भारतकोश
संग्रह पर लौटें

तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ)

पण्डित तेनाली रामकृष्णन / लोक संकलन द्वारा

स्रोत: तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ) · भारतीय लोक साहित्य संकलन · 1950 (उद्गम)

DevanagariHindipublished118 पृष्ठ

बुलन्द किया, "...बोलो ध्यानी चन्द सेठ की..." दान लेने के लिए खड़े लोगों ने आवाज लगाई, "जय!" इस जयकार की गूँज के साथ ही महाराज तेनाली राम का हाथ पकड़कर पुनः धर्मशाला की दिशा में चल पड़े। महाराज चाहते थे कि तेनाली राम दान पर भी कुछ बोले। जिस तरह लोगों ने उस सेठ के लिए जयकार किया था, उससे महाराज के मन में भी इच्छा हो गई थी कि कभी वे भी गरीबों की बस्ती में जाएँगे और उनकी सहायता के लिए अन्न और द्रव्य दान करेंगे तब लोग उनके लिए भी ऐसे ही जयघोष करेंगे। सत्ता हमेशा ऐसे ही छोटे प्रलोभन से उत्पन्न जय के मद में डूबी रहती है। महाराज की इस चाह में भी सत्ता का वही मद काम कर रहा था। महाराज द्वारा पूछे जाने पर भी तेनाली राम ने सेठ के दान के प्रसंग में कुछ भी नहीं कहा। महाराज क्षुब्ध हो उठे और तेनाली राम से चिढ़कर कहा, "तुम कैसे मनुष्य हो? एक प्रश्न मैंने तुमसे कई बार पूछा लेकिन तुम मौन साधे रहे! आखिर क्यों?" "महाराज! मैं एक ऐसा मनुष्य हूँ जिसका अपनी देह और मन पर पूर्ण अधिकार है।" तेनाली राम ने कहा। "यह है आपके अभी-अभी पूछे गए प्रश्न का उत्तर।" "क्या मतलब?" महाराज ने कहा, "क्यों उलझी हुई बातें कर रहे हो? जो कुछ कहना है, साफ-साफ कहो।" "मेरे कहने का मतलब है कि जिस प्रकार कुम्हार घड़े को बनाता है, नाविक नौकाएँ चलाता है, धनुर्धारी शरसन्धान करता है, गायक गीत गाता है, वादक वाद्ययंत्रा बजाता है, उसी प्रकार ज्ञानी व्यक्ति स्वयं पर शासन करता है। मैं ज्ञान-यात्रा का यात्री हूँ इसलिए स्वयं पर शासन करने का अभ्यास करता हूँ। उचित अवसर आने पर ही मैं आपके पूर्व प्रश्न का उत्तर दूँगा।" जब तक ये बातें हो रही थीं तब तक धर्मशाला आ गया था। महाराज तेनाली राम के उत्तर से सन्तुष्ट नहीं थे और अपने प्रश्न की उपेक्षा के कारण कुपित भी हो उठे थे इसलिए विश्राम के लिए अपने कक्ष में चले गए। जाड़े की रात थी। कड़ाके की ठंड पड़ रही थी। तेनाली राम ने मध्य रात्रि में महाराज के कमरे का द्वार खटखटाया। महाराज ने द्वार खोला तो दरवाजे पर तेनाली राम को देखकर साश्चर्य प्रश्न किया, "क्या हुआ तेनाली राम! इतनी रात गए तुमने द्वार क्यों खटखटाया?"

“महाराज, बड़ी कृपा होगी यदि आप वस्त्र बदल लें और इस समय नगर भ्रमण के लिए चलें। शाम को या दिन को जो नगर दिखता है वह नगर का एक रूप है। नगर का वास्तविक रूप तो रात को ही दिखता है।” तेनाली राम ने कहा। महाराज मान गए और तैयार होकर तेनाली राम के साथ धर्मशाला से बाहर आ गए। दोनों पैदल चलते हुए बाजार की ओर आ गए। शाम को इस बाजार में कितनी चहल- पहल थी! महाराज सोच रहे थे-कितना भव्य और सम्पन्न दिख रहा था बाजार! अभी किस तरह सन्नाटे में पड़ा है! मानो यहाँ कभी मनुष्य के पाँव ही न पड़े हों! दुकानों के आगे प्रकाश के स्थान पर अँधेरा था। वे दोनों चलते रहे। एक स्थान पर उन्होंने देखा, एक बेसहारा आदमी एक दुकान के पायों की ओट में ठिठुर कर लेटा हुआ है। ठंड से बचाव के लिए उसके पास कम्बल नहीं था। वे लोग धीमी चाल से उस व्यक्ति की ओर बढ़ने लगे। तभी उन्होंने देखा-विरोधी दिशा से एक व्यक्ति कम्बल ओढ़े चला आ रहा था। उसकी भी -ष्टि उस व्यक्ति पर पड़ी और वह तुरन्त उसके पास गया और अपना कम्बल उतारकर धीरे से उसने उस व्यक्ति को ओढ़ा दिया और स्वयं बिना कम्बल के ही तेज कदमों से वहाँ से चला गया। उसने उस व्यक्ति पर कम्बल डालते समय इतनी सतर्कता निभाई कि उस व्यक्ति की नींद न टूटे। महाराज यह -श्य देखकर चमत्कृत हो उठे। तेनाली राम ने कहा, “महाराज! ऐसे ही लोगों के कारण धरती टिकी हुई है। असल दान तो यही है। बाकी दान के नाम पर जो कुछ भी होता है वह प्रशस्ति पाने का प्रयास है, उपक्रम है, व्यापार है...और कुछ भी नहीं।” महाराज मन-ही-मन ग्लानि से भर उठे कि उनके मन में भी गरीबों को कुछ दान करके अपना जयघोष सुनने की इच्छा उत्पन्न हुई थी। उन्होंने तेनाली राम को गले लगाते हुए कहा, “तेनाली राम! तुमने मेरी आँखें खोल दीं!”

माँ की पहचान

तेनाली राम विलक्षण बुद्धि का था। वह विपरीत परिस्थितियों में भी अपना धैर्य बनाए रखता था। उसमें ऐसे अनेक गुण थे जो उसे आम विद्वानों से अलग करते थे। उसकी इन क्षमताओं के कारण ही महाराज कृष्णदेव राय उसे ऐसे उलझनपूर्ण कार्य भी सौंप दिया करते थे जिसका हल आम सभासदों के पास नहीं हुआ करता था।

एक बार महाराज एक नवजात शिशु को लेकर बहुत परेशान हो उठे। हुआ यह कि राजप्रासाद के निकट मन्दिर का पुजारी सुबह एक नवजात को अपनी गोद में उठाए महाराज के पास पहुँचा और बच्चे को महाराज को सौंपते हुए बताया, “महाराज! आज सुबह जब मैं मन्दिर की सफाई कर रहा था तब यह नवजात बालक मुझे मन्दिर की सीढ़ियों के पास पड़ा हुआ मिला। सम्भवतः रात भर यह बालक वहीं पड़ा हुआ था जिसके कारण ठंडी हवा के झोंकों ने बालक को अस्वस्थ कर दिया। मैंने सबसे पहले रुई के फाहे से इस बच्चे को दूध पिलाया फिर आँच के पास बैठकर इस बच्चे के शरीर को सेंका जिसके बाद बालक की स्थिति में सुधार आया। महाराज! मैं बाल ब्रह्मचारी हूँ और मन्दिर में ईश- वन्दना में लगा रहता हूँ। मुझे अपनी ही सुध नहीं रहती। ऐसे में मैं इस बालक का लालन- पालन कैसे करूँगा? आप इस राज्य के महाराज हैं। विजयनगर का हर प्राणी आप पर निर्भर है। यहाँ के प्रत्येक छोटे-बड़े, अमीर-गरीब, स्त्री-पुरुष और बालक-बालिका की सुरक्षा की जिम्मेदारी, राजा होने के नाते, आपकी है। ऐसा सोचकर मैं यह बालक आपके पास लेकर आया हूँ और इसे आपको सौंप रहा हूँ। आप इसके लालन-पालन की व्यवस्था करें। वैसे महाराज, मेरी सलाह है कि आप इस बालक की माता की तलाश कराएँ और इसे उसको ही सौंपें क्योंकि एक माँ से अधिक अच्छी परवरिश किसी भी शिशु की कोई दूसरा नहीं कर सकता। यह बात मनुष्य ही नहीं अपितु समस्त जीवों के लिए मान्य है।”

