भारतकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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त एकदा गुरुमनुगता लोकस्य संस्थितिम् । निर्णेतुं बुद्धयनुगुणं तदा प्रोचुः परस्परम् ॥ ४७ ॥ तत्राजगाम शृङ्गाख्यो विप्रः कश्चिन्महाबुधः । स सर्वेषां मतं प्रोक्तं दूषयद् बुद्धिकौशलात् ॥ ४८ ॥ अश्रद्धया हतप्रज्ञो विवादनिपुणस्तदा । प्रमाणात् प्रमितं सत्यमित्युक्तेषु द्विजेष्वथ ॥ ४९ ॥ अनवस्थिततर्को वै प्राह तर्कैकसंश्रयः । शृङ्गाख्य आक्षिपन् सर्वान् तत्र वादकथान्तरे ॥ ५० ॥ विप्राः शृणुध्वं मद्वाक्यं सत्यं न क्वापि सिध्यति । प्रमितं यत् प्रमाणेन तत् सत्यमिति हीरितम् ॥ ५१ ॥ तत्र तेन दोषयुजा भवेदप्रमितं ननु । निश्चेतव्या ततस्त्वादौ प्रमाणानामदुष्टता ॥ ५२ ॥

एक दिन गुरुदेवकी अनुपस्थितिमें वे शिष्यगण संसारके स्व- रूपका निर्णय करनेके लिये आपसमें मिलकर अपनी-अपनी बुद्धिके अनुसार प्रतिपादन करने लगे ॥ ४७ ॥ इतने हीमें वहाँ शृङ्ग नामका एक बुद्धिमान् ब्राह्मण आया । उसने अपने बुद्धिकौशलसे उनके कहे हुए सभी मतोंको सदोष सिद्ध कर दिया ॥ ४८ ॥ शास्त्रोंपर श्रद्धा न होनेके कारण उसकी बुद्धि (विवेकशक्ति) नष्ट हो चुकी थी। तथापि विवाद (शुष्क तर्क) करनेमें वह बहुत कुशल था। जब शिष्योंने कहा कि जो बात प्रमाणसे सिद्ध हो वही सत्य है तो उस विचारगोष्ठीमें वह शुष्क तर्क करनेवाला शृङ्ग केवल तर्कका आश्रय लेकर बोला—॥ ४९-५० ॥ "ब्राह्मणो ! मेरी बात सुनो । आप लोगोंने कहा कि जो प्रमाणसे सिद्ध हो वह सत्य है । सो इस प्रकार तो सत्य कभी सिद्ध ही नहीं हो सकता ॥ ५१ ॥ क्योंकि यदि प्रमाण दोषयुक्त होगा तो उसके द्वारा होनेवाला निर्णय अप्रामाणिक होगा। इसलिये सबसे पहले तो प्रमाणोंकी निर्दोषताका निर्णय करना चाहिये ॥ ५२ ॥