त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंषष्ठोऽध्यायः। ८३ आप्तेष्वश्रद्दधत् मूढं जहाति श्रीः सुखं यशः। स भवेत् सर्वतो हीनो यः श्रद्धारहितो नरः ॥ २४ ॥ श्रद्धा हि जगतां धात्री श्रद्धा सर्वस्य जीवनम् । अश्रद्धो मातृविषये बालो जीवेत् कथं वद ॥ २५ ॥ अश्रद्दधस्तरुणः पत्न्यां कथं स सुखमेधते । तथापत्येषु स्थविरः कथमीयात् सतीं गतिम् ॥ २६ ॥ अश्रद्धो वा भुवं कस्माद् विकर्षेत् कर्षकः किल । न प्रवृत्तिर्भवेत् क्वापि त्यागे वा सङ्ग्रहेऽपि वा ॥ २७ ॥ श्रद्धावैधुर्ययोगेन विनश्येज्जगतां स्थितिः। एकान्तग्रहणाल्लोकप्रवृत्तिरिति चेच्छृणु ॥ २८ ॥ एकान्तग्रहणे वापि श्रद्धा कस्मात् प्रतिष्ठिता । जो मूर्ख आप्तपुरुषोंमें श्रद्धा नहीं करता उसे श्री, सुख और यश त्याग देते हैं। जो पुरुष श्रद्धाहीन है वह सभी तरहसे हीन हो जाता है ॥ २४ ॥ श्रद्धा सम्पूर्ण संसारको धारण (पालन) करनेवाली है, श्रद्धा ही सबका जीवन है। बताइये, यदि मातापर विश्वास न हो तो बालक कैसे जीवित रहे ॥ २५ ॥ यदि युवा पुरुष अपनी पत्नीमें विश्वास न करें तो उसे सुख कैसे मिल सकता है और यदि वृद्धका बालकोंमें विश्वास न हो तो वह भी कैसे चैनसे रह सकता है ॥ २६ ॥ किसानको यदि [ आगामी धान्यप्राप्तिमें ] विश्वास न हो तो वह भूमिको कैसे जोतेगा ? विश्वास न होनेपर तो त्याग या संग्रह किसीमें भी प्रवृत्ति नहीं हो सकती ॥ २७ ॥ श्रद्धा या विश्वासका अभाव हो जानेपर तो जगत्की स्थिति ही नष्ट हो जायगी। यदि कहो कि संसारका व्यवहार तो व्याप्तिग्रहणसे होता है, तो सुनो ॥ २८ ॥ व्याप्तिग्रहणमें भी भला, क्यों विश्वास होता है [ क्योंकि समान १. जो बात एक परिस्थितिमें प्रत्यक्ष देखी जाती है, वैसी ही परिस्थिति आने पर वह उसी प्रकार होगी—इसका नाम ‘व्याप्तिग्रहण’ है।