महाराज उस पंडित की अकाट्य बातें सुनकर कुछ भी बोलने की स्थिति में नहीं थे इसलिए उन्होंने उस बच्चे को अपनी गोद में ले लिया।

पंडित बालक सौंपने के बाद महाराज से विदा लेकर मन्दिर चला आया।

बालक को अपनी गोद में लेकर महाराज कुछ देर तक असमंजस की स्थिति में रहे। उनके मन में बार-बार यह विचार उत्पन्न हो रहा था कि यदि इस शिशु को उसकी माँ की गोद मिल जाए तो इससे अच्छी और कोई बात नहीं होगी।

महाराज कृष्णदेव राय धुन के पक्के थे। उन्होंने मन में ठान लिया कि वे इस बच्चे को उसकी माँ की गोद में ही सौंपेंगे। लेकिन कैसे? यह सवाल उनके अन्तर्मन में बार-बार उमड़-

घुमड़ रहा था। मन में उठ रहे सवालों के बवंडर से अप्रभावित महाराज बच्चे को गोद में लेकर महल चले आए और उस बच्चे को अपनी महारानी की गोद में डालते हुए कहा, “महारानी, इस बच्चे की माँ की तलाश की जाएगी। जब तक इसकी माँ नहीं मिल जाती तब तक आप ही इसके लालन-पालन का कर्तव्य निभाहें।“ इसके बाद उन्होंने महारानी को वह पूरा वृत्तान्त सुना दिया जो कि बच्चा मिलने के सम्बन्ध में मन्दिर का पुजारी उन्हें सुना गया था। महारानी को बालक थमाकर महाराज राजभवन पहुँचे और प्रहरी को भेजकर अविलम्ब तेनाली राम को बुलावा भेजा। तेनाली राम अचानक महाराज द्वारा बुलाए जाने से थोड़ा उद्वेलित हुआ और अविलम्ब उनसे मिलने के लिए राजभवन पहुँच गया। राजभवन पहुँचकर तेनाली राम ने देखा, महाराज राजभवन में बेचैनी से टहल रहे हैं। तेनाली राम ने महाराज के सामने पहुँचकर औपचारिक अभिवादन किया लेकिन महाराज ने बिना औपचारिकता के तेनाली राम का हाथ थाम लिया और एक मित्र की तरह टहलते हुए राजभवन के पार्श्व में बने बगीचे में चले आए। तेनाली राम के आने के बाद महाराज थोड़े आश्वस्त अवश्य हुए कि अब उस बच्चे को उसकी माँ तक पहुँचाने की व्यवस्था हो जाएगी। उन्होंने बाग में टहलते हुए पुजारी द्वारा उस शिशु को लाए जाने और शिशु को महारानी को सौंपे जाने तक की कहानी तेनाली राम को सुना दी। तेनाली राम महाराज के मन के उद्वेलन को तो समझ ही रहा था, एक राजा होने के नाते उस बालक के प्रति उनके दायित्व को भी समझ रहा था। अन्ततः महाराज ने कहा, “तेनाली राम! मैं चाहता हूँ कि इस बच्चे की माँ की खोज की जाए और ऐसी व्यवस्था की जाए कि वह महिला अपने बच्चे का लालन-पालन करे। मुझे लगता है कि किसी महिला ने अपनी गरीबी के कारण इस बच्चे को भगवान के मन्दिर में छोड़ा। भगवान के मन्दिर में आस्थावान, धार्मिक प्रवृत्तियों के लोग जाते हैं। बच्चे को मन्दिर में छोड़ते समय उस महिला के मन में यही विचार रहा होगा कि कोई धर्मात्मा इस बच्चे को अपना लेगा और इसका लालन-पालन करेगा। वह अपने बच्चे को निश्चित रूप से संस्कारवान बनाने की कामना रखती होगी इसलिए ही उसे मन्दिर के द्वार पर छोड़कर चली गई।” महाराज यह सब कहते हुए भावुक हो उठे और आगे कहा, “तेनाली राम! मेरा मन कहता है कि इस बच्चे को इसकी माँ अवश्य मिलेगी।” तेनाली राम महाराज की मनःस्थिति समझ रहा था। उसने महाराज से कहा, “यदि आपका मन कहता है तो महारानी को उस बालक को पालने दीजिए और जब उसकी माँ आ जाए तब उसे वह बालक सौंप दीजिए।”

“तुम भी क्या बातें करते हो तेनाली राम! तब क्या बहुत विलम्ब न हो जाएगा? फिर महारानी की गोद में पलने के बाद यह बालक किसी अन्य महिला को माँ का सम्मान दे पाएगा? नहीं, ऐसा करना उचित नहीं होगा।” महाराज ने कहा। तेनाली राम को महाराज की बातें ठीक लगीं और उसने महाराज की इच्छा जानने के लिए पूछा, “फिर उचित क्या होगा महाराज?” “उचित यह होगा कि हम इस बच्चे की माँ को तलाश करें।” महाराज ने कहा।...थोड़ी देर चुप रहने के बाद महाराज ने फिर कहा, “और मैं चाहता हूँ कि उस बच्चे की माँ की खोज की जिम्मेदारी तुम स्वीकार करो।” यह बात हालाँकि तेनाली राम पहले समझ चुका था लेकिन महाराज के मुँह से सुन लेने के बाद उसने कहा, “जैसी महाराज की आज्ञा।” थोड़ी देर तक तेनाली राम चुपचाप महाराज के साथ टहलता रहा और फिर बोला, “महाराज, यदि मैं इस बच्चे की माँ की खोज करूँगा तो यह भी चाहूँगा कि इससे सम्बन्धित व्यवस्था भी मैं ही करूँ।” “हाँ! तुम्हें पूरी छूट है। जो चाहो करो।” महाराज ने कहा। “तो महाराज, मेरी पहली विनती है कि उस बालक को राजभवन में एक पालने पर रखवा दें और उसकी देखभाल वहाँ हो सके इसके लिए एक दासी वहाँ नियुक्त करवा दें। मैं जानता हूँ कि महारानी जी बच्चे की अच्छी देखभाल कर रही होंगी लेकिन बच्चे की माँ की खोज के लिए बच्चे को महल से राजभवन में लाया जाना आवश्यक है।” तेनाली राम ने कहा। महाराज ने तेनाली राम को आश्वस्त किया, “ऐसी व्यवस्था करा दी जाएगी।“ पुनः तेनाली राम ने महाराज से कहा, “महाराज! पूरे विजयनगर में यह मुनादी करा दी जाए कि कल रात नगर के एक मन्दिर में एक बालक मिला है। लालन-पालन के लिए उसे महाराज कृष्णदेव राय अपने साथ ले गए हैं। बच्चे को उन्होंने अपना आधा राज्य देने का मन बना लिया है। इसके सम्बन्ध में कोई भी वैधानिक घोषणा करने से पूर्व महाराज इस बच्चे की माँ से मिलना चाहते हैं ताकि वे उसकी मदद कर सकें। महाराज को विश्वास है कि किसी मजबूरी में ही किसी ने अपने जिगर के टुकड़े को स्वयं से अलग कर भगवान के द्वार पर छोड़ दिया होगा।” महाराज ने इसकी भी स्वीकृति दे दी। दोपहर का समय था। महाराज कृष्णदेव राय का दरबार लगा हुआ था। सभा की कार्रवाई चल रही थी। महाराज से एक सभासद विजयनगर के पूर्वी भाग में सिंचाई की

