त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
८० त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे पुराणि तानि वा कुत्र संस्थितानि तदीरय । अस्तु किं तेन वृत्तेन वद मे क्व च सा सखी ॥ ६ ॥ सखीं न प्राप्तवान् मातुरहं तत् प्रतिचारय । आर्यास्ति मेऽवरोधे स्वे पितुर्मेऽन्या नहि प्रिया ॥ ७ ॥ सा वा सखी मे कुत्रास्ते तत्पुत्रो वा वद द्रुतम् । मन्येऽहं ते वचो लोके वन्ध्यापुत्रसमाश्रयम् ॥ ८ ॥ यथाह कश्चिन्नटीको विदूषकवचोविधौ । वन्ध्यापुत्रः समारूढः प्रतिबिम्बमहारथम् ॥ ९ ॥ शुक्त्यारोपितहैरण्यभूषणैर्भूषिताङ्गकः । आयुधैर्नरशृङ्गोत्थैर्युद्ध्वा गगनकानने ॥ १० ॥ हत्वा भविष्यद्राजानं जित्वा गन्धर्वपत्तनम् । मरीचिस्रोतसि स्वाप्नकामिनीभिर्हि खेलति ॥ ११ ॥ यह भी बताओ, वे नगर कहाँ हैं। अथवा और सब बातें रहने दो, मुझे केवल इतना बता दो वह सखी कहाँ है ॥ ६ ॥ माताजीसे मुझे तो कोई सखी नहीं मिली। मेरी माताजी अपने महलमें हैं, तुम उनसे पूछ लो। उनसे भिन्न मेरे पिताजीकी कोई और स्त्री नहीं है ॥ ७ ॥ इसलिये शीघ्र ही बताओ मेरी वह सखी तथा उसका पुत्र कहाँ हैं ! मुझे तो तुम्हारी बात लोकमें वन्ध्यापुत्रके समान अलीक जान पड़ती है ॥ ८ ॥ [ तुम्हारा कथन ऐसा ही है ] जैसे विदूषककी भूमिकाका अभिनय करते समय कोई नाटकका पात्र कहे—"एक वन्ध्यापुत्र प्रतिबिम्बके महान् रथपर चढ़ा हुआ है ! ९ ॥ उसने सीपीमें आरोपित सुवर्णके आभूषणोंसे अपने सब अंग सजाये हुए हैं। मनुष्यके सींगोंसे बने हुए शस्त्रोंसे आकाशमें प्रतीत होनेवाले वनमें युद्ध करके उसने एक भावी राजाका वध किया और गन्धर्वनगरको जीतकर मरुमरीचिकाके स्रोतमें स्वप्नकी स्त्रियोंके साथ क्रीडा कर रहा है ॥ १०-११ ॥
षष्ठोऽध्यायः । ८१ तथा तव वचो मन्ये सर्वथाऽसङ्गतं ननु । श्रुत्वैवं प्रियवाक्यं सा चतुरा प्राह तं पुनः ॥ १२ ॥ नाथ प्रोक्तं मया यत्ते तत् कथं स्यादपार्थकम् । न मादृशानां वचनं निरालम्बं क्वचिद्भवेत् ॥ १३ ॥ मृषा हि तपसां हन्त्री सत्यशीलेषु सा कुतः । तपस्विनां कुले कस्माच्छ्वित्रे सौन्दर्यवद्भवेत् ॥ १४ ॥ यो योजयति जिज्ञासुमन्यार्थेन ह्यसत्यतः । तस्य नोर्ध्वं न चाधस्ताल्लोकेऽस्ति सुखसाधनम् ॥ १५ ॥ शृणु राजसुतोक्तिं मे लोके तैमिरिकः क्वचित् । समदृष्टिं नैति शीघ्रमञ्जनानां वचोगणैः ॥ १६ ॥ असत्यमेव जानाति हितप्रोक्तं च मूढधीः । तत्त्वां प्रियाहं जिज्ञासुमसतैर्योजयामि किम् ॥ १७ ॥ मैं तो तुम्हारे कथनको इसी प्रकार सर्वथा असंगत मानता हूँ।" प्रियतमकी यह बात सुनकर उस चतुर नारीने उससे पुनः कहा ॥ १२ ॥ "नाथ ! मैंने आपसे जो कुछ कहा है वह असंगत कैसे हो सकता है। मुझ-जैसों का भाषण निराधार कभी नहीं हो सकता ॥ १३ ॥ मिथ्या भाषण तो तपस्याको नष्ट करनेवाला है। तपस्वियोंके कुलमें उत्पन्न हुए सत्यनिष्ठ व्यक्तियोंमें वह कोढ़में सुन्दरताके समान कैसे रह सकता है ? ॥ १४ ॥ जो पुरुष असत्य बोलकर किसी जिज्ञासुको दूसरे विषयोंमें लगा देता है उसे ऊपर और नीचेके किसी लोकमें सुखकी उपलब्धि नहीं होती ॥ १५ ॥ राजकुमार ! मेरी बातपर ध्यान दो। देखो, लोकमें जिसे तिमिर रोग हो गया हो उसे अञ्जनवाचक शब्दोंको उच्चारण करनेसे ही शुद्ध दृष्टि नहीं मिल जाती ॥ १६ ॥ मूढबुद्धि पुरुष तो हितकी बातोंको भी असत्य ही समझते हैं। भला, आपकी प्रिया होकर भी आप जिज्ञासुको मैं असत्यके साथ कैसे जोड़ सकती हूँ ॥ १७ ॥ ६ त्रि० ज्ञा०
