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तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ)

तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ)

पण्डित तेनाली रामकृष्णन / लोक संकलन द्वारा

स्रोत: तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ) · भारतीय लोक साहित्य संकलन · 1950 (उद्गम)

DevanagariHindipublished118 पृष्ठ

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बुलन्द किया, "...बोलो ध्यानी चन्द सेठ की..." दान लेने के लिए खड़े लोगों ने आवाज लगाई, "जय!" इस जयकार की गूँज के साथ ही महाराज तेनाली राम का हाथ पकड़कर पुनः धर्मशाला की दिशा में चल पड़े। महाराज चाहते थे कि तेनाली राम दान पर भी कुछ बोले। जिस तरह लोगों ने उस सेठ के लिए जयकार किया था, उससे महाराज के मन में भी इच्छा हो गई थी कि कभी वे भी गरीबों की बस्ती में जाएँगे और उनकी सहायता के लिए अन्न और द्रव्य दान करेंगे तब लोग उनके लिए भी ऐसे ही जयघोष करेंगे। सत्ता हमेशा ऐसे ही छोटे प्रलोभन से उत्पन्न जय के मद में डूबी रहती है। महाराज की इस चाह में भी सत्ता का वही मद काम कर रहा था। महाराज द्वारा पूछे जाने पर भी तेनाली राम ने सेठ के दान के प्रसंग में कुछ भी नहीं कहा। महाराज क्षुब्ध हो उठे और तेनाली राम से चिढ़कर कहा, "तुम कैसे मनुष्य हो? एक प्रश्न मैंने तुमसे कई बार पूछा लेकिन तुम मौन साधे रहे! आखिर क्यों?" "महाराज! मैं एक ऐसा मनुष्य हूँ जिसका अपनी देह और मन पर पूर्ण अधिकार है।" तेनाली राम ने कहा। "यह है आपके अभी-अभी पूछे गए प्रश्न का उत्तर।" "क्या मतलब?" महाराज ने कहा, "क्यों उलझी हुई बातें कर रहे हो? जो कुछ कहना है, साफ-साफ कहो।" "मेरे कहने का मतलब है कि जिस प्रकार कुम्हार घड़े को बनाता है, नाविक नौकाएँ चलाता है, धनुर्धारी शरसन्धान करता है, गायक गीत गाता है, वादक वाद्ययंत्रा बजाता है, उसी प्रकार ज्ञानी व्यक्ति स्वयं पर शासन करता है। मैं ज्ञान-यात्रा का यात्री हूँ इसलिए स्वयं पर शासन करने का अभ्यास करता हूँ। उचित अवसर आने पर ही मैं आपके पूर्व प्रश्न का उत्तर दूँगा।" जब तक ये बातें हो रही थीं तब तक धर्मशाला आ गया था। महाराज तेनाली राम के उत्तर से सन्तुष्ट नहीं थे और अपने प्रश्न की उपेक्षा के कारण कुपित भी हो उठे थे इसलिए विश्राम के लिए अपने कक्ष में चले गए। जाड़े की रात थी। कड़ाके की ठंड पड़ रही थी। तेनाली राम ने मध्य रात्रि में महाराज के कमरे का द्वार खटखटाया। महाराज ने द्वार खोला तो दरवाजे पर तेनाली राम को देखकर साश्चर्य प्रश्न किया, "क्या हुआ तेनाली राम! इतनी रात गए तुमने द्वार क्यों खटखटाया?"