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तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ)

तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ)

पण्डित तेनाली रामकृष्णन / लोक संकलन द्वारा

स्रोत: तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ) · भारतीय लोक साहित्य संकलन · 1950 (उद्गम)

DevanagariHindipublished118 पृष्ठ

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अब यह तय है कि महाराज उससे ही कहेंगे। यह पहेली हल होनेवाली होती तो वह व्यापारी इतना सोना दाँव पर नहीं लगाता! अब आएगा आनन्द! तेनाली राम की विद्वत्ता की कलई इस बार खुलनी तय है। बड़ा ज्ञानी बना फिरता है...।' दूसरे दिन नियत समय पर विजयनगर के राजप्रासाद में सभासद एकत्रित हुए। व्यापारी सोमदत्त भी आया। महाराज भी पधारे। तेनाली राम का कहीं पता न था। महाराज मन- ही-मन बेचैन हो उठे। आशंकित और संशययुक्त मन से महाराज विचार कर रहे थे कि कहीं पहेली हल न होने के भय से तेनाली राम आया ही नहीं तो वे क्या करेंगे? अभी ऊहापोह के बादल छँटे नहीं थे। सभासदों में भी बेचैनी थी। व्यापारी सोमदत्त ने महाराज से पूछा, “महाराज! ‘स्वर्ण-पिंडों की समस्या का हल?’ महाराज ने उत्तर दिया, “तनिक प्रतीक्षा करो।” व्यापारी अपने आसन पर बैठ गया। सभाकक्ष में फुसफुसाहटें तेज हो गईं। महाराज असमंजस में थे और सिंहासन पर बैठे बार-बार पहलू बदल रहे थे कि अचानक उनकी दृष्टि सभा में प्रवेश कर रहे तेनाली राम पर पड़ गई और उन्होंने राहत की साँस ली। जब तेनाली राम अपनी जगह पर बैठ गया तो महाराज ने व्यापारी सोमदत्त से कहा, “सोमदत्त! अब तुम अपनी समस्या सभासदों के बीच रखो।” सोमदत्त ने पुनः दोनांे स्वर्ण-पिंडों के बारे में अपनी बातें सभा में दोहरा दीं। महाराज ने सभा में घोषणा की, “इस समस्या के समाधान के लिए यदि कोई सभासद स्वयं आगे आना चाहता हो तो आए अन्यथा इस समस्या का समाधान तेजस्वी तेनाली राम करेंगे।” महाराज ने तेनाली राम के नाम के साथ ‘तेजस्वी’ विशेषण जान-बूझकर जोड़ा था। एक भी सभासद समस्या के समाधान के लिए नहीं आया तब महाराज ने तेनाली राम से कहा, “तेनाली राम! आगे आओ और व्यापारी सोमदत्त द्वारा बताई गई समस्या को हल करो!” “महाराज! व्यापारी सोमदत्त से कहें कि वे स्वर्ण-पिंडों को अपनी इच्छा के अनुसार जहाँ चाहें लटका दें। मैं उनकी समस्या का समाधान करने के लिए प्रस्तुत हूँ।।” महाराज ने सोमदत्त को स्वर्ण-पिंडों को कहीं लटकाने का निर्देश दिया। व्यापारी सोमदत्त ने उन स्वर्ण-पिंडों को महाराज और सभासदों के आसनों के मध्य के खुले स्थान में, दीवार पर दो कीलें ठोककर अलगनी जैसी संरचना एक रस्सी के सहारे