८२ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे अप्यसत्यं मयोक्तं यत्तद्विमर्शय सद्धिया । लोके हि कुशलो मर्त्यः सर्वव्यवहृतौ ननु ॥ १८ ॥ परीक्ष्यैकांशतः सर्वमभिजानाति संस्थितिम् । निदर्शनं प्रदास्यामि तुभ्यमत्र समीक्ष्य ॥ १९ ॥ यः पुरा विषयः सर्वो बभूवाभीष्टसाधनम् । चिरान्मद्वचनात् सोऽद्य कुतो न सुखसाधनम् ॥ २० ॥ स एवाद्य साधयति सुखमन्येषु वै कुतः । एतन्निदर्शनेनैव स्वमतं वेत्तुमर्हसि ॥ २१ ॥ शृणु राजन् यदि वरं ऋज्व्या निर्मलया धिया । अनाश्वासो रिपुलोको भवेदाप्तोक्तिषु स्थिरः ॥ २२ ॥ श्रद्धा माता प्रपन्नं स वत्सलेव सुतं सदा । रक्षति प्रौढभीतिभ्यः सर्वथा नहि संशयः ॥ २३ ॥ यदि मेरी कही हुई बात झूठी भी हो तो भी आप अपनी सूक्ष्म बुद्धिसे इसपर विचार करें । लोकमें मनुष्य तो सभी प्रकारके व्यवहारमें कुशल होता है ॥ १८ ॥ वह केवल एक अंशकी ही परीक्षा करके सारी परिस्थितिको जान लेता है। विचार करनेके लिये आपको मैं एक अनुभवका स्मरण कराती हूँ ॥ १९ ॥ पहले चिरकालसे जो विषय आपके लिये सुखके साधन बने हुए थे, मेरी बातें सुनकर अब वे क्यों सुखदायक नहीं रहे ? ॥ २० ॥ वे ही इस समय भी दूसरोंको सुख क्यों देते हैं ? इतने अनुभवसे ही आप मेरे कथनके विषयमें अपना निर्णय समझ सकते हैं ॥ २१ ॥ राजन् ! जो श्रेष्ठ बचन है उसे सरल भावसे सुनिये । विश्वसनीय पुरुषोंके वचनोंमें विश्वास न करना—यह अपना पक्का शत्रु ही है॥ २२ ॥ श्रद्धा साक्षात् माता है। जो उसकी शरण लेता है वह स्नेहमयी अपने बच्चेकी तरह सर्वदा उसकी बड़ीसे बड़ी आपत्तियोंसे रक्षा करती है—इसमें सन्देह नहीं ॥ २३ ॥
षष्ठोऽध्यायः। ८३ आप्तेष्वश्रद्दधत् मूढं जहाति श्रीः सुखं यशः। स भवेत् सर्वतो हीनो यः श्रद्धारहितो नरः ॥ २४ ॥ श्रद्धा हि जगतां धात्री श्रद्धा सर्वस्य जीवनम् । अश्रद्धो मातृविषये बालो जीवेत् कथं वद ॥ २५ ॥ अश्रद्दधस्तरुणः पत्न्यां कथं स सुखमेधते । तथापत्येषु स्थविरः कथमीयात् सतीं गतिम् ॥ २६ ॥ अश्रद्धो वा भुवं कस्माद् विकर्षेत् कर्षकः किल । न प्रवृत्तिर्भवेत् क्वापि त्यागे वा सङ्ग्रहेऽपि वा ॥ २७ ॥ श्रद्धावैधुर्ययोगेन विनश्येज्जगतां स्थितिः। एकान्तग्रहणाल्लोकप्रवृत्तिरिति चेच्छृणु ॥ २८ ॥ एकान्तग्रहणे वापि श्रद्धा कस्मात् प्रतिष्ठिता । जो मूर्ख आप्तपुरुषोंमें श्रद्धा नहीं करता उसे श्री, सुख और यश त्याग देते हैं। जो पुरुष श्रद्धाहीन है वह सभी तरहसे हीन हो जाता है ॥ २४ ॥ श्रद्धा सम्पूर्ण संसारको धारण (पालन) करनेवाली है, श्रद्धा ही सबका जीवन है। बताइये, यदि मातापर विश्वास न हो तो बालक कैसे जीवित रहे ॥ २५ ॥ यदि युवा पुरुष अपनी पत्नीमें विश्वास न करें तो उसे सुख कैसे मिल सकता है और यदि वृद्धका बालकोंमें विश्वास न हो तो वह भी कैसे चैनसे रह सकता है ॥ २६ ॥ किसानको यदि [ आगामी धान्यप्राप्तिमें ] विश्वास न हो तो वह भूमिको कैसे जोतेगा ? विश्वास न होनेपर तो त्याग या संग्रह किसीमें भी प्रवृत्ति नहीं हो सकती ॥ २७ ॥ श्रद्धा या विश्वासका अभाव हो जानेपर तो जगत्की स्थिति ही नष्ट हो जायगी। यदि कहो कि संसारका व्यवहार तो व्याप्तिग्रहणसे होता है, तो सुनो ॥ २८ ॥ व्याप्तिग्रहणमें भी भला, क्यों विश्वास होता है [ क्योंकि समान १. जो बात एक परिस्थितिमें प्रत्यक्ष देखी जाती है, वैसी ही परिस्थिति आने पर वह उसी प्रकार होगी—इसका नाम ‘व्याप्तिग्रहण’ है।
