तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ)
पण्डित तेनाली रामकृष्णन / लोक संकलन द्वारा
स्रोत: तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ) · भारतीय लोक साहित्य संकलन · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंतैयारियाँ देख लें। सुबह महाराज अभी बिस्तर से उठे ही थे कि उन्हें प्रहरी ने सूचना दी कि महाराज से मिलने के लिए सभासदों का विशिष्ट मंडल आया हुआ है। महाराज ने प्रहरी को निर्देश दिया कि वह उन लोगों को बाहरी कक्ष में बैठाए और प्रतीक्षा करने के लिए कहे। थोड़ी ही देर के बाद महाराज कृष्णदेव राय अपने कपड़े बदलकर वहाँ पहुँच गए जहाँ उनकी प्रतीक्षा में सभासद बैठे हुए थे। इन सभासदों में तेनाली राम भी था। महाराज को सभी सभासदों ने समारोह की तैयारियों के विषय में जानकारियाँ दीं और उन्हें समारोह स्थल पर चलने को कहा। अभी महाराज अपने सभासदों की बातों का कोई उत्तर भी नहीं दे पाए थे कि महाराज के भवन में आतिथ्य प्राप्त कर रहे उनके मित्र प्रसेनजित ने कक्ष में प्रवेश किया। एक ऐसे कक्ष में जहाँ कोई राजा अपने विशिष्ट सभासदों के साथ विचार-विमर्श या मंत्राण कर रहा हो वहाँ इस प्रकार बिना सूचना दिए प्रवेश कर जाना अशिष्टता समझी जाती थी। सभासद चैंक पड़े और प्रश्नसूचक दृष्टि से प्रसेनजित की ओर देखने लगे। महाराज ने भाँप लिया कि कक्ष में इस तरह प्रसेनजित का आना सभासदों को पसन्द नहीं आया। इसे उनके राज्य में, स्वयं उनके महल में अशिष्टता माना जाता है। लेकिन प्रसेनजित को वे कुछ कह भी नहीं सकते थे। बात बिगड़े नहीं इसलिए उन्होंने मुखर होते हुए कहा, “आओ भाई प्रसेनजित, अपना आसन सँभालो। ये लोग मेरे विशिष्ट सलाहकार हैं और आज नववर्ष समारोह के कार्यक्रम तय करने पधारे हैं।“ थोड़ी देर चुप रहने के बाद महाराज ने अपने सभासदों से कहा, “और ये हैं-प्रसेनजित! कलिंग के महाराजा। मेरे गुरु-भाई और बाल-सखा।” तेनाली राम ने देखा कि प्रसेनजित की चाल में एक दर्प है। महाराज द्वारा परिचय दिए जाने पर जब सभासदों ने उसका अभिवादन किया तो प्रसेनजित ने अपनी गर्दन अकड़ा ली और उसे हल्का-सा हिलाकर अभिवादन स्वीकार किया। तेनाली राम ने उसकी मुद्रा देखकर मन-ही-मन कहा-अरे! यह तो बड़ा दम्भी है। प्रसेनजित ने सभासदों की उपेक्षा करते हुए महाराज कृष्णदेव राय से पूछा, “अरे कृष्णदेव! यह सुबह-सुबह दरबार लगाकर क्यों बैठ गए? समारोह की तैयारी देखना कब से राजाओं का कार्य हो गया? क्या तुम्हारे राज्य में ऐसे योग्यजनों का अभाव है जो समारोह की तैयारी कर सकें?” महाराज कृष्णदेव राय ने झेंपते हुए अपने सभासदों से कहा, “आप लोग सक्षम हैं। जो भी