त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंषष्ठोऽध्यायः। ८५ बहिः समे सुपिष्टेन मीनानां नाशमाप्नुयात् । तस्मात् सत्स्वेव कर्त्तव्या श्रद्धा नासत्सु कुत्रचित् ॥ ३५ ॥ असत्सु कृत्वा श्रद्धां ये नाशमीयुः परेऽपि च । सत्सु श्रेयोयुजः श्रद्धावशतस्ते निदर्शनम् ॥ ३६ ॥ अतः प्रतीत्यैव युक्ता कर्तुं श्रद्धा न चान्यथा । तत् कथं ते प्रवृत्तिः स्यादिति प्रश्नः कथं तव ॥ ३७ ॥ इत्युक्ता हेमलेखा सा पुनराह पतिं प्रियम् । शृणु राजकुमारेदं प्रोच्यमानं मया वचः ॥ ३८ ॥ यदात्थ त्वं कथं प्रश्न इति तत्र ब्रवीमि ते । अथ सन् वा ह्यसन् वायमिति ते निश्चयः कुतः ॥ ३९ ॥ सत्यस्मिन् निश्चये भूयाच्छुभं सच्छ्रद्धयेह वै । सोऽपि लक्षणतः स्याच्चेच्छ्रद्धा लक्षणसङ्गता ॥ ४० ॥ (बंसी) पर विश्वास करनेवाली मछलियोंके समान नष्ट होनेका प्रसंग उपस्थित होगा। अतः सत्पुरुषोंपर ही श्रद्धा करे, किन्हीं भी असत्पुरुषोंपर नहीं ॥ ३४-३५ ॥ यह बात, असत्पुरुषोंपर श्रद्धा करनेसे जो नाशको प्राप्त हुए हैं और सत्पुरुषोंपर श्रद्धा करनेसे जो कल्याणके भागी हुए हैं, उन्हें सूचित करनेके लिये दृष्टान्तरूप है ॥ ३६ ॥ इसलिये पहले परखकर ही श्रद्धा करनी उचित है, अन्यथा नहीं। ऐसी स्थितिमें 'श्रद्धा किये बिना तुम्हारा व्यवहार कैसे हो सकता है' तुम्हारा यह प्रश्न कैसे सम्भव है ?" ॥ ३७ ॥ इस तरह पूछे जानेपर हेमलेखाने अपने प्रिय पतिसे पुनः कहा, “राजकुमार ! मैं जो बात कहती हूं वह सुनिये ॥ ३८ ॥ आपने जो कहा कि तुम्हारा प्रश्न कैसे हो सकता है, उसमें मेरा कथन यह है कि आप यह निश्चय कैसे करते हैं कि अमुक पुरुष अच्छा है या बुरा ॥ ३९ ॥ यह निश्चय हो जानेपर ही इस बातका निर्णय हो सकेगा कि सत्पुरुषमें श्रद्धा करनेसे ही हित हो सकता है। यदि कहें कि इसका निश्चय लक्षणोंसे होता है तब तो श्रद्धा लक्षणोंके अधीन हुई । [ अब यह प्रश्न होता है कि लक्षणोंका ज्ञान कैसे हो ? ] ॥ ४० ॥