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तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ)

तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ)

पण्डित तेनाली रामकृष्णन / लोक संकलन द्वारा

स्रोत: तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ) · भारतीय लोक साहित्य संकलन · 1950 (उद्गम)

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महाराज के लिए यह टिप्पणी असह्य थी। अपने पूरे जीवन में उन्होंने ऐसा संवाद नहीं सुना था। वे आग-बबूला हो उठे और चीखे, “तू अन्धी और बहरी दोनों है। तुझे घोड़े की टाप नहीं सुनाई दी? तुझे नहीं दिखा कि मैं आ रहा हूँ...?” “अरे, तू क्या भगवान है? तुझसे तेज फूटती है कि उसकी चैंध से मैं जानती कि भगवान आ रहे हैं या कि मेरी पीठ में आँख है कि मैं देखती कि एक अन्धा घोड़े पर सवार भागा आ रहा है और मैं राह छोड़ देती?”

तेनाली राम ने बीच में हस्तक्षेप किया, “जाने दे माँ! अब जो होना था, हुआ।” और महाराज की ओर मुँह करते हुए तेनाली राम ने महाराज से कहा, “आप भी अपने गन्तव्य की ओर प्रस्थान करें महाराज! मैं जरा इस बच्चे को वैद्य जी से दिखलाकर, इन्हें घर पहुँचा आऊँ।” इसके बाद तेनाली राम ने बच्चे को गोद में ले लिया और बिना महाराज की ओर देखे उस महिला से कहा, “आओ माँ! जरा वैद्य जी के पास चलो।“

महिला महाराज को मन-ही-मन कोसती हुई तेनाली राम के साथ चलने लगी। महाराज तेनाली राम की ओर विस्मय से देखते रह गए। बिना किसी अभिवादन के तेनाली राम वहाँ से महिला और बच्चे के साथ चला गया।

उस दिन पगडंडी से गुजरकर महाराज राजमार्ग पर आए और राजमार्ग से ही राजभवन पहुँचे। उनका मन क्षोभ से भरा हुआ था। एक तो जीवन में ऐसी बातें उन्होंने कभी नहीं सुनी थीं जैसी बातें उन्हें एक महिला सुना गई थी जिसके शरीर पर ढंग के वस्त्रा भी नहीं थे। दूसरी यह कि तेनाली राम जैसा सभासद जो वर्षों से उनकी सेवा में है, उस महिला का दुर्व्यवहार देखने के बाद भी उसी महिला के साथ जा खड़ा हुआ! उनके मन में क्रोध का ज्वार उठ रहा था...यह तेनाली राम जो मेरे कारण पूरे राज्य में सम्मानित है, दूसरे राज्यों में भी जिसकी विद्वता की चर्चा होती है, वह भूल गया कि मैं उसका अन्नदाता हूँ। मेरे कारण ही उसे सम्मान अर्जित करने का अवसर मिला। मैंने उसे अपने राज्य का विदूषक नहीं बनाया होता तो...तो...तो वह कहीं भाड़ झोंक रहा होता और वह महिला...चांडालिन! मैं उसकी धृष्टता का ऐसा दंड दूँगा कि उसे तो क्या, उसके खानदान के किसी भी सदस्य को कहीं पनाह नहीं मिलेगी। महाराज का आक्रोश बढ़ता ही जा रहा था।

सच भी है कि जब सत्तामद चढ़ता है तब मनुष्य उचित-अनुचित का ध्यान नहीं रख पाता। उसका स्वत्व महत्त्वपूर्ण हो जाता है और सर्वोपरि हो जाती है उसकी इच्छा।

मानव-मन की गति तेनाली राम अच्छी तरह समझता था इसलिए महाराज कृष्णदेव राय में आए परिवर्तनों को भी वह जान-समझ रहा था। उसे बस इतनी चिन्ता सता रही थी कि महाराज की भूलों का अहसास वह उन्हें कैसे कराए। आज जब वह उस महिला को सहारा देने के लिए उद्यत हुआ उस समय भी उसकी इच्छा महाराज को अपनी भूलों के प्रति सचेत करना था। मगर ऐसा नहीं हुआ। महाराज तेजी से घोड़ा दौड़ाते हुए वहाँ से