८४ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे तत्राप्येकान्तशरणः श्रद्धाशरण एव हि ॥ २९ ॥ तस्माच्छ्रद्धामृते लोकोऽवसीदेद्ध्वसन् ध्रुवम् । तस्माच्छ्रद्धां दृढां प्राप्य सुखमात्यन्तिकं व्रज ॥ ३० ॥ श्रद्धाऽवरे न कार्येति मन्यसे यदि तच्छृणु । इयञ्च श्रद्धयैवास्ते प्रवृत्तिर्नृपतेः सुत ॥ ३१ ॥ तत् कथं ते प्रवृत्तिः स्यादिति श्रुत्वा प्रियावचः । हेमचूडः प्राह पुनः प्रियां कुशलभाषिणीम् ॥ ३२ ॥ नूनं प्रिये सर्वथैव श्रद्धातव्यं यदा भवेत् । श्रद्धा सत्सु विधातव्या यथा श्रेयः समाप्नुयात् ॥ ३३ ॥ असत्सु नो विधातव्या श्रद्धा श्रेयोऽभिवाञ्छिना । अन्यथान्तः सुनिशिते कुटिले वडिशे यथा ॥ ३४ ॥ परिस्थितिमें परिणाम भी समान ही होगा—यह भी श्रद्धा या विश्वास ही है ।] वहाँ भी व्याप्तिग्रहणका आश्रय लेना तो श्रद्धाका आश्रय लेना ही है ॥ २९ ॥ अतः यह निश्चय है कि श्रद्धाके बिना तो श्वास लेते भी नहीं बनेगा और लोक नष्ट हो जायगा। इसलिये आप सुदृढ़ श्रद्धा सम्पादन करके आत्यन्तिक सुख प्राप्त करें ॥ ३० ॥ यदि आप सोचते हों कि [ स्त्री-मूर्ख आदि ] निकृष्ट व्यक्तियोंमें तो विश्वास नहीं करना चाहिये, तो राजकुमार ! सुनिये, आपकी ऐसी प्रवृत्ति भी तो विश्वासके आधारपर ही होती है। नहीं तो आपको ऐसा विचार भी कैसे हो सकता था।" अपनी प्रियाका ऐसा भाषण सुनकर हेमचूडने उस हितकर भाषण करनेवाली प्रियतमासे पुनः कहा ॥ ३१-३२ ॥ “प्रिये ! [ तुम्हारे कथनानुसार ] यदि श्रद्धा करना सर्वथा अनिवार्य ही हो तो भी सत्पुरुषोंमें ही श्रद्धा करनी चाहिये, जिससे कि श्रेयकी प्राप्ति हो ॥ ३३ ॥ जिसे श्रेयकी इच्छा हो उसे असत्पुरुषोंमें विश्वास नहीं करना चाहिये, नहीं तो बाहरसे सरल और भीतरसे टेढ़ी एवं तीक्ष्ण वडिश
षष्ठोऽध्यायः। ८५ बहिः समे सुपिष्टेन मीनानां नाशमाप्नुयात् । तस्मात् सत्स्वेव कर्त्तव्या श्रद्धा नासत्सु कुत्रचित् ॥ ३५ ॥ असत्सु कृत्वा श्रद्धां ये नाशमीयुः परेऽपि च । सत्सु श्रेयोयुजः श्रद्धावशतस्ते निदर्शनम् ॥ ३६ ॥ अतः प्रतीत्यैव युक्ता कर्तुं श्रद्धा न चान्यथा । तत् कथं ते प्रवृत्तिः स्यादिति प्रश्नः कथं तव ॥ ३७ ॥ इत्युक्ता हेमलेखा सा पुनराह पतिं प्रियम् । शृणु राजकुमारेदं प्रोच्यमानं मया वचः ॥ ३८ ॥ यदात्थ त्वं कथं प्रश्न इति तत्र ब्रवीमि ते । अथ सन् वा ह्यसन् वायमिति ते निश्चयः कुतः ॥ ३९ ॥ सत्यस्मिन् निश्चये भूयाच्छुभं सच्छ्रद्धयेह वै । सोऽपि लक्षणतः स्याच्चेच्छ्रद्धा लक्षणसङ्गता ॥ ४० ॥ (बंसी) पर विश्वास करनेवाली मछलियोंके समान नष्ट होनेका प्रसंग उपस्थित होगा। अतः सत्पुरुषोंपर ही श्रद्धा करे, किन्हीं भी असत्पुरुषोंपर नहीं ॥ ३४-३५ ॥ यह बात, असत्पुरुषोंपर श्रद्धा करनेसे जो नाशको प्राप्त हुए हैं और सत्पुरुषोंपर श्रद्धा करनेसे जो कल्याणके भागी हुए हैं, उन्हें सूचित करनेके लिये दृष्टान्तरूप है ॥ ३६ ॥ इसलिये पहले परखकर ही श्रद्धा करनी उचित है, अन्यथा नहीं। ऐसी स्थितिमें 'श्रद्धा किये बिना तुम्हारा व्यवहार कैसे हो सकता है' तुम्हारा यह प्रश्न कैसे सम्भव है ?" ॥ ३७ ॥ इस तरह पूछे जानेपर हेमलेखाने अपने प्रिय पतिसे पुनः कहा, “राजकुमार ! मैं जो बात कहती हूं वह सुनिये ॥ ३८ ॥ आपने जो कहा कि तुम्हारा प्रश्न कैसे हो सकता है, उसमें मेरा कथन यह है कि आप यह निश्चय कैसे करते हैं कि अमुक पुरुष अच्छा है या बुरा ॥ ३९ ॥ यह निश्चय हो जानेपर ही इस बातका निर्णय हो सकेगा कि सत्पुरुषमें श्रद्धा करनेसे ही हित हो सकता है। यदि कहें कि इसका निश्चय लक्षणोंसे होता है तब तो श्रद्धा लक्षणोंके अधीन हुई । [ अब यह प्रश्न होता है कि लक्षणोंका ज्ञान कैसे हो ? ] ॥ ४० ॥