व्यवस्था कराने का आग्रह कर रहा था क्योंकि बरसात के दिनों में विजयनगर के पूर्वी भाग में अपेक्षाकृत कम बारिश हुई थी जिससे किसानों में हताशा की स्थिति थी। वे आशंकित थे कि यदि सिंचाई की व्यवस्था समय रहते नहीं की गई तो खेत में लगी फसलें बरबाद हो जाएँगी और यदि ऐसा हुआ तो राज्य में खाद्यान्न संकट उत्पन्न हो जाएगा। अभी यह बहस जारी थी तभी एक प्रहरी एक महिला के साथ सभा भवन में आया। तेनाली राम उन्हें देखते ही समझ गया कि अवश्य उसके कहने के अनुसार मुनादी करा दी गई है जिसके कारण यह महिला अपने बच्चे को लेने राजभवन में आई है। तेनाली राम की आशा के अनुरूप ही महिला ने महाराज के समक्ष अपना प्रतिवेदन प्रस्तुत किया, “वह उस बच्चे की माँ है जो महाराज को मन्दिर में मिला है।“ बच्चा पालने में महाराज के पास ही रखा गया था। महाराज ने महिला से कहा, ”आओ और आकर देख लो कि यही बच्चा तुम्हारा है?” महिला महाराज के आसन के पास गई। पालने में सोए बच्चे को भली प्रकार देखा। उसे गोद में लेकर उसे अपने सीने से चिपटा लिया और बिलखती हुई बोली, “जी हाँ, महाराज! यह बच्चा मेरा है। केवल इसके शरीर पर जो वस्त्र हैं, वे मेरे नहीं हैं। बच्चे का बाप नशेड़ी है। हमेशा नशे में धुत्त रहता है। कमाता-धमाता नहीं है। मैं अपनी तंगहाली से आजिज आ गई तब इस बच्चे को मन्दिर में भगवान के भरोसे छोड़ आई। अभी मैंने सुना कि आप इस बच्चे को आधा राज्य देनेवाले हैं तब मैं भागी-भागी यहाँ आ गई। आप यह न सोचें महाराज कि मैं किसी लोभ में यहाँ आई। मुझे कुछ भी नहीं चाहिए। आप इस बच्चे की अच्छी परवरिश कराएँ, यही मेरे लिए बहुत है।” इतना कहकर उस महिला ने बच्चे को पालने में रख दिया और वहीं सुबक-सुबककर रोने लगी। अभी उसका रुदन चल ही रहा था कि प्रहरी एक अन्य महिला को साथ लिए आया और वह महिला जो अभी-अभी महाराज के सामने प्रस्तुत हुई, दूसरी बिलखती हुई महिला पर ध्यान दिए बिना ही बोली, “महाराज, मुझ अबला पर दया कीजिए! मैं अपनी गरीबी से तंग आकर अपने जिगर के टुकड़े से अलग हुई। वह अचानक पालने के पास पहुँची और बच्चे को गोद में उठाकर उसे अपने सीने से लगाकर बेतहाशा चूमने लगी। उसके हाव-भाव से भी यही प्रकट हो रहा था कि वही उस बच्चे की वास्तविक माँ है। महाराज सहित सभी सभासद असमंजस की स्थित में थे कि आखिर इन दोनों महिलाओं में से बच्चे की असली माँ कौन है? तभी तेनाली राम ने अपने आसन से उठकर महिलाओं से पूछा, “ठीक-ठीक बताओ, इस बच्चे की माँ कौन है?”

दोनों महिलाओं के मँह से हठात् निकला, “मैं!” तेनाली राम ने बिना उनकी ओर देखे जोर से कहा, “प्रहरी! बच्चे को तलवार से दो टुकड़े कर दो और इन दोनों महिलाओं को बच्चे का एक-एक टुकड़ा दे दो। झमेला ही खत्म! सुबह से इस बच्चे के कारण राजभवन का कामकाज प्रभावित हो रहा है।” तेनाली राम के स्वरों में खीज और क्रोध का मिला-जुला सम्मिश्रण था। तेनाली राम का यह आदेश सुनते ही पहली महिला के मँुह से अचानक जोरों की चीख निकली, “नहीं!” और वह अपने स्थान से उठकर दो-तीन छलाँग में ही तेनाली राम के पास पहुँचकर उसके पाँवों से लिपटकर विलाप करने लगी, “कृपा कीजिए! ऐसा अनर्थ मत कीजिए! आप यह बच्चा उसी महिला को दे दीजिए! वही उसकी असली माँ है। मैं तो लोभी हूँ। बच्चे को आधा राज्य मिलने के लालच में यहाँ चली आई। मैं उसकी माँ नहीं हूँ, मुझे जो सजा देना चाहें, दे लें मगर बच्चे को कुछ न करें।” इस महिला का यह आचरण देखकर तेनाली राम अपने निष्कर्ष पर पहुँच चुका था। उसने प्रहरियों को बुलाकर दूसरी महिला को गिरफ्तार कर लेने का निर्देश दिया और अपने पैरों से लिपटी महिला को स्नेहपूर्वक उठाया और कहा, “चुप हो जाओ माँ! तेरे लाल को कुछ नहीं होगा। उसका बाल भी बाँका न होगा। चुप हो जाओ!” महिला खड़ी हुई और अपने आँसू पोंछे लेकिन उसकी हिचकियाँ बँधी हुई थीं और रह- रहकर सुबक उठती थी। तेनाली राम ने गिरफ्तार की गई महिला से जाकर पूछताछ की। शीघ्र ही वह महिला टूट गई। उसने स्वीकार कर लिया कि वह बच्चे को आधा राज्य मिलने की घोषणा सुनकर लालच में आ गई और उसी लोभ में पड़कर उसकी माँ होने का दावा कर बैठी। उस महिला की गरीबी और विवशताओं के बारे में जानकर तेनाली राम को उस पर दया आ गई और उसने उसे मुक्त करा दिया। इसके बाद तेनाली राम पहली महिला को साथ लेकर महाराज के पास गया और कहा, “महाराज! यही है इस बच्चे की असली माँ। जो अपने बच्चे को काटे जाने की धमकी से उद्वेलित हो गई और इस बात से भी मुकर गई कि वह उसकी माँ है। इसमें इसका यही स्वार्थ था कि बच्चे को कुछ न हो। वह सुरक्षित रहे।“ महाराज ने महिला की वास्तविक स्थिति का अनुमान लगा लिया और बच्चे सहित उसकी परवरिश की व्यवस्था राज्य की ओर से करा दी।

