भारतकोश
तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ)

तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ)

पण्डित तेनाली रामकृष्णन / लोक संकलन द्वारा

स्रोत: तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ) · भारतीय लोक साहित्य संकलन · 1950 (उद्गम)

DevanagariHindipublished118 पृष्ठ

पृष्ठ 33, कुल 118 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 33

एक दिन महाराज घोड़े पर सवार होकर राजभवन से बाहर निकले तथा एक पगडंडी पर सरपट घोड़ा दौड़ाते हुए आगे बढ़े। यह पगडंडी आगे तेनाली राम के आवास की ओर जाती थी। तेनाली राम उसी पगडंडी से राजभवन की ओर जा रहा था। महाराज को उस पगडंडी से आते देखकर तेनाली राम चौंक पड़ा। इतनी सुबह, महाराज राजमार्ग छोड़कर इस पगडंडी से भला कहाँ जा रहे हैं? यह प्रश्न अपने मस्तिष्क में लिये तेनाली राम पगडंडी के किनारे के खेत में खड़ा होकर महाराज की प्रतीक्षा करने लगा। उसके मन में शंका उठ रही थी कि पास में ही गरीबों की बस्ती है और इन गरीबों ने महाराज को कभी देखा होगा, यह आवश्यक नहीं है। इस बस्ती के लोग दिन भर दूर-दराज में परिश्रम करते हैं और रात गए अपने घर लौटते हैं तो नशे में होते हैं। सस्ती मदिरा और मांस इनकी कमजोरी है। इनकी दिनचर्या और रहन-सहन दोनों ही इस बात की सम्भावना पैदा नहीं होने देते कि ये महाराज को जानें। परिश्रम ही इनका महाराज है। ये अपने परिश्रम के द्वारा अपने दुखों से पार पाते हैं इसलिए इन्हें किसी की परवाह भी नहीं होती कि वह कोई फकीर है या राजा! अपने काम से मतलब रखनेवाले इन लोगों की बातों में अजीब-सी तल्खी है। ये बिना लाग-लपेट के बातें करते हैं। और करें भी क्यों नहीं? काम मिला तो किया। पैसा कमाया तो खाया, पीया और मौज किया। काम नहीं मिला तो भूखे ही सो गए। न किसी से लिया, न दिया। ऐसी जीवन-शैली में औपचारिकताओं का स्थान ही कहाँ है? तेनाली राम अभी यह सोच ही रहा था कि एक महिला बस्ती की राह से एक बच्चे की उँगली थामे आई और उसी पगडंडी पर चलने लगी जिस पर महाराज घोड़ा दौड़ाते हुए आ रहे थे। महिला के निकट आने पर उन्होंने कर्कश स्वर में कहा, “अरे! हट्ट! रास्ता छोड़।” उनके मुँह से यह पंक्ति खत्म भी नहीं हो पाई थी कि महाराज का घोड़ा महिला और बच्चे के इतने निकट से गुजरा कि घोड़े के पाश्र्व भाग से महिला को धक्का लगा और वह झटके से बच्चे समेत गिर पड़ी। महाराज ने पीछे घूमकर देखा और घोड़ा धीमा कर बोले, “तू बहरी है क्या? मैं चीखकर तुम्हें राह से हटने के लिए कह रहा था!...तू बहरी ही नहीं, अन्धी भी है... तुम्हें दिखा नहीं कि मैं आ रहा हूँ। बीच राह पर चलने में तुझे मजा आ रहा था?“

महाराज के तेवर देखकर तेनाली राम अपने स्थान से दौड़ा हुआ आया और उसने महिला को उठाया। महिला और उसके बच्चे, दोनों को चोट लगी थी। महिला की नाक से खून टपक रहा था और बच्चे का घुटना छिल गया था। उनकी स्थिति देखने के बाद भी महाराज न तो घोड़े से उतरे और न ही उस महिला को डाँटना बन्द किया। तेनाली राम को देखकर थोड़े संयत जरूर हुए और सामान्य स्वर में तेनाली राम से कहा, “तेनाली राम! यह महिला असभ्य है, इसे राह में चलना भी नहीं आता। बीच सड़क पर बच्चे का हाथ पकड़कर टहलती हुई जा रही थी...।”

तेनाली राम कुछ कहता इससे पहले महिला ने महाराज को टोका, “अरे काहे झूठ बोलता है...तू तो घोड़े को उस डाकू की तरह भगाता आ रहा था, जैसे उसके पीछे सिपाहियों का दल पड़ा हुआ हो!“