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तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ)

तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ)

पण्डित तेनाली रामकृष्णन / लोक संकलन द्वारा

स्रोत: तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ) · भारतीय लोक साहित्य संकलन · 1950 (उद्गम)

DevanagariHindipublished118 पृष्ठ

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मित्र की पहचान महाराज कृष्णदेव राय आमोद प्रिय व्यक्ति थे। उल्लास के सामान्य अवसरों पर भी महाराज उत्सव मनाते थे। उनके इस स्वभाव के कारण विजयनगरवासी प्रसन्न रहा करते थे। कहा भी गया है- जैसा राजा, वैसी प्रजा। एक बार, नव वर्ष के शुभागमन पर महाराज कृष्णदेव राय ने अपने मित्रों को बुलावा भेजा। महाराज की इच्छा थी कि इस बार नववर्ष समारोहपूर्वक मनाया जाए। समारोह में उन्होंने पड़ोसी राज्यों के नरेशों को भी आमंत्रण भेजा। नववर्ष के अवसर पर होनेवाले समारोह में राज्य भर के कलाकारों को अपनी कला के प्रदर्शन का अवसर देने का निश्चय कर महाराज ने वैसी व्यवस्था भी करवा ली। समारोह के लिए अतिथियों का आना प्रारम्भ हो गया। पड़ोसी राज्यों के दो नरेश समारोह के दो दिन पहले ही पहुँच चुके थे। महाराज ने इन दोनों नरेशों को अतिथिशाला में नहीं ठहराया बल्कि उन दोनों नरेशों के लिए राजमहल के ही दो कक्षों को सजाया गया था। दोनों नरेश उन्हीं कक्षों में ठहरे थे। इनमें से एक नरेश का नाम था-प्रसेनजित तथा दूसरे का नाम था- वज्रबाहु! महाराज कृष्णदेव राय का बचपन इन दोनों के साथ व्यतीत हुआ था। गुरुकुल के दिनों में महाराज कृष्णदेव राय के साथ ही इन दोनों ने शिक्षा ग्रहण की थी। एक ही गुरुकुल, एक ही गुरु। अतिथि-प्रेमी होने के कारण महाराज कृष्णदेव राय ऐसे भी अपने महल में आनेवालों का खूब सत्कार किया करते थे। अब जब उनके दो बाल-सखा पधारे हों तो उनके स्वागत- सत्कार में कोई कमी कैसे रह सकती थी! महाराज लगातार अपने इन दोनों अतिथियों के पास ही बने रहते। कभी मित्रों के साथ चैसर खेलते तो कभी घुड़सवारी के लिए निकल जाते। दो दिन ऐसे ही बीत गए। नववर्ष समारोह का दिन आ गया। पिछले दो दिनों तक अपने मित्रों की आवभगत में लगे रहने के कारण महाराज को इस बात का कोई ज्ञान नहीं था कि मुख्य समारोह की क्या तैयारियाँ हुई हैं और क्या बाकी हैं। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था कि महाराज मुख्य आयोजन के सन्दर्भ में स्वयं कोई रुचि न दिखाएँ। महाराज के विशिष्ट सभासद भी महाराज के इस आचरण से अचम्भित थे। जिस दिन नववर्ष का मुख्य समारोह आयोजित होनेवाला था, उस दिन प्रातःकाल में महाराज के मुख्य सभासदों और विश्वसनीय माने जानेवाले लोगों ने मिलकर तय किया कि आज वे लोग महाराज से मिलने महल में जाएँगे तथा महाराज से आग्रह करेंगे कि वे समारोह की