लौह दंड के फूल विजयनगर में अमन-चैन था। महाराज कृष्णदेव राय की लोकप्रियता आकाश छू रही थी। उन्हें प्रजापालक, न्यायप्रिय और धैर्यवान शासक माना जा रहा था। अपने राज्य में ही नहीं बल्कि पड़ोसी राज्यों में भी उन्हें कृपालु और उदार शासक कहा जाने लगा था। उनकी लोकप्रियता के पीछे तेनाली राम की बुद्धि की बड़ी भूमिका थी। तेनाली राम उनके कार्यों को कुछ ऐसा रूप दे देता था कि लोगों को महाराज की स्वार्थसिद्धि में भी उदारता और न्यायप्रियता की झलक मिलने लगती थी। कुछ दिन पहले ही, जब महाराज अपने राज्य के विकास की रूपरेखा तय करने के लिए भ्रमण कर रहे थे तब तेनाली राम की बुद्धि के कारण उनके काफिले ने बिना कुछ दिए प्रजा से भोजन भी प्राप्त किया और गुणगान भी, मानो महाराज और उनका काफिला प्रजाजनों से भोजन प्राप्त कर उन पर उपकार कर रहे हों! राज्य भ्रमण के समय में महाराज जहाँ कहीं भी गए वहाँ प्रजाजनों ने उनका गर्मजोशी से स्वागत किया। यह सब तेनाली राम की कुशाग्र बुद्धि का ही परिणाम था। लेकिन तेनाली राम ने राज्य भ्रमण के बाद से महाराज में कुछ विचित्र से परिवर्तन देखे। पहले तो उसे लगा कि यह उसका भ्रम है किन्तु महाराज की भंगिमाओं में हो रहे बदलावों पर अनायास ही उसकी दृष्टि पड़ती और उसे लगता कि महाराज में दर्प का समावेश हो रहा है। वे कुछ बोलते तो तेनाली राम को लगता कि यह महाराज नहीं, महाराज का अभिमान बोल रहा है। इसके बाद अपने स्वभाव के अनुरूप तेनाली राम महाराज की प्रत्येक चेष्टा और अभिव्यक्ति पर गौर करने लगा। बहुत सूक्ष्मता से अध्ययन करने पर महाराज के बारे में उसकी स्पष्ट धारणा बनी कि अभी हाल के दिनों में महाराज जब राज्य भ्रमण के लिए निकले थे तो जगह-जगह उन्हें जो अतिशय सम्मान मिला इससे उनके गरिमा-बोध का विस्तार हो गया। अनायास सम्मान से मनुष्य में गर्व का भाव आता ही है। महाराज में यह गर्व बोध बढ़कर घमंड में परिणत हो गया है। तेनाली राम को चिन्ता हुई कि महाराज का घमंड यदि और बढ़ा तो राज्य में उनकी प्रजापालक वाली छवि को क्षति पहुँचेगी। मगर महाराज के बहुत निकट होते हुए भी उसके और महाराज के बीच मर्यादा की एक क्षीण-सी रेखा भी थी। वह उस रेखा का उल्लंघन करना नहीं चाहता था। इसलिए, महाराज को वह सीधे यह नहीं कह सकता था कि ‘महाराज, आप घमंडी हो गए हैं। प्रजा के बीच लोकप्रिय बने रहने के लिए आपका मृदु व्यवहार आवश्यक है।’ स्वाभाविक रूप से तेनाली राम दिन-रात इसी उधेड़बुन में लगा रहता था कि कोई उपाय सूझे तो वह महाराज को उनके बदल रहे स्वभाव के प्रति सचेत कर दे।

एक दिन महाराज घोड़े पर सवार होकर राजभवन से बाहर निकले तथा एक पगडंडी पर सरपट घोड़ा दौड़ाते हुए आगे बढ़े। यह पगडंडी आगे तेनाली राम के आवास की ओर जाती थी। तेनाली राम उसी पगडंडी से राजभवन की ओर जा रहा था। महाराज को उस पगडंडी से आते देखकर तेनाली राम चौंक पड़ा। इतनी सुबह, महाराज राजमार्ग छोड़कर इस पगडंडी से भला कहाँ जा रहे हैं? यह प्रश्न अपने मस्तिष्क में लिये तेनाली राम पगडंडी के किनारे के खेत में खड़ा होकर महाराज की प्रतीक्षा करने लगा। उसके मन में शंका उठ रही थी कि पास में ही गरीबों की बस्ती है और इन गरीबों ने महाराज को कभी देखा होगा, यह आवश्यक नहीं है। इस बस्ती के लोग दिन भर दूर-दराज में परिश्रम करते हैं और रात गए अपने घर लौटते हैं तो नशे में होते हैं। सस्ती मदिरा और मांस इनकी कमजोरी है। इनकी दिनचर्या और रहन-सहन दोनों ही इस बात की सम्भावना पैदा नहीं होने देते कि ये महाराज को जानें। परिश्रम ही इनका महाराज है। ये अपने परिश्रम के द्वारा अपने दुखों से पार पाते हैं इसलिए इन्हें किसी की परवाह भी नहीं होती कि वह कोई फकीर है या राजा! अपने काम से मतलब रखनेवाले इन लोगों की बातों में अजीब-सी तल्खी है। ये बिना लाग-लपेट के बातें करते हैं। और करें भी क्यों नहीं? काम मिला तो किया। पैसा कमाया तो खाया, पीया और मौज किया। काम नहीं मिला तो भूखे ही सो गए। न किसी से लिया, न दिया। ऐसी जीवन-शैली में औपचारिकताओं का स्थान ही कहाँ है? तेनाली राम अभी यह सोच ही रहा था कि एक महिला बस्ती की राह से एक बच्चे की उँगली थामे आई और उसी पगडंडी पर चलने लगी जिस पर महाराज घोड़ा दौड़ाते हुए आ रहे थे। महिला के निकट आने पर उन्होंने कर्कश स्वर में कहा, “अरे! हट्ट! रास्ता छोड़।” उनके मुँह से यह पंक्ति खत्म भी नहीं हो पाई थी कि महाराज का घोड़ा महिला और बच्चे के इतने निकट से गुजरा कि घोड़े के पाश्र्व भाग से महिला को धक्का लगा और वह झटके से बच्चे समेत गिर पड़ी। महाराज ने पीछे घूमकर देखा और घोड़ा धीमा कर बोले, “तू बहरी है क्या? मैं चीखकर तुम्हें राह से हटने के लिए कह रहा था!...तू बहरी ही नहीं, अन्धी भी है... तुम्हें दिखा नहीं कि मैं आ रहा हूँ। बीच राह पर चलने में तुझे मजा आ रहा था?“

महाराज के तेवर देखकर तेनाली राम अपने स्थान से दौड़ा हुआ आया और उसने महिला को उठाया। महिला और उसके बच्चे, दोनों को चोट लगी थी। महिला की नाक से खून टपक रहा था और बच्चे का घुटना छिल गया था। उनकी स्थिति देखने के बाद भी महाराज न तो घोड़े से उतरे और न ही उस महिला को डाँटना बन्द किया। तेनाली राम को देखकर थोड़े संयत जरूर हुए और सामान्य स्वर में तेनाली राम से कहा, “तेनाली राम! यह महिला असभ्य है, इसे राह में चलना भी नहीं आता। बीच सड़क पर बच्चे का हाथ पकड़कर टहलती हुई जा रही थी...।”

तेनाली राम कुछ कहता इससे पहले महिला ने महाराज को टोका, “अरे काहे झूठ बोलता है...तू तो घोड़े को उस डाकू की तरह भगाता आ रहा था, जैसे उसके पीछे सिपाहियों का दल पड़ा हुआ हो!“

महाराज के लिए यह टिप्पणी असह्य थी। अपने पूरे जीवन में उन्होंने ऐसा संवाद नहीं सुना था। वे आग-बबूला हो उठे और चीखे, “तू अन्धी और बहरी दोनों है। तुझे घोड़े की टाप नहीं सुनाई दी? तुझे नहीं दिखा कि मैं आ रहा हूँ...?” “अरे, तू क्या भगवान है? तुझसे तेज फूटती है कि उसकी चैंध से मैं जानती कि भगवान आ रहे हैं या कि मेरी पीठ में आँख है कि मैं देखती कि एक अन्धा घोड़े पर सवार भागा आ रहा है और मैं राह छोड़ देती?”

