भारतकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

पृष्ठ 94, कुल 404 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 94

८० त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे पुराणि तानि वा कुत्र संस्थितानि तदीरय । अस्तु किं तेन वृत्तेन वद मे क्व च सा सखी ॥ ६ ॥ सखीं न प्राप्तवान् मातुरहं तत् प्रतिचारय । आर्यास्ति मेऽवरोधे स्वे पितुर्मेऽन्या नहि प्रिया ॥ ७ ॥ सा वा सखी मे कुत्रास्ते तत्पुत्रो वा वद द्रुतम् । मन्येऽहं ते वचो लोके वन्ध्यापुत्रसमाश्रयम् ॥ ८ ॥ यथाह कश्चिन्नटीको विदूषकवचोविधौ । वन्ध्यापुत्रः समारूढः प्रतिबिम्बमहारथम् ॥ ९ ॥ शुक्त्यारोपितहैरण्यभूषणैर्भूषिताङ्गकः । आयुधैर्नरशृङ्गोत्थैर्युद्ध्वा गगनकानने ॥ १० ॥ हत्वा भविष्यद्राजानं जित्वा गन्धर्वपत्तनम् । मरीचिस्रोतसि स्वाप्नकामिनीभिर्हि खेलति ॥ ११ ॥ यह भी बताओ, वे नगर कहाँ हैं। अथवा और सब बातें रहने दो, मुझे केवल इतना बता दो वह सखी कहाँ है ॥ ६ ॥ माताजीसे मुझे तो कोई सखी नहीं मिली। मेरी माताजी अपने महलमें हैं, तुम उनसे पूछ लो। उनसे भिन्न मेरे पिताजीकी कोई और स्त्री नहीं है ॥ ७ ॥ इसलिये शीघ्र ही बताओ मेरी वह सखी तथा उसका पुत्र कहाँ हैं ! मुझे तो तुम्हारी बात लोकमें वन्ध्यापुत्रके समान अलीक जान पड़ती है ॥ ८ ॥ [ तुम्हारा कथन ऐसा ही है ] जैसे विदूषककी भूमिकाका अभिनय करते समय कोई नाटकका पात्र कहे—"एक वन्ध्यापुत्र प्रतिबिम्बके महान् रथपर चढ़ा हुआ है ! ९ ॥ उसने सीपीमें आरोपित सुवर्णके आभूषणोंसे अपने सब अंग सजाये हुए हैं। मनुष्यके सींगोंसे बने हुए शस्त्रोंसे आकाशमें प्रतीत होनेवाले वनमें युद्ध करके उसने एक भावी राजाका वध किया और गन्धर्वनगरको जीतकर मरुमरीचिकाके स्रोतमें स्वप्नकी स्त्रियोंके साथ क्रीडा कर रहा है ॥ १०-११ ॥