भारतकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

पृष्ठ 96, कुल 404 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 96

८२ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे अप्यसत्यं मयोक्तं यत्तद्विमर्शय सद्धिया । लोके हि कुशलो मर्त्यः सर्वव्यवहृतौ ननु ॥ १८ ॥ परीक्ष्यैकांशतः सर्वमभिजानाति संस्थितिम् । निदर्शनं प्रदास्यामि तुभ्यमत्र समीक्ष्य ॥ १९ ॥ यः पुरा विषयः सर्वो बभूवाभीष्टसाधनम् । चिरान्मद्वचनात् सोऽद्य कुतो न सुखसाधनम् ॥ २० ॥ स एवाद्य साधयति सुखमन्येषु वै कुतः । एतन्निदर्शनेनैव स्वमतं वेत्तुमर्हसि ॥ २१ ॥ शृणु राजन् यदि वरं ऋज्व्या निर्मलया धिया । अनाश्वासो रिपुलोको भवेदाप्तोक्तिषु स्थिरः ॥ २२ ॥ श्रद्धा माता प्रपन्नं स वत्सलेव सुतं सदा । रक्षति प्रौढभीतिभ्यः सर्वथा नहि संशयः ॥ २३ ॥ यदि मेरी कही हुई बात झूठी भी हो तो भी आप अपनी सूक्ष्म बुद्धिसे इसपर विचार करें । लोकमें मनुष्य तो सभी प्रकारके व्यवहारमें कुशल होता है ॥ १८ ॥ वह केवल एक अंशकी ही परीक्षा करके सारी परिस्थितिको जान लेता है। विचार करनेके लिये आपको मैं एक अनुभवका स्मरण कराती हूँ ॥ १९ ॥ पहले चिरकालसे जो विषय आपके लिये सुखके साधन बने हुए थे, मेरी बातें सुनकर अब वे क्यों सुखदायक नहीं रहे ? ॥ २० ॥ वे ही इस समय भी दूसरोंको सुख क्यों देते हैं ? इतने अनुभवसे ही आप मेरे कथनके विषयमें अपना निर्णय समझ सकते हैं ॥ २१ ॥ राजन् ! जो श्रेष्ठ बचन है उसे सरल भावसे सुनिये । विश्वसनीय पुरुषोंके वचनोंमें विश्वास न करना—यह अपना पक्का शत्रु ही है॥ २२ ॥ श्रद्धा साक्षात् माता है। जो उसकी शरण लेता है वह स्नेहमयी अपने बच्चेकी तरह सर्वदा उसकी बड़ीसे बड़ी आपत्तियोंसे रक्षा करती है—इसमें सन्देह नहीं ॥ २३ ॥