तेनाली राम ने बीच में हस्तक्षेप किया, “जाने दे माँ! अब जो होना था, हुआ।” और महाराज की ओर मुँह करते हुए तेनाली राम ने महाराज से कहा, “आप भी अपने गन्तव्य की ओर प्रस्थान करें महाराज! मैं जरा इस बच्चे को वैद्य जी से दिखलाकर, इन्हें घर पहुँचा आऊँ।” इसके बाद तेनाली राम ने बच्चे को गोद में ले लिया और बिना महाराज की ओर देखे उस महिला से कहा, “आओ माँ! जरा वैद्य जी के पास चलो।“

महिला महाराज को मन-ही-मन कोसती हुई तेनाली राम के साथ चलने लगी। महाराज तेनाली राम की ओर विस्मय से देखते रह गए। बिना किसी अभिवादन के तेनाली राम वहाँ से महिला और बच्चे के साथ चला गया।

उस दिन पगडंडी से गुजरकर महाराज राजमार्ग पर आए और राजमार्ग से ही राजभवन पहुँचे। उनका मन क्षोभ से भरा हुआ था। एक तो जीवन में ऐसी बातें उन्होंने कभी नहीं सुनी थीं जैसी बातें उन्हें एक महिला सुना गई थी जिसके शरीर पर ढंग के वस्त्रा भी नहीं थे। दूसरी यह कि तेनाली राम जैसा सभासद जो वर्षों से उनकी सेवा में है, उस महिला का दुर्व्यवहार देखने के बाद भी उसी महिला के साथ जा खड़ा हुआ! उनके मन में क्रोध का ज्वार उठ रहा था...यह तेनाली राम जो मेरे कारण पूरे राज्य में सम्मानित है, दूसरे राज्यों में भी जिसकी विद्वता की चर्चा होती है, वह भूल गया कि मैं उसका अन्नदाता हूँ। मेरे कारण ही उसे सम्मान अर्जित करने का अवसर मिला। मैंने उसे अपने राज्य का विदूषक नहीं बनाया होता तो...तो...तो वह कहीं भाड़ झोंक रहा होता और वह महिला...चांडालिन! मैं उसकी धृष्टता का ऐसा दंड दूँगा कि उसे तो क्या, उसके खानदान के किसी भी सदस्य को कहीं पनाह नहीं मिलेगी। महाराज का आक्रोश बढ़ता ही जा रहा था।

सच भी है कि जब सत्तामद चढ़ता है तब मनुष्य उचित-अनुचित का ध्यान नहीं रख पाता। उसका स्वत्व महत्त्वपूर्ण हो जाता है और सर्वोपरि हो जाती है उसकी इच्छा।

मानव-मन की गति तेनाली राम अच्छी तरह समझता था इसलिए महाराज कृष्णदेव राय में आए परिवर्तनों को भी वह जान-समझ रहा था। उसे बस इतनी चिन्ता सता रही थी कि महाराज की भूलों का अहसास वह उन्हें कैसे कराए। आज जब वह उस महिला को सहारा देने के लिए उद्यत हुआ उस समय भी उसकी इच्छा महाराज को अपनी भूलों के प्रति सचेत करना था। मगर ऐसा नहीं हुआ। महाराज तेजी से घोड़ा दौड़ाते हुए वहाँ से

चले गए। तेनाली राम ने समझ लिया कि महाराज वहाँ से आवेश में गए हैं और उसे मालूम था कि महाराज का आवेश जल्दी जाता नहीं है। तेनाली राम ने उस महिला और बच्चे को वैद्य से दिखलाकर उन्हें विदा किया और राजभवन जाने की बजाय अपने घर लौट आया। बहुत देर तक चिन्तन-मनन करने के बाद वह एक निष्कर्ष पर पहुँचा और अपने निष्कर्ष के अनुरूप कुछ करने के लिए सक्रिय हुआ। उसने एक योजना का प्रारूप भोजपत्र पर तैयार किया। प्रारूप तैयार हो जाने के बाद उसने उसे फिर से देखा, मनन किया। इसके बाद उसने कपड़े बदले। घोड़ा निकाला और विजयनगर से बाहर निकलकर सुन्दर घाटी पहुँचा। सुन्दर घाटी एक ऐसा राज्य था जहाँ के कलाकारों को दूर-दूर तक प्रसिद्धि प्राप्त थी। तेनाली राम ने वहाँ एक प्रसिद्ध नाट्य संस्था के संचालक से भेंट की तथा उसे अपनी योजना समझाई फिर उसे कुछ मुद्राएँ भेंट करते हुए कहा कि कार्यक्रम के बाद आपके सभी कलाकारों को मेरी ओर से विशेष पुरस्कार भी मिलेगा और यह पुरस्कार यादगार भी होगा और पारिश्रमिक भी। दो दिनों के बाद ही विजयनगर में नववर्ष महोत्सव होना था। महाराज ने हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी स्वयं अपनी देखरेख में सारी तैयारियाँ करवाई थीं। उन्हें कई स्थलों पर तेनाली राम की आवश्यकता महसूस हुई। तेनाली राम उस दिन से ही लापता था जिस दिन महाराज के घोड़े की चपेट में आकर एक महिला और उसका बच्चा चोटिल हो गया था। पहले तो महाराज को तेनाली राम के इस तरह गायब होने से बहुत क्रोध आया लेकिन जब उसके गायब हुए दो दिन हो गए तब उन्हें भी अपनी भूलों का अहसास होने लगा। उन्होंने मन-ही-मन स्वीकार किया कि उस दिन उनका आचरण न तो भद्रजन जैसा था और न ही शासकोचित। उस महिला के साथ उन्होंने जो व्यवहार किया, वह अहंकारजनित आचरण ही कहा जाएगा। ऐसा विचार कर महाराज ने तेनाली राम को बुलाने के लिए सेवक को भेजा। सेवक ने लौटकर सूचना दी कि तेनाली राम दो दिन पहले घोड़े से कहीं गए हैं तथा अभी तक नहीं लौटे हैं। उनके घर में उनके इस तरह बिना किसी सूचना के कहीं चले जाने को लेकर परिजन चिन्तित हैं। यह सूचना मिलने पर महाराज और चिन्तित हो गए। उसी दिन महाराज के पास दो कलाकार आए। उन्होंने महाराज से बताया कि वे सुन्दर घाटी से आए हैं। हरियाली से भरे अपने राज्य के कलाकारों का एक कार्यक्रम विजयनगर के नववर्ष महोत्सव के खुले मंच पर करना चाहते हैं। महाराज को उन कलाकारों ने बताया कि उनका कार्यक्रम पीड़ित मानवता की सेवा का सन्देश देगा।

महाराज ने उन्हें स्वीकृति प्रदान कर दी क्योंकि यह खुला मंच था ही राज्य के बाहर से आए अपने-अपने क्षेत्र के महान कलाकारों के लिए या ऐसे कलाकारों के लिए जो अपनी कला के माध्यम से समाज को कोई सन्देश देने का संकल्प लेते हों। अन्ततः विजयनगर का नववर्ष महोत्सव प्रारम्भ हो गया। ऐसा सम्भवतः वर्षों बाद हुआ जब महोत्सव में तेनाली राम शामिल नहीं हुआ। ऐसे सभासद, जो तेनाली राम की विद्वत्ता से ईर्ष्या करते थे, वे भी उसकी अनुपस्थिति का कारण जानने को उत्सुक थे तथा जो उसके प्रशंसक थे, वे भी। महाराज की विवशता थी कि वे तेनाली राम के सन्दर्भ में कुछ कर नहीं सकते थे...बस, उन्होंने अपने खुफिया तंत्र को उसके बारे में पता करने का निर्देश दे दिया था। महोत्सव स्थल पर खुला मंच का कार्यक्रम प्रारम्भ हुआ। जब सुन्दर घाटी के कलाकारों का कार्यक्रम आरम्भ हुआ तब उसके संचालक ने एक पंक्ति की घोषणा की, ‘किसी को पतित या कमजोर समझकर उसकी उपेक्षा मत करो क्योंकि ये वैसे लोग हैं जो अभी उठे नहीं हैं।’ रंगमंच से पर्दा हटने पर सबके सामने हरियालियों से सजा एक दृश्य आया। ‘सुन्दर घाटी का यह सौन्दर्य इसकी हरियाली और सुन्दर फूल- पत्तियों के कारण है।’ दृश्य के साथ यह पार्श्व ध्वनि सुनाई पड़ी। पार्श्व ध्वनि में आगे सुना गया, ‘सुन्दर घाटी में बसनेवाले कलाकार सम्पूर्ण धरा को हरियाली से आच्छादित करना चाहते हैं...उनकी चाहत की पवित्रता का परिणाम ही है कि वहाँ लौह दंड के सहारे तपस्या करनेवाले ऋषि को अपनी तपस्या की पूर्णता का भान तब होता है जब उसके तप के प्रभाव से उसके लौह दंड पर भी फूल-पत्ते उग आते हैं। सुन्दर घाटी के कलाकारों का हृदय इतना कोमल और निष्पाप है कि उसके प्रभाव से वहाँ पवित्रता का ढोंग निष्प्रभावी हो जाता है।’ पार्श्व ध्वनि के साथ ही मंच पर एक ऋषि को लौह दंड के सहारे तपस्या करते दिखाया गया और ध्वनि प्रभाव से यह दर्शाया गया कि बहुत वर्ष गुजर गए और ऋषि के लौह दंड में पुष्प खिल गए, हरी-भरी पत्तियाँ आ गईं। तभी वहाँ एक राजा हाथ में लौह दंड लिये आया और संकल्प लियादृ‘जिस तरह ये महर्षि कठोर तप करके अपना जीवन सार्थक कर रहे हैं, उसी तरह मैं भी कठोर तप करके अपना जीवन सार्थक करूँगा।’ और वह राजा उसी महर्षि के पास लौह दंड गाड़कर तपस्या करने लगा। इसके बाद मंच पर तूफान और घनघोर वर्षा का दृश्य पैदा हुआ। राजा और ऋषि इस प्राकृतिक आपदा से बेखबर, तपस्या में लीन रहे। उसके बाद मंच पर अचानक एक दीन-हीन व्यक्ति काँपता हुआ आया। वह वर्षा से भीगा हुआ, कमजोर और बीमार था। वह ऋषि के पास जाकर गिड़गिड़ाया कि वे उसे कहीं सिर छुपाने की जगह बता दें। ऋषि अपनी तपस्या में लीन रहा और जब वह व्यक्ति ऋषि को झकझोरकर उससे सिर छुपाने की जगह बताने के लिए गिड़गिड़ाया तो महर्षि ने उसे धक्का देकर परे ठेल दिया और फिर अपनी तपस्या में लीन हो गया। फिर वह व्यक्ति तपस्या में लीन राजा के पास गया और राजा के पास जाकर गिड़गिड़ाया। राजा ने

