तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ)
पण्डित तेनाली रामकृष्णन / लोक संकलन द्वारा
स्रोत: तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ) · भारतीय लोक साहित्य संकलन · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंतैयार कर ली तथा उस अलगनी में उसने दोनों स्वर्ण-पिंडों (जिनके सिरों पर सोने का ही चेन लगा था) को लटका दिया और तेनाली राम की ओर देखकर कहा, “अब आपकी बारी है, तेनाली राम जी।” तेनाली राम ने अपने आसन से बिना हिले-डुले कहा, “महाराज! एक बार फिर सभासदों और व्यापारी से पूछ लें कि कोई भी सभासद चाहे तो व्यापारी के प्रश्न का उत्तर दे दे। व्यापारी चाहे तो अपना प्रस्ताव वापस ले ले। मैं सबको पुनर्विचार का एक अवसर देना चाहता हूँ।” तेनाली राम की बातें सुनकर सभासदों को लगा कि तेनाली राम स्वर्ण-पिंडों की पहेली हल करने में असमर्थ है और वह किसी तरह अपना पिंड छुड़ाना चाहता है। सभा में फुसफुसाहटें उभरीं और शान्त हो गईं। व्यापारी ने घोषणा की, “वह अपने प्रस्ताव की वापसी नहीं चाहता है।” अन्ततः तेनाली राम ने अपने आसन पर बैठे-बैठे ही ऊँचे स्वरों में कहा, “महाराज! आपकी बाईं भुजा की ओर टँगा स्वर्ण-पिंड ठोस है और दाईं भुजा की ओर टँगा स्वर्ण-पिंड खोखला है।” तेनाली राम का स्वर इतना तेज था कि उसे सभी सभासदों ने सुना। व्यापारी सोमदत्त के चेहरे पर हवाइयाँ उड़ने लगीं। फिर भी उसने तेनाली राम से कहा, ”यह दाएँ-बाएँ कहने से समस्या का सही हल नहीं हो सकता। आप ठोस पिंड के पास पहुँचकर बताएँ कि यह ठोस है।” तेनाली राम तत्परता से अपने आसन से उठा और महाराज के बाईं तरफ के पिंड के पास पहुँचकर कहा, “महाराज! यह स्वर्ण-पिंड ठोस है।” “क्यों, व्यापारी सोमदत्त। तेनाली राम का हल सही है?” महाराज कृष्णदेव राय ने पूछा। “जी हाँ, महाराज!” ऐसा कहकर व्यापारी ने दोनों स्वर्ण-पिंड उतारे और उसे मंजूषा में रखकर महाराज को सौंप दिया, “महाराज! अब इन स्वर्ण-पिंडों पर मेरा कोई अधिकार नहीं है।” महाराज ने स्वर्ण-पिंडों वाली मंजूषा थामते हुए कहा, “हाँ, अब इन स्वर्ण-पिंडों पर तेनाली राम का अधिकार है।” व्यापारी सोमदत्त भारी कदमों से महाराज की सभा से चला गया और महाराज ने तेनाली राम को स्वर्ण-पिंडों वाली मंजूषा सौंपते हुए कहा, “यह तुम्हारी मेधा का पुरस्कार