८६ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे प्रमाणाल्लक्षणज्ञानमिति चेत्तत्र संशृणु । अश्रद्धस्य प्रमाणं किं भवेत्तत् सुनिरूप्यताम् ॥ ४१ ॥ अन्यथा हि प्रमाता नोऽविसंवाद्येत कुत्रचित् । तस्माच्छ्रद्धां समाश्रित्य लोकः सर्वः प्रवर्त्तते ॥ ४२ ॥ तत्प्रकारं प्रवक्ष्यामि शृणु निश्चलचेतसा । अनवस्थिततर्को वा ह्यतर्को वापि सर्वथा ॥ ४३ ॥ श्रेयो न प्राप्नुयाल्लोक इह वापि परत्र वा । तत्रातर्कस्य कालेन भवेच्छ्रेयः कदांचन ॥ ४४ ॥ अनवस्थिततर्कस्य न श्रेयः स्यात् कथञ्चन । पुरा सह्यगिरौ गोदावरीतीरे हि कौशिकः ॥ ४५ ॥ न्यवसच्छान्तसुमतिर्ज्ञातलोकः सतत्त्वकः । तस्य शिष्यास्तु शतशः स्थिता गुरुसमाश्रयात् ॥ ४६ ॥ यदि कहें कि लक्षणोंका ज्ञान [ शास्त्रवचन आदि ] प्रमाणसे हो सकता है, तो सुनिये। जिसे श्रद्धा है ही नहीं उसके लिये प्रमाण क्या हो सकता है—यह बताइये ॥ ४१ ॥ [ यदि आगमको ही विश्वसनीय प्रमाण न माना जाय, दूसरोंके कथनको भी प्रमाणरूप मान लें ] तबतो प्रमाताका कोई भी बात अवि- श्वसनीय नहीं जान पड़ेगी। अतः सब लोग श्रद्धाका आश्रय लेकर ही चल रहे हैं ॥ ४२ ॥ मैं आपको श्रेयःप्राप्तिका प्रकार समझाती हूँ, स्थिरचित्त होकर सुनिये। जो पुरुष शुष्क तर्क करता है और जो बिलकुल तर्क नहीं करता उसका इस लोक या परलोकमें कल्याण नहीं हो सकता ॥४३-४४ पू० ॥ उनमेंसे भी तर्क न करनेवालेका तो कभी कल्याण हो भी सकता है, परन्तु शुष्क तर्क करनेवालेका तो किसी प्रकार कल्याण होना सम्भव नहीं है ॥ ४४ उ०-४५ पू० ॥ पूर्वकालमें सह्यपर्वतकी ओर गोदावरीके तीरपर कौशिक मुनि रहते थे। वे बड़े शान्त, सुमति और संसारके रहस्य ( वास्तविक स्वरूप ) को जाननेवाले थे। अपने गुरुदेवका आश्रय पाकर उनके सैकड़ों शिष्य भी वहीं रहते थे ॥ ४५ उ०-४६ ॥
त एकदा गुरुमनुगता लोकस्य संस्थितिम् । निर्णेतुं बुद्धयनुगुणं तदा प्रोचुः परस्परम् ॥ ४७ ॥ तत्राजगाम शृङ्गाख्यो विप्रः कश्चिन्महाबुधः । स सर्वेषां मतं प्रोक्तं दूषयद् बुद्धिकौशलात् ॥ ४८ ॥ अश्रद्धया हतप्रज्ञो विवादनिपुणस्तदा । प्रमाणात् प्रमितं सत्यमित्युक्तेषु द्विजेष्वथ ॥ ४९ ॥ अनवस्थिततर्को वै प्राह तर्कैकसंश्रयः । शृङ्गाख्य आक्षिपन् सर्वान् तत्र वादकथान्तरे ॥ ५० ॥ विप्राः शृणुध्वं मद्वाक्यं सत्यं न क्वापि सिध्यति । प्रमितं यत् प्रमाणेन तत् सत्यमिति हीरितम् ॥ ५१ ॥ तत्र तेन दोषयुजा भवेदप्रमितं ननु । निश्चेतव्या ततस्त्वादौ प्रमाणानामदुष्टता ॥ ५२ ॥
एक दिन गुरुदेवकी अनुपस्थितिमें वे शिष्यगण संसारके स्व- रूपका निर्णय करनेके लिये आपसमें मिलकर अपनी-अपनी बुद्धिके अनुसार प्रतिपादन करने लगे ॥ ४७ ॥ इतने हीमें वहाँ शृङ्ग नामका एक बुद्धिमान् ब्राह्मण आया । उसने अपने बुद्धिकौशलसे उनके कहे हुए सभी मतोंको सदोष सिद्ध कर दिया ॥ ४८ ॥ शास्त्रोंपर श्रद्धा न होनेके कारण उसकी बुद्धि (विवेकशक्ति) नष्ट हो चुकी थी। तथापि विवाद (शुष्क तर्क) करनेमें वह बहुत कुशल था। जब शिष्योंने कहा कि जो बात प्रमाणसे सिद्ध हो वही सत्य है तो उस विचारगोष्ठीमें वह शुष्क तर्क करनेवाला शृङ्ग केवल तर्कका आश्रय लेकर बोला—॥ ४९-५० ॥ "ब्राह्मणो ! मेरी बात सुनो । आप लोगोंने कहा कि जो प्रमाणसे सिद्ध हो वह सत्य है । सो इस प्रकार तो सत्य कभी सिद्ध ही नहीं हो सकता ॥ ५१ ॥ क्योंकि यदि प्रमाण दोषयुक्त होगा तो उसके द्वारा होनेवाला निर्णय अप्रामाणिक होगा। इसलिये सबसे पहले तो प्रमाणोंकी निर्दोषताका निर्णय करना चाहिये ॥ ५२ ॥
