त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंषष्ठोऽध्यायः । ८१ तथा तव वचो मन्ये सर्वथाऽसङ्गतं ननु । श्रुत्वैवं प्रियवाक्यं सा चतुरा प्राह तं पुनः ॥ १२ ॥ नाथ प्रोक्तं मया यत्ते तत् कथं स्यादपार्थकम् । न मादृशानां वचनं निरालम्बं क्वचिद्भवेत् ॥ १३ ॥ मृषा हि तपसां हन्त्री सत्यशीलेषु सा कुतः । तपस्विनां कुले कस्माच्छ्वित्रे सौन्दर्यवद्भवेत् ॥ १४ ॥ यो योजयति जिज्ञासुमन्यार्थेन ह्यसत्यतः । तस्य नोर्ध्वं न चाधस्ताल्लोकेऽस्ति सुखसाधनम् ॥ १५ ॥ शृणु राजसुतोक्तिं मे लोके तैमिरिकः क्वचित् । समदृष्टिं नैति शीघ्रमञ्जनानां वचोगणैः ॥ १६ ॥ असत्यमेव जानाति हितप्रोक्तं च मूढधीः । तत्त्वां प्रियाहं जिज्ञासुमसतैर्योजयामि किम् ॥ १७ ॥ मैं तो तुम्हारे कथनको इसी प्रकार सर्वथा असंगत मानता हूँ।" प्रियतमकी यह बात सुनकर उस चतुर नारीने उससे पुनः कहा ॥ १२ ॥ "नाथ ! मैंने आपसे जो कुछ कहा है वह असंगत कैसे हो सकता है। मुझ-जैसों का भाषण निराधार कभी नहीं हो सकता ॥ १३ ॥ मिथ्या भाषण तो तपस्याको नष्ट करनेवाला है। तपस्वियोंके कुलमें उत्पन्न हुए सत्यनिष्ठ व्यक्तियोंमें वह कोढ़में सुन्दरताके समान कैसे रह सकता है ? ॥ १४ ॥ जो पुरुष असत्य बोलकर किसी जिज्ञासुको दूसरे विषयोंमें लगा देता है उसे ऊपर और नीचेके किसी लोकमें सुखकी उपलब्धि नहीं होती ॥ १५ ॥ राजकुमार ! मेरी बातपर ध्यान दो। देखो, लोकमें जिसे तिमिर रोग हो गया हो उसे अञ्जनवाचक शब्दोंको उच्चारण करनेसे ही शुद्ध दृष्टि नहीं मिल जाती ॥ १६ ॥ मूढबुद्धि पुरुष तो हितकी बातोंको भी असत्य ही समझते हैं। भला, आपकी प्रिया होकर भी आप जिज्ञासुको मैं असत्यके साथ कैसे जोड़ सकती हूँ ॥ १७ ॥ ६ त्रि० ज्ञा०