अपनी आँखें खोल दीं और उस व्यक्ति की दीन-हीन दशा देखकर तपस्या से उठ खड़ा हुआ। राजा ने उस व्यक्ति को गोद में उठाया और बारिश में भीगते हुए उसे पास की एक कुटिया में ले गया। वहाँ उसने कुछ औषधीय पौधों के पत्ते तोड़े और उसका अर्क निकालकर उस व्यक्ति को पिलाया जिससे वह व्यक्ति स्वस्थ हो गया। इसके बाद राजा अपने तप स्थल पर आया और पद्मासन की मुद्रा में आ गया। दर्शकों ने यह देखकर तालियाँ बजाईं कि राजा के लौह दंड में हरे पत्ते और गुलाबी फूल खिलने लगे तथा ऋषि के लौह दंड के फूल-पत्ते मुरझा गए। फिर पाश्र्व ध्वनि गूँजी, ‘राजा प्रजा-पालक होता है। जो राजा अपनी गरीब प्रजा की सहायता को तत्पर रहता है, उसे उसका पुण्य तपस्या के फल के समान ही मिलता है।” सन्देशों से भरी इस छोटी-सी नाटिका को महाराज कृष्णदेव राय ने भी देखा तथा उसमें निहित सन्देश से प्रभावित हुए। उन्होंने उस मंच के अन्य कार्यक्रमों को भी देखा लेकिन सुन्दर घाटी के कलाकारों के दल के द्वारा प्रस्तुत कार्यक्रम को भूल नहीं पाए। निर्णायक-मंडल ने जब सुन्दर घाटी के कार्यक्रम में निहित सन्देश को श्रेष्ठ माना और सुन्दर घाटी के दल को विजेता घोषित किया तब महाराज ने भी तालियाँ बजाईं। पुरस्कार वितरण के दौरान महाराज ने जो संक्षिप्त वक्तव्य दिया उसमें उन्होंने तेनाली राम को याद करते हुए कहा ”सुन्दर घाटी के कलाकारों की तरह ही तेनाली राम पीड़ित मानवता की सेवा करने की आवश्यकता समझते रहे।“ फिर महाराज ने कहा, ”तेनाली राम हमारे दरबार के विदूषक ही नहीं, मेरे अनन्य मित्र हैं। आज वे यहाँ होते तो इस लघु नाटिका को देखकर उन्हें प्रसन्नता होती...मगर मेरी ही एक भूल...।” महाराज की पंक्ति पूरी नहीं हो पाई थी कि कलाकारों के दल के बीच से एक व्यक्ति, ऋषि की दाढ़ी अपने चेहरे से उतारता हुआ रंगमंच पर पहुँच गया, “बस, महाराज, आगे की पंक्ति मुझे कहने दें!” कहता वह व्यक्ति जब महाराज के पास पहुँच गया तब महाराज के मुँह से हर्ष ध्वनि निकली, ”तेनाली राम! कहाँ चले गए थे?“ उन्होंने तेनाली राम को अपनी भुजाओं में ले लिया। ...और तेनाली राम ने पंक्ति पूरी की, ”हाँ, एक भूल ने मुझमें छुपे कलाकार को मंच पर आने का अवसर दिया।“ महाराज ने गद्गद होकर अपने गले से मोतियों की माला उतारी और तेनाली राम के गले में डाल दी। इसके बाद विजयनगर के महाराज कृष्णदेव राय अपनी प्रजा के प्रति और उदार हो गए। गरीबों के उत्थान के लिए उनके राज्य में कई कार्यक्रम आरम्भ हुए जिससे विजयनगर का यशोगान दूसरे राज्यों तक भी पहुँचा।

तेनाली राम का न्याय महाराज कृष्णदेव राय अपने सभासदों के साथ अपने राजदरबार में बैठे थे। किसी विषय पर बहस चल रही थी। महाराज गौर से सभासदों के विचार सुन रहे थे। इसी बीच एक गरीब व्यक्ति फरियादी के रूप में दरबार में उपस्थित हुआ और महाराज के समक्ष हाथ जोड़कर खड़ा हो गया। महाराज ने उसकी तरफ देखा तो वह सिसकते हुए बोला, “महाराज! फरियादी हूँ। आपके पास अपनी फरियाद लेकर आया हूँ।” महाराज ने उससे कहा, “बोलो! तुम्हारी क्या फरियाद है और तुम क्या चाहते हो?” “महाराज! मैं गड़रिया हूँ। भेड़-बकरियाँ पालना मेरा पुश्तैनी धन्धा है। मेरे परिवार का भरण-पोषण इन्हीं भेड़-बकरियों से होता है। मेरे पड़ोस में एक व्यक्ति पक्के मकान में रहता है। वह साधन-सम्पन्न होते हुए भी मुझसे ईर्ष्या रखता है। इसी ईर्ष्या के कारण उसने मेरी झोंपड़ी से सटाकर अपनी जमीन में ऊंची दीवार खड़ी करवा ली कि मेरी बकरियाँ उसके अहाते में चरने न जा सकें। कल तेज बारिश में उसकी वह दीवार ढह गई और दीवार के मलवे में दबकर मेरी दस बकरियाँ मर गईं। मुझ गरीब को इससे बहुत हानि हुई है जिसकी भरपाई होनी चाहिए, नहीं तो मेरा परिवार चलाना कठिन हो जाएगा।” महाराज कुछ बोलते, उससे पहले ही तेनाली राम ने कहा, “इस घटना में तो नुकसान की भरपाई उसे करनी चाहिए जिसकी दीवार गिरी है।” “जी हाँ, महाराज! मुझे न्याय मिल जाए। इसी आशा में मैं हाथ जोड़े खड़ा हूँ।” फरियादी ने कहा। महाराज ने तेनाली राम से कहा, “तेनाली राम! इस फरियादी की व्यथा-कथा सुनकर तुम जो भी उचित हो, करो।” “जैसी आज्ञा महाराज!“ तेनाली राम ने कहा और प्रहरी को भेजकर उसने फरियादी के पड़ोसी को दरबार में बुलवा लिया। तेनाली राम ने फरियादी के पड़ोसी से कहा, “तुम्हारे मकान की दीवार ढहने से इस व्यक्ति की दस बकरियाँ मर गईं। इसको हुई इस अप्रत्याशित क्षति की भरपाई तो तुम्हें करनी होगी।“