८८ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे सा प्रमाणान्तरकृता तत्राप्येवं विचिन्त्यताम् । इत्येवमनवस्थानात् न किञ्चित् प्रमितं भवेत् ॥ ५३ ॥ अतः प्रमाता प्रमितं प्रमाणं वा न सिध्यति । तस्माच्छून्याश्रयो ह्येष विकल्पो विविधः स्थितः ॥ ५४ ॥ सोऽपि शून्यात्मतां प्राप्तः प्रमाणाविषयत्वतः । तस्माच्छून्यं न किञ्चित् स्यादित्येष प्रविनिर्णयः ॥ ५५ ॥ इति शुङ्गवचः श्रुत्वा तेषु केचिद् द्विजाधमाः । तं श्रिता निश्चयाभासं बभूवुः शून्यवादिनः ॥ ५६ ॥ विनाशमीयुस्तन्निष्ठाः शून्यभावं परं गताः । ये द्विजाः सारहृदयास्ते शुङ्गस्य प्रभाषितम् ॥ ५७ ॥ निरूप्य कौशिके तेन समाहितहृदोऽभवन् । तस्मात् मर्वात्मना त्यक्त्वा तर्कं तमनवस्थितम् ॥ ५८ ॥ और उस निर्दोषताका निश्चय होगा अन्य प्रमाणोंसे । फिर उन प्रमाणोंकी निर्दोषताके विषयमें भी इसी प्रकार विचार करना होगा । इस तरह अनवस्थाका प्रसंग उपस्थित होनेके कारण कुछ भी सिद्ध नहीं हो सकेगा ॥ ५३ ॥ अतः प्रमाता, प्रमेय और प्रमाण सिद्ध ही नहीं हो सकते । इसलिये यह जो अनेक प्रकारका आभास प्रतीत हो रहा है उसका आश्रय केवल शून्य ही है ॥ ५४ ॥ वह शून्य भी प्रमाणका विषय न होने के कारण शून्यरूप ( अभाव- मात्र ) ही है । अतः अन्तिम निर्णय यही है कि यह शून्य भी कुछ नहीं है” ॥ ५५ ॥ शुङ्गके ये वचन सुनकर उनमेंसे कुछ अधम ब्राह्मण उसीके इस आभासमात्र निर्णयको मानकर शून्यवादी हो गये । शून्यमें निष्ठा होनेके कारण वे स्वयं भी अत्यन्त शून्यभाव ( जडता ) को प्राप्त होकर नष्ट ही हो गये [ अपने वास्तविक स्वरूपकी प्राप्ति उन्हें नहीं हुई ] ॥ ५६-५७ पू० ॥ किन्तु जो शिष्य विचारशील थे उन्होंने शुङ्गका कथन कौशिक मुनिके आगे निवेदन किया और उनसे उन्हें उसका समाधान मिल गया ॥ ५७ उ०-५८ पू० ॥
षष्ठोऽध्यायः । ८६ सदा सदागमायत्ततर्कः श्रेयः समाप्नुयात् । इति प्रोक्तो हेमचूडः प्रिययात्यन्तधीरया ॥ ५९ ॥ पुनः पप्रच्छ चात्यन्तविस्मितस्तां महाशयाम् । अहो प्रिये ते वैदुष्यमीदृशं नाविदं पुरा ॥ ६० ॥ धन्यासि त्वमहञ्चापि धन्यो यस्त्वामुपागतः । ब्रवीषि श्रद्धया सर्वं श्रेयःसिद्धिर्हि तत् कथम् ॥ ६१ ॥ कुत्र श्रद्धा विधातव्या कुत्र वा सा न शस्यते । आनन्त्यादागमानां वै विरुद्धार्थसमाश्रयात् ॥ ६२ ॥ आचार्यमतभेदाच्च व्याख्यातृमतभेदतः । स्वबुद्धेरनवस्थानात् किमादेयं न वापि किम् ॥ ६३ ॥ यद्यस्याभिमतं तत् स वदत्येव सुनिश्चितम् । अन्यच्चाप्यव्यवसितं हानिप्रदमपि प्रिये ॥ ६४ ॥ इसलिये शुष्क तर्कको सर्वथा त्यागकर जो सर्वदा शास्त्रानुसारी तर्क करता है उसे ही कल्याणकी प्राप्ति होती है” ॥ ५८ उ०-५९ पू० ॥ अपनी अत्यन्त बुद्धिमती प्रियाके इस प्रकार कहनेपर हेम- चूडने अत्यन्त विस्मित होकर उस उदार हृदयवाली देवीसे पूछा ॥ ५६ उ०-६० पू० ॥ “अहो प्रिये ! तुममें इतनी विद्वत्ता है—यह बात मैं पहले नहीं जानता था । तुम धन्य हो और मैं भी धन्य हूँ, जिसे तुम्हारा सत्संग मिला । तुम कहती हो कि सम्पूर्ण श्रेयकी सिद्धि श्रद्धासे ही होती है, सो ऐसा कैसे हो ? ॥ ६० उ०-६१ ॥ कहाँ तो श्रद्धा करनी चाहिये और कहाँ उसे करना उचित नहीं है ? क्योंकि शास्त्र तो अनन्त हैं और उनके अभिप्रायोंमें भी विरोध है ॥ ६२ ॥ इसके सिवा आचार्योंमें भी मतभेद है, शास्त्रकी व्याख्या करने- वालोंके मत भी भिन्न-भिन्न हैं और अपनी बुद्धि भी सदा एक-सी नहीं रहती । अतः किस बातको स्वीकार किया जाय और किसे नहीं ? ॥६३॥ प्रिये ! जिस आचार्यको जो मत मान्य है उसे वह सर्वथा निश्चित रूपसे ही कहता है तथा अन्य सिद्धान्तोंको अनिश्चित एवं हानिप्रद भी बताता है ॥ ६४ ॥
