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तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ)

तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ)

पण्डित तेनाली रामकृष्णन / लोक संकलन द्वारा

स्रोत: तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ) · भारतीय लोक साहित्य संकलन · 1950 (उद्गम)

DevanagariHindipublished118 पृष्ठ

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तेनाली राम ने कहना शुरू किया, “महाराज! मैं तो शाम ढलते ही यहाँ पहुँच गया था। मैंने ये परिधान नहीं पहने थे। साधारण कपड़ों में देखकर मुझे प्रहरियों ने द्वार पर ही रोक लिया। मैं उन्हें समझाता रहा कि मैं पंडित हूँ, मैं काव्यशास्त्री हूँ, मैं यहाँ का आदरणीय आमंत्रित अतिथि हूँ मगर उन्होंने मेरी एक न सुनी। शोर सुनकर आप स्वयं वहाँ आए मगर मेरी पुकार सुनने की आवश्यकता आपने नहीं समझी और मुझे भोजन देकर द्वार से ही भगा देने का निर्देश देकर लौट आए...।” महाराज को सन्ध्या की घटना की स्मृति हो आई। तेनाली राम ने अपनी बात जारी रखी, “...और महाराज, मुझे यहाँ आना ही था इसलिए मैं अपने घर गया और ये वस्त्रा धारण किए, फिर मैं यहाँ आया।” महाराज कृष्णदेव राय अचरज में डूबे तेनाली राम की बातें सुन रहे थे। तभी एक सभासद ने कहा, “तेनाली राम! आप जैसे बुद्धिमान व्यक्ति से ऐसी आशा नहीं की जा सकती कि वह ऐसी भूल करेगा। आप राजभवन में आमंत्रित थे। राजभवन की अपनी एक मर्यादा है। राजभवन में यदि आप फकीरों जैसे वस्त्र में आएँगे तब भला कौन प्रहरी आपको राजा का अतिथि स्वीकार करेगा? आपके साथ जो कुछ भी हुआ, उसके लिए दोषी आप हैं।” तेनाली राम ने मुस्कुराते हुए कहा, “जी हाँ, आप ठीक कह रहे हैं। परिवेश और परिस्थिति का ध्यान रखते हुए परिधान का उपयोग अवश्य करना चाहिए। यही तो मैंने राजसभा में कुछ दिन पहले कहा था-स्मरण करें महाराज!“ तेनाली राम ने महाराज से सीधा संवाद किया। ”आपको अवश्य स्मरण होगा कि तब परिधान के स्थान पर व्यक्ति के आन्तरिक गुणों को महत्त्वपूर्ण बताते हुए मुझे अपने विचारों में संशोधन के लिए प्रेरित किया गया था...।” महाराज ने तेनाली राम को गले से लगाते हुए कहा, “तुम ठीक कह रहे थे, तेनाली राम...उस दिन भी!”