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तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ)

तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ)

पण्डित तेनाली रामकृष्णन / लोक संकलन द्वारा

स्रोत: तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ) · भारतीय लोक साहित्य संकलन · 1950 (उद्गम)

DevanagariHindipublished118 पृष्ठ

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जहाँ एक-दूसरे की गति-प्रगति का ध्यान रखनेवाले लोग बसते हों वहाँ वैभव स्वयं प्रकट होता है। ऐसा ही हुआ ‘सप्तद्वीप नवखंड’ में। वहाँ फल- फूल और अनाज का प्रचुर उत्पादन होने लगा। ‘सप्तद्वीप नवखंड’ से फल- सब्जियाँ और अनाज पड़ोसी राज्यों के लोग खरीदकर ले जाने लगे। इस तरह ‘सप्तद्वीप खंड’ में व्यापारिक-संरचना’ भी तैयार होने लगी। परस्पर सहयोग पर निर्भर वहाँ के निवासियों ने अपने लिए एक शासन प्रणाली भी विकसित कर ली। इस तरह ‘सप्तद्वीप नवखंड’ ने एक राज्य का रूप अख्तियार कर लिया।

चूँकि विजयनगर के पास ही बसा हुआ था यह सप्तद्वीप नवखंड इसलिए वहाँ की व्यापार प्रणाली और शासन प्रणाली दोनों पर विजयनगर का प्रभाव था। विजयनगर के शिल्पियों द्वारा निर्मित विविध सामग्री ‘सप्तद्वीप नवखंड’ को भेजी जाती और बदले में वहाँ से साग-सब्जी, फल और अनाज विजयनगर के लिए आता। महाराज कृष्णदेव राय के पूर्वजों के समय से ही यह विनिमय-परम्परागत चल रही थी। महाराज कृष्णदेव राय के समय में सप्तद्वीप नवखंड लोक-समर्थित महाराज थे विचित्र भानु! महाराज विचित्र भानु में ऐश्वर्य की लिप्सा अधिक थी। उन्होंने अपने राज्य की सीमाओं को सुरक्षित करने के लिए सैन्य-दल का गठन किया। उनसे पूर्व जिस किसी का शासन सप्तद्वीप नवखंड राज्य पर हुआ, उसने राज्य के व्यापारिक सम्बन्धों को सुदृढ़ बनाने का ही काम किया था। किसी भी राज्य से आनेवाले यात्रियों को राज्य में प्रवेश की खुली सुविधा थी। विचित्र भानु ने शासन सँभालते ही कई तरह की निषेधाज्ञा जारी की। उसके सत्ता में आते ही राज्य में प्रवेश करनेवाले व्यापारियों से वाणिज्यिक शुल्क की वसूली अनिवार्य कर दी गई। ‘सप्तद्वीप नवखंड’ में वाणिज्यिक प्रवेश पर शुल्क लगाए जाने के परिणामस्वरूप कई पड़ोसी राज्यों से उसके राजनयिक- सम्बन्ध सामान्य नहीं रह गए। महाराज विचित्र भानु की धन-लिप्सा बढ़ती गई। उसने अपनी प्रजा से भी विभिन्न मदों में शुल्क लेने का चलन आरम्भ किया।

महाराज विचित्र भानु के इन कदमों से ‘सप्तद्वीप नवखंड’ की प्रजा में क्षोभ उत्पन्न होने लगा। प्रजा की प्रतिक्रिया से बेपरवाह महाराज विचित्रा भानु अपनी ही गति से बढ़ रहा था। उसने अपने सैन्य बल की स्थापना के बाद एक गुप्तचर संगठन की आवश्यकता भी महसूस की और शीघ्र ही उसके राज्य में पहली बार ‘गुप्तचर संगठन’ की संरचना तैयार हो गई। उसका दर्प बढ़ रहा था। वह गुप्तचर संगठन से मिलनेवाली सूचनाओं के आधार पर अपनी नीतियाँ निर्धारित करने लगा। ‘सप्तद्वीप नवखंड’ में पहली बार ऐसा हुआ जब राजा और प्रजा के बीच सीधे संवाद की राह बन्द हो गई। पहले सप्तद्वीप नवखंड का राजा किसी भी कार्य के आरम्भ से पहले प्रजा की राय लेना आवश्यक समझता था। विचित्र भानु के शासनकाल में प्रजा-राजा संवाद की परिपाटी का पटापेक्ष हो गया।

अपनी ही धुन में मग्न महाराज विचित्र भानु अब अपने सैन्य बल और गुप्तचर संगठन के बूते स्वेच्छाचारी होने लगा। वह जहाँ कहीं भी जाता उसके आसपास चुनिन्दा लड़ाकों का सशस्त्र दस्ता उसकी सुरक्षा के लिए तैनात रहता। ‘सप्तद्वीप नवखंड’ की प्रजा पर अत्याचार बढ़ने लगा। शुल्क वसूली के कारण राज्य में राजस्व की वृद्धि अवश्य हो रही थी