६० त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे तत्रैवं सति नैवान्तं कश्चिदत्रापि गच्छति । यः शून्यमाह तत्त्वं सोऽप्यशून्यं दूषयेत् परम् ॥ ६५ ॥ अश्रद्धेयं कुतो वा तत् सङ्गतं चागमेन हि । एतद् ब्रूहि प्रिये सम्यग् न ह्येतत्तेऽस्त्यचिन्तितम् ॥६६॥ इति श्रीत्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे हेमचूडोपाख्याने श्रद्धाप्रशंसनं नाम षष्ठोऽध्यायः । ऐसी स्थितिमें अन्तिम निर्णयतक इन शास्त्रादिमें से भी कोई पहुँच नहीं पाता । जो शून्यको ही तत्त्व बताता है वह भी अपने विरोधी अशून्यको सदोष सिद्ध करता ही है ॥ ६५ ॥ उनका कथन भी उनके शास्त्रसे संगत है ही, अतः उसे भी अवि- श्वसनीय कैसे कहें ? इसपर तुमने विचार न किया हो—ऐसी बात है नहीं, इसलिये प्रिये ! मुझे यह अच्छी तरह समझाकर कहो” ॥ ६६ ॥ षष्ठ अध्याय समाप्त ।
सप्तमोऽध्यायः इति पृष्टा हेमलेखा भर्त्रा प्रियतरेण सा । प्रोवाच विदुषी सम्यग् विज्ञातलोकसंस्थितिः ॥ १ ॥ शृणु वक्ष्ये प्रियतम स्थिरशान्त समादरात् । मनो हि मर्कटप्रायमस्थिरं सर्वदैव तत् ॥ २ ॥ यत एवं महानर्थं प्राप्तवान् प्राकृतो जनः । चलन्मनः सर्वदुःखनिदानं दृष्टमेव हि ॥ ३ ॥ यतः सुषुप्तौ चलनाभावाद्बिन्दति वै सुखम् । तस्मान्मनः स्थिरीकृत्य शृणु यत्ते ब्रवीम्यहम् ॥ ४ ॥ अनादरेण श्रुतञ्च भवेदश्रुतसम्मितम् । अफलं स्यात्तदत्यन्तं यथा चित्रतरुश्रयः ॥ ५ ॥ सप्तम अध्याय ॥ ७ ॥ विचार, ईश्वर तथा निष्काम उपासनाके स्वरूपका निर्णय अपने प्रियतम पतिके इस प्रकार प्रश्न करनेपर संसारके स्वरूपको अच्छी तरह पहचाननेवाली विदुषी हेमलेखा कहने लगी ॥ १ ॥ "प्रियतम ! स्थिर और शान्तचित्त होकर आदरपूर्वक सुनिये । मैं आपके प्रश्नका उत्तर देती हूँ । यह मन बन्दरकी तरह है, सदा चंचल ही रहता है ॥ २ ॥ क्योंकि ऐसा है, इसलिये साधारण लोगोंको बड़े अनर्थोंमें फँस जाना पड़ता है। यह देखा ही गया है कि चंचल मन ही सारे दुःखों- की जड़ है ॥ ३ ॥ क्योंकि सुषुप्तिमें चंचलताका अभाव हो जानेके कारण ही सुखकी अनुभूति होती है । इसलिये मैं आपसे जो कुछ कहती हूँ मनको स्थिर करके सुनिये ॥ ४ ॥ जो बात अनादरपूर्वक सुनी जाती है वह न सुनी-सी ही होती है । चित्रमें बने हुए वृक्षके समान का कोई फल नहीं होता ॥ ५ ।
६२ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे अनवस्थिततर्कत्वमपहाय विनाशनम् । सत्तर्कमाश्रित्य जनः प्राप्नुयात् सुफलं द्रुतम् ॥ ६ ॥ सत्तर्कसंश्रयेणाशु साधनैकपरो भवेत् । सत्तर्कजनितां श्रद्धां प्राप्येह फलभाङ् नरः ॥ ७ ॥ अनवस्थिततर्कन्तं विहायालोकय प्रिय । प्रवृत्तिमेतां जगतः श्रद्धया फलशालिनीम् ॥ ८ ॥ सुतर्कितेन कालेन कर्षकः क्ष्मां विकर्षति । श्रद्धयैव तथा रूप्यस्वर्णरत्नौषधादिकम् ॥ ९ ॥ व्यवस्यन्ति सुतर्केण त्यक्त्वा तर्कानवस्थितिम् । तस्मात् सुतर्कश्रद्धाभ्यां व्यवस्य श्रेय आत्मनः ॥ १० ॥ प्रयतेत साधनाय नहि तर्कानवस्थितेः । विरमेत् पौरुषायत्नाच्छृङ्गाद्यनुगनरा इव ॥ ११ ॥ मनुष्य इस विनाशकारी शुष्क तर्कको त्यागकर सत् (शास्त्रानुसारी) तर्कका आश्रय लेनेसे तत्काल ही उत्तम फल प्राप्त कर सकता है ॥ ६ ॥ इसलिये शास्त्रानुसारी तर्कका आश्रय लेकर उसे साधनमें ही लग जाना चाहिये । मनुष्य शास्त्रानुसारी तर्कसे उत्पन्न होनेवाली श्रद्धाको पाकर इस लोकमें फलका भागी हो सकता है ॥ ७ ॥ प्रिय ! आप निराधार तर्कको त्यागकर देखिये, इस जगत्का सारा व्यवहार श्रद्धा होनेपर ही फलदायक होता है ॥ ८ ॥ विचारपूर्वक निश्चय किये हुए कालमें ही किसान भूमि जोतता है । तथा निराधार शुष्क तर्कको त्यागकर सम्यक् विचारसे श्रद्धाके द्वारा ही लोग चाँदी, सोने, रत्न और ओषधि आदिका निश्चय करते हैं ॥ ९-१० पू० ॥ अतएव शास्त्रानुसारी तर्क और श्रद्धाके द्वारा अपने परम हितका निर्णय कर साधनके लिये प्रयत्न करना चाहिये । तर्ककी कोई स्थिति नहीं है, अतः शृंगका अनुसरण करनेवाले पुरुषोंकी तरह अपना पुरुषार्थ न छोड़ बैठे ॥ १० उ०-११ ॥
