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तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ)

तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ)

पण्डित तेनाली रामकृष्णन / लोक संकलन द्वारा

स्रोत: तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ) · भारतीय लोक साहित्य संकलन · 1950 (उद्गम)

DevanagariHindipublished118 पृष्ठ

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स्वर्ण-पिंडों की पहेली “पृथ्वी का कण-कण हर क्षण एक नई रचना करने में निमग्न है। वायु सतत सन-सन-सन कर सृष्टि में मस्ती का संचार करती रहती है। सूर्य उदित होकर संसार को उजास से भरता है और गतिशील होने के लिए ऊष्मा प्रदान करता है। नदियाँ कल-कल, छल-छल के निनाद के साथ बहती हुई जिधर से निकलती हैं उधर धरती में बीज अंकुरित करने की शक्ति भरती जाती हैं। ..इनमें से कोई अपने कार्य का न तो मूल्य माँगता है और न कभी किसी से किसी तरह की बाधा या अड़चनें आने की बात कहकर थोड़ा विश्राम करने की इच्छा व्यक्त करता है। कार्यों की निरन्तरता ही जीवन की सफलता की कुंजी है।” महाराज कृष्णदेव राय अपने सभासदों के साथ बैठे हुए थे। दरबार लगा हुआ था। तेनाली राम अपने आसन के पास खड़ा होकर बोल रहा था। उसकी बातें समाप्त होते ही कृष्णदेव राय ने अपने आसन से उठकर तालियाँ बजाईं और तेनाली राम को गले से लगा लिया। उस समय दरबार में ‘जीवन में सफल होने के उपाय’ विषय पर सम्भाषण हो रहा था। कई दरबारी आए और बोले। बड़ी-बड़ी शास्त्रीय बातें होती रहीं। अन्तिम वक्ता के रूप में तेनाली राम ने बहुत कम शब्दों में अपनी बातें दरबार में रखीं और महाराज ने उसे विजेता घोषित कर दिया। विजयनगर के दरबार में इससे पहले भी ऐसे कई अवसर आ चुके थे जब तेनाली राम की बुद्धि की सराहना महाराज ने मुक्त कंठ से की थी। दरबारियों में तेनाली राम की मेधा की चर्चा होने लगी थी मगर कुछ सभासदों का विचार था कि तेनाली राम में कोई पांडित्य नहीं है बल्कि वह एक सामान्य-सा इनसान है इसलिए वे उसकी प्रशंसा करने के स्थान पर अवसर विशेष पर आलोचना करने लगते थे। मीन-मेख निकालते हुए तेनाली राम की विशेषताओं को स्वीकार करने के स्थान पर उसमें दोष निकालते। स्थिति ऐसी बनती जा रही थी कि विजयनगर के महाराज की सभा में तेनाली राम से ईर्ष्या करनेवाले सभासदों का एक वर्ग तैयार होता जा रहा था जिसका एकमात्र काम यह था कि जब भी अवसर मिले, महाराज के सामने तेनाली राम की शिकायत की जाए। अपने विरुद्ध ईर्ष्यावश हो रहे इस तरह के कार्यों का ज्ञान तेनाली राम को था किन्तु वह इसे सहज मानवीय प्रवृत्ति के रूप में लेता था तथा किसी भी सभासद के विरोधी आचरण पर उत्तेजित नहीं होता था। एक बार विजयनगर के महामंत्री के घर पर पौत्रा जन्मने के अवसर पर एक भोज का आयोजन हुआ। वर्षों की प्रतीक्षा और मन्नतों के बाद अपने पौत्र के जन्म से महामंत्री की