भारतकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

पृष्ठ 102, कुल 404 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 102

८८ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे सा प्रमाणान्तरकृता तत्राप्येवं विचिन्त्यताम् । इत्येवमनवस्थानात् न किञ्चित् प्रमितं भवेत् ॥ ५३ ॥ अतः प्रमाता प्रमितं प्रमाणं वा न सिध्यति । तस्माच्छून्याश्रयो ह्येष विकल्पो विविधः स्थितः ॥ ५४ ॥ सोऽपि शून्यात्मतां प्राप्तः प्रमाणाविषयत्वतः । तस्माच्छून्यं न किञ्चित् स्यादित्येष प्रविनिर्णयः ॥ ५५ ॥ इति शुङ्गवचः श्रुत्वा तेषु केचिद् द्विजाधमाः । तं श्रिता निश्चयाभासं बभूवुः शून्यवादिनः ॥ ५६ ॥ विनाशमीयुस्तन्निष्ठाः शून्यभावं परं गताः । ये द्विजाः सारहृदयास्ते शुङ्गस्य प्रभाषितम् ॥ ५७ ॥ निरूप्य कौशिके तेन समाहितहृदोऽभवन् । तस्मात् मर्वात्मना त्यक्त्वा तर्कं तमनवस्थितम् ॥ ५८ ॥ और उस निर्दोषताका निश्चय होगा अन्य प्रमाणोंसे । फिर उन प्रमाणोंकी निर्दोषताके विषयमें भी इसी प्रकार विचार करना होगा । इस तरह अनवस्थाका प्रसंग उपस्थित होनेके कारण कुछ भी सिद्ध नहीं हो सकेगा ॥ ५३ ॥ अतः प्रमाता, प्रमेय और प्रमाण सिद्ध ही नहीं हो सकते । इसलिये यह जो अनेक प्रकारका आभास प्रतीत हो रहा है उसका आश्रय केवल शून्य ही है ॥ ५४ ॥ वह शून्य भी प्रमाणका विषय न होने के कारण शून्यरूप ( अभाव- मात्र ) ही है । अतः अन्तिम निर्णय यही है कि यह शून्य भी कुछ नहीं है” ॥ ५५ ॥ शुङ्गके ये वचन सुनकर उनमेंसे कुछ अधम ब्राह्मण उसीके इस आभासमात्र निर्णयको मानकर शून्यवादी हो गये । शून्यमें निष्ठा होनेके कारण वे स्वयं भी अत्यन्त शून्यभाव ( जडता ) को प्राप्त होकर नष्ट ही हो गये [ अपने वास्तविक स्वरूपकी प्राप्ति उन्हें नहीं हुई ] ॥ ५६-५७ पू० ॥ किन्तु जो शिष्य विचारशील थे उन्होंने शुङ्गका कथन कौशिक मुनिके आगे निवेदन किया और उनसे उन्हें उसका समाधान मिल गया ॥ ५७ उ०-५८ पू० ॥