सप्तमोऽध्यायः । ६३ श्रद्धया पौरुषपरो न विहन्यते सर्वथा । दृढं पौरुषमाश्रित्य न प्राप्येत कथं फलम् ॥ १२ ॥ पौरुषात् कर्षका धान्यं वणिजो धनमेव च । राज्यलक्ष्मीं नृपा विप्रा विद्यां सर्वसुखाश्रयाम् ॥ १३ ॥ शूद्रा भृतिं सुधां देवास्तापसा लोकमुत्तमम् । प्रापुरन्येऽप्यभिमतं पौरुषेणैव कर्मणा ॥ १४ ॥ अनवस्थिततर्केणाश्रद्धेन पुरुषेण किम् । कदा किञ्चित् कथं प्राप्तं फलं वद विमृश्य तत् ॥ १५ ॥ क्वचित् फलविसंवादात् सर्वत्राश्वासवर्जने । विजानीयाद्विहतं तं स्वात्मरिपुरूपिणम् ॥ १६ ॥ अतः पौरुषमाश्रित्य श्रद्धासत्तर्कपोषितम् । श्रेयसां यन्मुख्यतमं साधनं तत् समाश्रयेत् ॥ १७ ॥ जो श्रद्धापूर्वक प्रयत्नमें लगा रहता है वह कभी असफल नहीं रह सकता। सुदृढ पुरुषार्थका आश्रय ले लेनेपर फिर फल कैसे प्राप्त न होगा ॥ १२ ॥ पुरुषार्थसे ही कृषक अनाज, व्यापारी धन, राजा लोग राजवैभव, ब्राह्मण लोग सम्पूर्ण सुखकी आश्रयभूता विद्या, शूद्र आजीविका, देवता अमृत और तपस्वी उत्तम लोक प्राप्त करते हैं। तथा और सबको भी पुरुषार्थरूप कर्मके द्वारा ही अपने अभीष्टकी प्राप्ति होती है ॥१३-१४॥ आप विचारकर बतलाइये कि शुष्कतर्क करनेवाले श्रद्धाहीन पुरुषने क्या कभी किसी प्रकार कोई फल प्राप्त किया है ॥ १५ ॥ [ दैवयोगसे ] कभी फल न मिलनेके कारण यदि किसीका सर्वत्र ही विश्वास न रहे तो उस अभागे पुरुषको अपना ही शत्रु समझना चाहिये ॥ १६ ॥ अतएव पुरुषार्थका आश्रय लेकर जो श्रद्धा और सत्तर्कसे पोषित, श्रेयःप्राप्तिका सबसे मुख्य साधन हो उसका आश्रय ले ॥ १७ ॥
६४ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे तत्र दृष्टसाधनानां वैचित्र्यञ्च पृथग्विधम् । तेषु यत् सर्वथा साध्यं साधयेत् तद्धि मुख्यकम् ॥ १८ ॥ तत् सुतर्कानुभूतिभ्यां व्यवस्याशु समारभेत् । तत्ते सर्वं प्रवक्ष्यामि सावधानः शृणुष्व तत् ॥ १९ ॥ श्रेयस्तद्धि विजानीयाद्यस्माद् भूयो न शोचति । शोकः सर्वत एव स्याद् दृश्यते सूक्ष्मया दृशा ॥ २० ॥ यच्छोकैरनुसंभिन्नं न तच्छ्रेयो हि सर्वथा । धनं पुत्रास्तथा दारा राज्यं कोशो बलं यशः ॥ २१ ॥ विद्या बुद्धिर्दर्शनञ्च देहः सौन्दर्यसम्पदः । सर्वमेतदस्थिरत्वात् कालसर्पमुखस्थितम् ॥ २२ ॥ शोकाङ्कुरमहाशक्तिबीजात्मकतया स्थितम् । कुत आत्यन्तिकश्रेयःसाधनत्वं समर्हति ॥ २३ ॥ अतः परमकं श्रेय एतद्वै मुख्यतो भवेत् । जो साधन देखनेमें आते हैं उनमें कई प्रकारकी विलक्षणता है। उनमेंसे जिसके द्वारा अपने लक्ष्यकी प्राप्ति सुलभ जान पड़े उसे ही अपना मुख्य साधन समझे ॥ १८ ॥ शास्त्रानुसारी तर्क और अनुभवके द्वारा उसका निश्चय करके तुरन्त आरम्भ कर दे। यह सब रहस्य मैं आपको बतलाती हूँ, आप सावधान होकर सुनें ॥ १९ ॥ श्रेय उसीको समझना चाहिये जिसकी प्राप्ति होनेपर फिर किसी प्रकारका शोक न रहे। यदि सूक्ष्म दृष्टिसे विचार करें तो इस संसारमें सभी ओर शोक दिखायी देता है। और जो शोकसे मिला हुआ है वह किसी प्रकार भी श्रेय नहीं हो सकता ॥ २०-२१ पू० ॥ धन, पुत्र, स्त्री, राज्य, कोश, बल, कीर्ति, विद्या, बुद्धि, रूप, शरीर और सुन्दरता—ये सभी अस्थिर होनेके कारण कालरूपी सर्पके मुखमें स्थित हैं तथा शोकरूप अंकुरके अत्यन्त शक्तिशाली बीजरूपसे विद्य- मान हैं। इनमें आत्यन्तिक श्रेयकी साधनता कैसे मानी जा सकती है ? ॥ २१ उ०-२३ ॥ अतः जो परम श्रेय है उसका मुख्य साधन तो यही है [ जो
