त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८६ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे प्रमाणाल्लक्षणज्ञानमिति चेत्तत्र संशृणु । अश्रद्धस्य प्रमाणं किं भवेत्तत् सुनिरूप्यताम् ॥ ४१ ॥ अन्यथा हि प्रमाता नोऽविसंवाद्येत कुत्रचित् । तस्माच्छ्रद्धां समाश्रित्य लोकः सर्वः प्रवर्त्तते ॥ ४२ ॥ तत्प्रकारं प्रवक्ष्यामि शृणु निश्चलचेतसा । अनवस्थिततर्को वा ह्यतर्को वापि सर्वथा ॥ ४३ ॥ श्रेयो न प्राप्नुयाल्लोक इह वापि परत्र वा । तत्रातर्कस्य कालेन भवेच्छ्रेयः कदांचन ॥ ४४ ॥ अनवस्थिततर्कस्य न श्रेयः स्यात् कथञ्चन । पुरा सह्यगिरौ गोदावरीतीरे हि कौशिकः ॥ ४५ ॥ न्यवसच्छान्तसुमतिर्ज्ञातलोकः सतत्त्वकः । तस्य शिष्यास्तु शतशः स्थिता गुरुसमाश्रयात् ॥ ४६ ॥ यदि कहें कि लक्षणोंका ज्ञान [ शास्त्रवचन आदि ] प्रमाणसे हो सकता है, तो सुनिये। जिसे श्रद्धा है ही नहीं उसके लिये प्रमाण क्या हो सकता है—यह बताइये ॥ ४१ ॥ [ यदि आगमको ही विश्वसनीय प्रमाण न माना जाय, दूसरोंके कथनको भी प्रमाणरूप मान लें ] तबतो प्रमाताका कोई भी बात अवि- श्वसनीय नहीं जान पड़ेगी। अतः सब लोग श्रद्धाका आश्रय लेकर ही चल रहे हैं ॥ ४२ ॥ मैं आपको श्रेयःप्राप्तिका प्रकार समझाती हूँ, स्थिरचित्त होकर सुनिये। जो पुरुष शुष्क तर्क करता है और जो बिलकुल तर्क नहीं करता उसका इस लोक या परलोकमें कल्याण नहीं हो सकता ॥४३-४४ पू० ॥ उनमेंसे भी तर्क न करनेवालेका तो कभी कल्याण हो भी सकता है, परन्तु शुष्क तर्क करनेवालेका तो किसी प्रकार कल्याण होना सम्भव नहीं है ॥ ४४ उ०-४५ पू० ॥ पूर्वकालमें सह्यपर्वतकी ओर गोदावरीके तीरपर कौशिक मुनि रहते थे। वे बड़े शान्त, सुमति और संसारके रहस्य ( वास्तविक स्वरूप ) को जाननेवाले थे। अपने गुरुदेवका आश्रय पाकर उनके सैकड़ों शिष्य भी वहीं रहते थे ॥ ४५ उ०-४६ ॥