त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
पृष्ठ 98, कुल 404 में से
संदर्भ में पढ़ें८४ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे तत्राप्येकान्तशरणः श्रद्धाशरण एव हि ॥ २९ ॥ तस्माच्छ्रद्धामृते लोकोऽवसीदेद्ध्वसन् ध्रुवम् । तस्माच्छ्रद्धां दृढां प्राप्य सुखमात्यन्तिकं व्रज ॥ ३० ॥ श्रद्धाऽवरे न कार्येति मन्यसे यदि तच्छृणु । इयञ्च श्रद्धयैवास्ते प्रवृत्तिर्नृपतेः सुत ॥ ३१ ॥ तत् कथं ते प्रवृत्तिः स्यादिति श्रुत्वा प्रियावचः । हेमचूडः प्राह पुनः प्रियां कुशलभाषिणीम् ॥ ३२ ॥ नूनं प्रिये सर्वथैव श्रद्धातव्यं यदा भवेत् । श्रद्धा सत्सु विधातव्या यथा श्रेयः समाप्नुयात् ॥ ३३ ॥ असत्सु नो विधातव्या श्रद्धा श्रेयोऽभिवाञ्छिना । अन्यथान्तः सुनिशिते कुटिले वडिशे यथा ॥ ३४ ॥ परिस्थितिमें परिणाम भी समान ही होगा—यह भी श्रद्धा या विश्वास ही है ।] वहाँ भी व्याप्तिग्रहणका आश्रय लेना तो श्रद्धाका आश्रय लेना ही है ॥ २९ ॥ अतः यह निश्चय है कि श्रद्धाके बिना तो श्वास लेते भी नहीं बनेगा और लोक नष्ट हो जायगा। इसलिये आप सुदृढ़ श्रद्धा सम्पादन करके आत्यन्तिक सुख प्राप्त करें ॥ ३० ॥ यदि आप सोचते हों कि [ स्त्री-मूर्ख आदि ] निकृष्ट व्यक्तियोंमें तो विश्वास नहीं करना चाहिये, तो राजकुमार ! सुनिये, आपकी ऐसी प्रवृत्ति भी तो विश्वासके आधारपर ही होती है। नहीं तो आपको ऐसा विचार भी कैसे हो सकता था।" अपनी प्रियाका ऐसा भाषण सुनकर हेमचूडने उस हितकर भाषण करनेवाली प्रियतमासे पुनः कहा ॥ ३१-३२ ॥ “प्रिये ! [ तुम्हारे कथनानुसार ] यदि श्रद्धा करना सर्वथा अनिवार्य ही हो तो भी सत्पुरुषोंमें ही श्रद्धा करनी चाहिये, जिससे कि श्रेयकी प्राप्ति हो ॥ ३३ ॥ जिसे श्रेयकी इच्छा हो उसे असत्पुरुषोंमें विश्वास नहीं करना चाहिये, नहीं तो बाहरसे सरल और भीतरसे टेढ़ी एवं तीक्ष्ण वडिश