तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ)
पण्डित तेनाली रामकृष्णन / लोक संकलन द्वारा
स्रोत: तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ) · भारतीय लोक साहित्य संकलन · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें“तुम क्या बताओगे?” वह सौदागर उसी तरह मुस्कुराता हुआ उन दोनों को मौन देखता रहा। उसके चेहरे पर निश्चिन्तता थी और हाथ उसी तरह स्वर्णमुद्राएँ लेने के लिए बढ़े हुए थे। महाराज ने अपनी जेब से स्वर्णमुद्राओं की थैली निकाली और उसमें से दस के स्थान पर ग्यारह स्वर्णमुद्राएँ गिनकर सौदागर के हाथ में रख दी। सौदागर ने एक स्वर्णमुद्रा अपनी हथेली से निकालकर तल्खी के साथ महाराज के हाथ पर धर दी, “सुल्तान बख्शीश नहीं लेता, देता है, ध्यान रखना! मैं मन का बादशाह हूँ।” पहली बार महाराज को अपने जीवन में ऐसा व्यक्ति मिला था जिसकी आवाज में ऐसा प्रभाव था कि उनका व्यक्तित्व उससे आच्छादित हो गया। उन्होंने मन-ही-मन सोचा-तो इसका नाम सुल्तान है! फिर मन में शंका हुई, कहीं यह कन्धार का सुल्तान तो नहीं?...नहीं, नहीं, अगर ऐसा होता तो यह स्वयं को ‘मन का बादशाह’ नहीं कहता। चाहे जो हो, आदमी है दिलचस्प। “सुना, बातें बेचते हो?” महाराज ने पूछा। सौदागर ने फिर अपनी हथेली आगे बढ़ाई और कहा, “प्रति प्रश्न एक स्वर्णमुद्रा! एक व्यक्ति पाँच प्रश्न केवल!” महाराज ने एक स्वर्णमुद्रा उसकी हथेली पर रख दी। सुल्तान फिर मुस्कुराया। महाराज कृष्णदेव राय इस अजीब सौदागर के अन्दाज के कायल तथा उसके व्यक्तित्व और व्यवहार से सम्मोहित से हो गए। तेनाली राम चुपचाप उस व्यक्ति को देखता रहा। “सुना, तुम कन्धार से आए हो। हम लोग तुम्हारे सामनेवाले कमरे में ठहरे हैं। तुम्हारे कमरे में गधों को देखकर तुमसे मिलने की इच्छा हुई। हम लोग कुछ दिन और रुकेंगे। तुम कब तक रुकोगे?” सुल्तान ने अपनी हथेली फिर बढ़ा दी और महाराज को देखते हुए मुस्कुराता रहा। महाराज ने एक स्वर्णमुद्रा उसकी हथेली पर फिर से रख दी। “जब तक तुम दोनों की तरह तीन और उत्सुक सौदागर न आ जाएँ तब तक!” महाराज ने उसकी हथेली पर एक स्वर्णमुद्रा रखते हुए पूछा, “तुमने अपने साथ इन गधों को क्यों रखा है?”