उस व्यक्ति ने तेनाली राम के आगे अपने हाथ जोड़ लिये और कहा, “आपका आदेश सिर आँखों पर, लेकिन श्रीमान, आप इतना तो विचार करें कि दीवार मैंने बनाई नहीं, बनवाई है! दीवार गिरने से मुझे भी तो क्षति हुई है। मेरी क्षतिपूर्ति कौन करेगा? दीवार गिरने का कारण तो अपर्याप्त गारे से ईंटों का जोड़ा जाना ही होगा। इसलिए दीवार गिरने के लिए मैं नहीं, उसे बनानेवाला दोषी है।” तेनाली राम ने उस व्यक्ति से कहा, “तुम ठीक कहते हो। दीवार गिरने से तुम्हें भी क्षति हुई है और इसके लिए भी वह कारीगर जिम्मेदार है जिसने दीवार बनाई है।” तेनाली राम ने आदेश दिया कि दरबार में कारीगर को बुलाया जाए। थोड़ी ही देर में दो सिपाही कारीगर को भी दरबार में पकड़कर ले आए। तेनाली राम ने उस कारीगर को दीवार गिरने की घटना बताई और कहा, “दीवार गिरने से हुई क्षति की भरपाई उसे ही करनी होगी।” तब कारीगर ने कहा, “दीवार गिरने की घटना के लिए वह जिम्मेदार नहीं है। असल में गारा बनाते समय भिश्ती ने जिस मशक से पानी डाला, उस मशक की माप सही नहीं थी जिसके कारण अधिक पानी पड़ने से गारा गीला हो गया और दीवार कमजोर बनी।” दरबार में फिर भिश्ती को भी बुलाया गया। भिश्ती पर जब दीवार गिरने का दोष मढ़ा गया तब भिश्ती रो पड़ा। उसने रोते-रोते कहा, “महाराज! मुझ पर अन्याय न हो! मशक तो मैंने बनाई नहीं। जो मशक मैंने माँगी, इसे बनाने और बेचनेवाले ने मुझे यह मशक देकर झूठ बोला कि जिस माप की मशक मैंने माँगी थी उसने उसी माप की मशक मुझे बेची है और मुझे यह मशक इसी व्यक्ति ने बेची थी जिसकी बकरियाँ दीवार ढहने से मरी हैं।” तेनाली राम ने फरियादी की ओर देखा। फरियादी हाथ जोड़े बोला, “जी हाँ। मशक मैंने ही बेची थी। मुझे क्षमा कर दें।” तेनाली राम ने उससे कहा, “भविष्य में झूठ बोलकर सामान मत बेचना , जाओ, घर जाओ।” फरियादी अपना-सा मुँह लेकर अपने घर लौट आया।

कारगर तरकीब तेनाली राम अपनी मेधा के बूते विजयनगर के दरबार का सबसे लोकप्रिय सभासद बन चुका था। एक साधारण विदूषक ने इतनी तरक्की कर ली थी कि उसके सहकर्मी सभासद उससे ईर्ष्या करने लगे थे। तेनाली राम को किसी चीज का अभाव नहीं था। प्रायः दरबार में महाराज उसकी बातों से प्रसन्न होकर उसे कुछ-न-कुछ देते रहते थे। सहकर्मियों की ईर्ष्या का यही कारण था। एक दिन दरबार में इस बात की चर्चा आरम्भ हो गई कि कोई किसी को कितनी बार मूर्ख बना सकता है-एक बार, दो बार या बार-बार? अधिकांश सभासदों की राय थी कि कोई भी व्यक्ति किसी को एक बार तो मूर्ख बना सकता है, बार-बार नहीं। इस चर्चा में सभी सभासद बढ़-चढ़कर भाग ले रहे थे मगर तेनाली राम इस चर्चा के प्रति उदासीन था और चुपचाप अपने आसन पर बैठा हुआ था। महाराज कृष्णदेव राय स्वयं इस चर्चा में रुचि ले रहे थे। अचानक उनका ध्यान इस बात की ओर गया कि तेनाली राम इस चर्चा में भाग नहीं ले रहा है तथा उदासीन भाव से अपने आसन पर इस तरह बैठा हुआ है मानो इस चर्चा का कोई अर्थ ही न हो! सारा दरबार एकमत हो गया कि कोई भी व्यक्ति किसी को एक बार ही मूर्ख बना सकता है। स्वयं महाराज ने यह बात निष्कर्ष के रूप में कही। मगर तेनाली राम तब भी शान्त रहा। शेष सभासद महाराज की हाँ में हाँ मिलाते रहे। जब महाराज ने देखा कि इस चर्चा के निष्कर्ष तक पहुँचने के बाद भी तेनाली राम शान्त है तब उन्होंने पूछा, "क्या बात है तेनाली राम! तुम चुप क्यों हो? क्या तुम नहीं मानते कि कोई भी किसी को एक बार ही मूर्ख बना सकता है?" तेनाली राम कुछ बोलता, उससे पहले ही सारे सभासद हँस पड़े और उनमें से एक ने कटाक्ष किया, "महाराज, तेनाली राम विद्वान हैं और वे हम सबको एक बार में मूर्ख बना सकते हैं, ऐसे में वे हमारी बात से सहमत क्यों होंगे?" महाराज हँसते हुए पूछ बैठे, "क्या सचमुच ऐसा है तेनाली राम? तुम एक बार में हम सबको मूर्ख बना सकते हो?" तेनाली राम ने विनम्रतापूर्वक कहा, "महाराज! मैं ऐसा कोई दावा कैसे कर सकता हूँ? आप अन्नदाता हैं। आप स्वामी हैं और मैं सेवक हूँ। हाँ, इतना अवश्य है कि अभी जो कुछ कहा गया है, उससे मैं सहमत नहीं हूँ।"

तभी एक सभासद ने कहा, “महाराज, दरबार के निष्कर्ष को नहीं मानने का अर्थ यही है कि तेनाली राम मानते हैं कि एक आदमी एक ही साथ हम सबको मूर्ख बना सकता है।” तेनाली राम को अब गुस्सा आने लगा था। उसने महसूस किया कि दरबार के सभी सभासद आज उसे निशाना बनाकर घेर रहे हैं और उसने जो नहीं कहा है, वही स्वीकार करवाना चाहते हैं। वह असल में इस तरह की व्यर्थ की चर्चा में पड़ना नहीं चाहता था जिसके कारण मौन था। महाराज उसकी चुप्पी तोड़ना चाहते थे इसलिए उन्होंने तेनाली राम से सीधा सवाल किया, “तो तेनाली राम! तुम यह मानते हो कि एक आदमी एक बार में पूरी सभा को मूर्ख बना सकता है।” अब तक तेनाली राम मन-ही-मन कुछ विचार कर चुका था। उसने आसन से उठकर कहा, “अपराध क्षमा हो महाराज! ऐसा हो सकता है।” ”ठीक है!“ महाराज ने कहा, “हमें प्रतीक्षा रहेगी। पर स्मरण रखना कि ऐसे प्रयास के समय तुम अकेले पड़ जाओगे और मेरे साथ सारे सभासद होंगे! सोचो, तब भी क्या तुम हम सबको एक साथ मूर्ख बना दोगे?” “जी हाँ महाराज!” विनम्रता से तेनाली राम ने कहा। सारे सभासद तेनाली राम के इस उत्तर से सन्न रह गए। उन्हें तेनाली राम के इस उत्तर का अनुमान ही नहीं था। उन्हें लगा कि तेनाली राम अपनी औकात भूल गया है। महाराज उसके इस उत्तर से अवश्य नाराज होंगे। तेनाली राम की अब खैर नहीं। दूसरी तरफ महाराज सोच रहे थे कि तेनाली राम में विशेष योग्यताएँ हैं। वह याद कर रहा है कि महाराज सहित सारे सभासदों को एक बार में ही मूर्ख बनाया जा सकता है तो उसके इस साहसपूर्ण उत्तर का आधार अवश्य होगा। तेनाली राम जैसा व्यक्ति कभी यूँही अपना मान रखने के लिए कुछ नहीं बोलता। यह देखना रोचक होगा कि किस प्रकार वह एक साथ सभी सभासदों को मूर्ख बनाता है। उस दिन बात आई-गई हो गई। दूसरे दिन से महाराज के दरबार में सामान्य दिनों की तरह ही काम-काज होने लगा। सभासद और महाराज तेनाली राम की बात को भूल गए। एक दिन तेनाली राम अपनी खाट झाड़ रहा था। घर में सफाई हो रही थी। खाट झाड़ने पर खाट से कुछ खटमल गिरे। खटमलों को देखकर तेनाली राम के मस्तिष्क में एक विचार कौंध गया और उसने उनमें से मोटे-मोटे खटमलों को एकत्रित कर एक छोटी डिबिया में बन्द कर लिया।

