकी दान के नाम पर जो कुछ भी होता है वह प्रशस्ति पाने का प्रयास है, उपक्रम है, व्यापार है...और कुछ भी नहीं।” महाराज मन-ही-मन ग्लानि से भर उठे कि उनके मन में भी गरीबों को कुछ दान करके अपना जयघोष सुनने की इच्छा उत्पन्न हुई थी। उन्होंने तेनाली राम को गले लगाते हुए कहा, “तेनाली राम! तुमने मेरी आँखें खोल दीं!”