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तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ)

तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ)

पण्डित तेनाली रामकृष्णन / लोक संकलन द्वारा

स्रोत: तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ) · भारतीय लोक साहित्य संकलन · 1950 (उद्गम)

DevanagariHindipublished118 पृष्ठ

पृष्ठ 93, कुल 118 में से

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सप्तद्वीप नवखंड विजयनगर-महाराज कृष्णदेव राय का साम्राज्य। धन-धान्य से परिपूर्ण इस राज्य की समृद्धि की चर्चा दूर-दूर तक होने लगी। विजयनगर के वैभव ने पड़ोसी राजाओं को चकित कर रखा था। सभी जानना चाहते थे कि विजयनगर की समृद्धि और वैभव का रहस्य क्या है। विजयनगर के पास ही ‘सप्तद्वीप नवखंड’ नाम का एक वैभवशाली राज्य था। मान्यता थी कि प्राचीन काल में विजयनगर के पार्श्व से एक वेगवती नदी गुजरती थी जिसके बीच में, जगह-जगह पर पाषाण-खंड उभरे हुए थे। कालान्तर में नदी का पानी कम होने लगा और ये पाषाण खंड द्वीपों के रूप में प्रकट होने लगे। एक समय ऐसा भी आया जब यह नदी सूख गई और वहाँ निर्जन स्थल प्रकट हो गया। नदी के सूखते-सूखते प्रकट हुए द्वीपों की संख्या सात थी इसलिए उस निर्जन स्थान को ‘सप्तद्वीप’ के नाम से सम्बोधित किया जाने लगा। नदी के सूखने या लुप्त हो जाने के बाद प्रकट हुई धरती को ‘नवखंड’ की संज्ञा दी गई। इस प्रकार इस निर्जन स्थल को ‘सप्तद्वीप नवखंड’ कहा जाने लगा। ‘सप्तद्वीप नवखंड’ एक ऐसा स्थान था जहाँ चट्टानें अधिक थीं। इसलिए खेती पर निर्भर मनुष्यों को यह निर्जन स्थल अपनी ओर आकर्षित नहीं कर पाता था किन्तु नदी के विलुप्त होने के कारण प्रकट हुई धरती में अद्भुत उर्वरा शक्ति थी। कुछ ही वर्षों में ‘सप्तद्वीप नवखंड’ की धरती हरियाली से ढँक गई। विभिन्न प्रकार की वनस्पतियाँ वहाँ उग आई थीं। शीघ्रता से बढ़नेवाले पौधों ने जल्दी ही पेड़ का रूप ले लिया। वनस्पतियों में फूल और फल लगने लगे। पेड़ों पर चिड़ियों ने पनाह लेना आरम्भ कर दिया। यह इस नवखंड की वह अवस्था थी जब उधर से गुजरनेवाले यात्रियों को यह निर्जन वनस्थल अपनी प्राकृतिक सम्पदा की ओर आकर्षित करने लगा। धीरे-धीरे वहाँ लोग आकर बसने लगे। ‘सप्तद्वीप नवखंड’ नाम से प्रसिद्ध यह स्थल अब मनुष्यों के रहने योग्य बनाया जाने लगा। चट्टानें तरासी गईं। समतल भूमि पर बिछे घास- फूस की जगह धान की हरियाली छाने लगी। गेहूँ, मक्का, ज्वार, बाजरा जैसे मानवोपयोगी अनाज उगाए जाने लगे। झाड़-झंखाड़ के स्थान पर फलदार वृक्षों के पौधे लगाए जाने लगे। इस तरह ‘सप्तद्वीप नवखंड’ की धरती अपने प्राकृतिक ऐश्वर्य से ओत-प्रोत हो गई। वहाँ बसनेवाले लोग किसी एक प्रान्त के नहीं थे। विभिन्न प्रान्तों से आकर बसे लोगों के साथ कोई वंशावली नहीं थी। कोई ‘वंश-वृक्ष’ नहीं था। वे सबके सब अपना अतीत छोड़ आए थे। वंश-बंधु से दूर थे। इसलिए इस ‘सप्तद्वीप नवखंड’ में एक मिश्रित संस्कृति का अभ्युदय हुआ। परस्पर सहयोग की संस्कृति! साहचर्य की संस्कृति! समुच्चय प्राप्त करने के लिए सतत कर्मशील रहने की संस्कृति!

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