रसोई से वह एक छोटी खरल, मूसली और एक छोटी चिमटी उठा लाया। इन सारी चीजों को उसने एक थैली में रख लिया। उसके होंठों पर एक विचित्र मुस्कान तैर रही थी और आँखों में एक विशेष चमक थी। दूसरे दिन तेनाली राम अपने नियत समय से पहले बिस्तर से उठ गया और शीघ्रता से स्नान-ध्यान करके राजदरबार की ओर चल पड़ा। जिस समय वह राजदरबार पहुँचा, उस समय वहाँ कोई नहीं आया था। उसने थैली से डिबिया निकाली और उसका ढक्कन खोलकर उसमें रखे खटमल महाराज के आसन पर उलट दिए। फिर उसने डिबिया देखी। सारे खटमल महाराज के सिंहासन पर उड़ेले जा चुके थे और डिबिया खाली थी। इसके बाद तेनाली राम अपने आसन पर जा बैठा। धीरे-धीरे सभासद आने लगे। दरबार भरने लगा। थोड़ी देर बाद दरबार के सारे आसन भर गए। महाराज भी आए और सभा की कार्रवाई शुरू हो गई। सभा की कार्रवाई अभी थोड़ी देर ही चली थी कि महाराज को एक खटमल ने काट लिया। महाराज ने पहलू बदला। थोड़ी राहत महसूस की कि फिर खटमल ने उन्हें काट लिया। थोड़ी ही देर में महाराज बेचैन हो उठे। खटमलों के काटने से वे परेशान थे। उन्होंने चीखकर क्रोध-भरे स्वर में पूछा, “मेरे आसन पर खटमल कहाँ से आ गए?” एक सभासद ने कहा, “महाराज! खटमल तो कहीं से भी आ जाते हैं और आ गए तो जिस खाट-खटिया में पनाह लेते हैं, उसे छोड़ते भी नहीं। मानव रक्त ही इनका आहार होता है इसलिए ये ऐसी ही जगह पर बसेरा बनाते हैं जहाँ मनुष्य बैठता है या सोता है।” ”आपमें से कोई इन खटमलों से बचने का उपाय जानता हो तो कुछ करे।“ सभासद मौन हो गए। थोड़ी देर तक आपस में धीमे-धीमे बातें करने के बाद एक सभासद ने कहा, “सिंहासन पर गरम पानी उड़ेलने से थोड़ी राहत मिल सकती है।” महाराज खटमलों के काटने से परेशान हो उठे थे जिसके कारण उन्होंने आवेश में कहा, “राहत नहीं, छुटकारा चाहिए। स्थायी निदान बताएँ।” सभासदों को मानो साँप सँूघ गया। अब कहीं से फुसफुसाहट भी नहीं उभर रही थी। सबको मौन देखकर तेनाली राम अपने आसन से उठा, “महाराज! मेरे पास इस समस्या से मुक्ति का एक रामबाण निदान है जिसे आजमाया जाए तो खटमलों से मुक्ति मिल जाएगी। एक लगनशील व्यक्ति मेरे इस रामबाण निदान से करोड़ों खटमलों को मार सकता है।“

सभासद तेनाली राम की बात सुनकर चौंक पड़े। महाराज ने तेनाली राम की ओर अविश्वास से देखा और पूछा, “क्या ऐसा हो सकता है तेनाली राम?” ”जी हाँ, महाराज! मेरे इस रामबाण तरकीब को आजमाकर देखें। मेरी बात गलत साबित हो जाए तो मैं एक भी स्वर्णमुद्राएँ दंड के रूप में राजकोष में जमा कराने का वचन देता हूँ।” महाराज ने कहा, ”ठीक है तेनाली राम! तुम अपनी तरकीब आजमाकर दिखा दो!“ ”लेकिन महाराज! यदि मेरी तरकीब ठीक निकली तब मुझे क्या मिलेगा?“ तेनाली राम ने पूछा। महाराज ने तेनाली राम की ओर देखते हुए कहा, “मैं और इस दरबार के सारे सभासद मिलकर तुम्हें एक भी स्वर्णमुद्राएँ देंगे।” अब तेनाली राम महाराज के आसन के पास गया और आसन को थोड़ा उठाकर झटके से छोड़ा। एक-दो खटमल झटके के कारण आसन से गिरे। तेनाली राम ने अपनी थैली से चिमटी निकाली और एक खटमल को पकड़कर खरल में डाला और मूसली से उसे कुचल दिया। फिर कहा, “महाराज! यही है वह रामबाण तरकीब।“ आप चाहें तो इस तरह पकड़कर करोड़ों खटमलों को मारकर उनसे छुटकारा पा सकते हैं।“ ”अरे, यह तो ठगी है!“ महाराज ने चकित होकर कहा। तेनाली राम ने विनम्रतापूर्वक कहा, “महाराज! मैंने इस भरी सभा में जो बात कही, उसका अक्षरशः प्रयोग किया और जिस रामबाण विधि का प्रदर्शन किया उसे कोई गलत साबित नहीं कर सकता। इसलिए मैं शर्त जीत चुका हूँ। आगे आपकी इच्छा!” महाराज ने स्वीकार कर लिया कि तेनाली राम शर्त जीत चुका है तथा उसे तत्काल राजकोष से एक भी स्वर्णमुद्राएँ देने का निर्देश देते हुए उन्होंने राज्य कोषागार के प्रधान से कहा, ”सभासदों के मासिक वेतन से इसकी आधी राशि प्राप्त कर ली जाए। सभी सभासदों के वेतन से समान राशि काटी जाए, क्यों?“ उन्होंने सभासदों की ओर, उनकी सहमति जानने के लिए प्रश्न किया। सभी सभासदों ने कहा, “ठीक है महाराज! हमें स्वीकार है।”

इसके बाद पुनः अपने आसन से तेनाली राम उठा और उँचे स्वर में कहा, ”महाराज! धृष्टता क्षमा करें। कुछ दिन पूर्व इसी सभा में मुझसे प्रमाणित करने के लिए कहा गया था कि एक आदमी महाराज सहित पूरी सभा को मूर्ख बना सकता है। इसी शर्त को आज मैंने साबित किया है। मुझे इन एक भी स्वर्णमुद्राओं की कोई आवश्यकता नहीं है। कृपया अपना निर्देश वापस ले लें।“ फिर वह महाराज के आसन के पास गया और महाराज से थोड़ी देर के लिए आसन छोड़ने का अनुरोध किया। महाराज समझ गए कि तेनाली राम आसन से खटमलों का सफाया करने के लिए उपस्थित हुआ है। तेनाली राम जानता था कि खटमल थोड़ी देर पहले ही आसन पर रखे गए हैं इसलिए अभी वे अपने छुपने का स्थान नहीं बना पाए होंगे। उसने आसन पटक-पटककर खटमलों को उससे निकाला और उन्हें कुचलकर मार डाला। महाराज ने भरी सभा में तेनाली राम की मानसिक क्षमता की सराहना की, और वह एक बार फिर सभासदों पर भारी पड़ा।