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तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ)

तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ)

पण्डित तेनाली रामकृष्णन / लोक संकलन द्वारा

स्रोत: तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ) · भारतीय लोक साहित्य संकलन · 1950 (उद्गम)

DevanagariHindipublished118 पृष्ठ

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लौह दंड के फूल विजयनगर में अमन-चैन था। महाराज कृष्णदेव राय की लोकप्रियता आकाश छू रही थी। उन्हें प्रजापालक, न्यायप्रिय और धैर्यवान शासक माना जा रहा था। अपने राज्य में ही नहीं बल्कि पड़ोसी राज्यों में भी उन्हें कृपालु और उदार शासक कहा जाने लगा था। उनकी लोकप्रियता के पीछे तेनाली राम की बुद्धि की बड़ी भूमिका थी। तेनाली राम उनके कार्यों को कुछ ऐसा रूप दे देता था कि लोगों को महाराज की स्वार्थसिद्धि में भी उदारता और न्यायप्रियता की झलक मिलने लगती थी। कुछ दिन पहले ही, जब महाराज अपने राज्य के विकास की रूपरेखा तय करने के लिए भ्रमण कर रहे थे तब तेनाली राम की बुद्धि के कारण उनके काफिले ने बिना कुछ दिए प्रजा से भोजन भी प्राप्त किया और गुणगान भी, मानो महाराज और उनका काफिला प्रजाजनों से भोजन प्राप्त कर उन पर उपकार कर रहे हों! राज्य भ्रमण के समय में महाराज जहाँ कहीं भी गए वहाँ प्रजाजनों ने उनका गर्मजोशी से स्वागत किया। यह सब तेनाली राम की कुशाग्र बुद्धि का ही परिणाम था। लेकिन तेनाली राम ने राज्य भ्रमण के बाद से महाराज में कुछ विचित्र से परिवर्तन देखे। पहले तो उसे लगा कि यह उसका भ्रम है किन्तु महाराज की भंगिमाओं में हो रहे बदलावों पर अनायास ही उसकी दृष्टि पड़ती और उसे लगता कि महाराज में दर्प का समावेश हो रहा है। वे कुछ बोलते तो तेनाली राम को लगता कि यह महाराज नहीं, महाराज का अभिमान बोल रहा है। इसके बाद अपने स्वभाव के अनुरूप तेनाली राम महाराज की प्रत्येक चेष्टा और अभिव्यक्ति पर गौर करने लगा। बहुत सूक्ष्मता से अध्ययन करने पर महाराज के बारे में उसकी स्पष्ट धारणा बनी कि अभी हाल के दिनों में महाराज जब राज्य भ्रमण के लिए निकले थे तो जगह-जगह उन्हें जो अतिशय सम्मान मिला इससे उनके गरिमा-बोध का विस्तार हो गया। अनायास सम्मान से मनुष्य में गर्व का भाव आता ही है। महाराज में यह गर्व बोध बढ़कर घमंड में परिणत हो गया है। तेनाली राम को चिन्ता हुई कि महाराज का घमंड यदि और बढ़ा तो राज्य में उनकी प्रजापालक वाली छवि को क्षति पहुँचेगी। मगर महाराज के बहुत निकट होते हुए भी उसके और महाराज के बीच मर्यादा की एक क्षीण-सी रेखा भी थी। वह उस रेखा का उल्लंघन करना नहीं चाहता था। इसलिए, महाराज को वह सीधे यह नहीं कह सकता था कि ‘महाराज, आप घमंडी हो गए हैं। प्रजा के बीच लोकप्रिय बने रहने के लिए आपका मृदु व्यवहार आवश्यक है।’ स्वाभाविक रूप से तेनाली राम दिन-रात इसी उधेड़बुन में लगा रहता था कि कोई उपाय सूझे तो वह महाराज को उनके बदल रहे स्वभाव के प्रति सचेत कर दे।