सप्तमोऽध्यायः । ६५ एवं धनादिविषये यदादेयत्वविभ्रमः ॥ २४ ॥ मोहादेव समुद्भूतो मोहको हि महेश्वरः । यो हि सर्वजगत्कर्त्ता तस्मात् सर्वे हि मोहिताः ॥ २५ ॥ मोहयत्यल्पकोऽपीह विद्याभागसमाश्रयात् । कांश्चिदेव न सर्वान् स यस्माद्विद्या हि सा मिता ॥ २६ ॥ अल्पविद्यं मायिनञ्चाप्यनुत्क्रान्ता जना यतः । महादेवं महामायं कः समुत्क्रान्तुमर्हति ॥ २७ ॥ यो हि लोकेऽल्पमायाञ्च जानाति प्रतिविद्यया । स मोहान्निर्गतः स्वस्थः सुखमाप्नोत्यनश्वरम् ॥ २८ ॥ एवंविधापि विद्या तमनाश्रित्य तु मायिनम् । न लभ्या सर्वथा यावदप्रसाद्य तु सर्वथा ॥ २९ ॥ आगे बताया जाता है ]—लोकमें जो धनादि विषयमें उपादेयताका भ्रम है वह मोहसे ही हुआ है और मोहमें डालनेवाले हैं महेश्वर, जो सम्पूर्ण जगत्की रचना करनेवाले हैं। इसीसे सब लोग मोहमें पड़े हुए हैं ॥ २४-२५ ॥ एक तुच्छ ऐन्द्रजालिक भी अपनी आंशिक विद्याके बलसे किन्हीं- किन्हीं लोगोंको मोहमें डाल देता है, किन्तु सबको नहीं, क्योंकि उसकी विद्या सीमित है ॥ २६ ॥ तथापि जब साधारण लोग इस सीमित विद्यावाले मायावीकी मायाका भी पार नहीं पा सकते तो महामायावी महेश्वरका पार पानेमें कौन समर्थ हो सकता है ॥ २७ ॥ जो विरोधी विद्याके द्वारा इस लोकमें मायावीकी तुच्छ मायाको रोकनेकी युक्ति जान लेता है वह उसके जालसे निकलकर स्वस्थ (मायाजनित सर्पादिके भयसे रहित) रह सकता है और उसे अविनाशी (मायाजनित सर्पादिके भयसे नष्ट न होनेवाला) सुख प्राप्त होता है ॥ २८ ॥ किन्तु ऐसी विद्या भी उस ऐन्द्रजालिकका आश्रय लिये बिना और [धनादि देकर] उसे किसी भी प्रकार प्रसन्न किये बिना प्राप्त नहीं हो सकती ॥ २६ ॥
६६ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे तस्मान्महामायिनं तमप्रसाद्य कथं भवेत् । महामोहस्य तरणं तस्मात्तं सर्वथाश्रयेत् ॥ ३० ॥ यस्तं प्रसादयेत् सम्यक् प्राप्य तस्य प्रसादतः । महाविद्यां स तन्मोहाद् ध्रुवमुत्क्रान्तिमेष्यति ॥ ३१ ॥ अन्येऽपि योगाः कथिताः श्रेयःसाधनकर्मणि । महेश्वरप्रसादात्ते विना न स्युः फलाप्तये ॥ ३२ ॥ तस्मादाराधयेदादौ महेशं विश्वकारणम् । भक्त्या स साधयेदाशु योगान्मोहविनाशनान् ॥ ३३ ॥ एतज्जगत् कार्यभूतं प्रत्यक्षं परिदृश्यते । सांशमेवं पृथिव्याद्यमदृष्टारम्भमप्यलम् ॥ ३४ ॥ कार्यं स्यादिति तर्केण बह्वागमदृढेन तु । व्यवस्येत्तत्र कर्त्तारं सर्वकर्तृविलक्षणम् ॥ ३५ ॥ अतः उन महामायी महेश्वरको बिना प्रसन्न किये इस महामोहसे कोई कैसे पार पा सकता है। इसलिये सब प्रकार उनका ही आश्रय लेना चाहिये ॥ ३० ॥ जो उन्हें अच्छी तरह प्रसन्न कर लेता है वह उनकी कृपासे महा- विद्या ( अद्वितीय शिवात्मज्ञान ) को प्राप्त कर निश्चय ही उस मोहको पार कर लेता है ॥ ३१ ॥ श्रेयःसाधनके लिये प्राणायामादि और भी कई प्रकारके योग शास्त्रोंमें बतलाये गये हैं, परन्तु श्रीमहेश्वरकी कृपाके बिना वे फलकी प्राप्ति करानेवाले नहीं होते ॥ ३२ ॥ इसलिये सबसे पहले विश्वके आदि कारण श्रीमहेश्वरकी भक्ति- पूर्वक आराधना करनी चाहिये । वे शीघ्र ही मोहकी निवृत्ति करनेवाले योगोंको सफल कर देते हैं ॥ ३३ ॥ यह सारा जगत् प्रत्यक्ष ही किसीका कार्य जान पड़ता है । यद्यपि किसीने इसकी उत्पत्ति देखी नहीं है, तथापि सावयव होनेके कारण पृथ्वी आदि हैं ऐसे ( उत्पन्न होनेवाले ) ही ॥ ३४ ॥ इसप्रकार अनेकों शास्त्रवाक्योंसे परिपुष्ट तर्कके द्वारा ये कार्य ही हैं—ऐसा निश्चय करे । तथा इसका कर्त्ता अन्य सब कर्त्ताओंसे विलक्षण है ॥ ३५ ॥
२. अध्याय ६-१०: चिति-शक्ति स्वरूप, जगत्-मिथ्यात्व एवं अष्टावक्र-जनक संवाद
सप्तमोऽध्यायः । ६७ यद्यप्यकर्त्तृकं लोकमाह कश्चिदिहागमः । तदनेकैरागमैस्तु तर्करूढैः सुबाधितम् ॥ ३६ ॥ यत्रात्मनाश एवार्थः प्रत्यक्षैकसमाश्रयात् । तदागमाभासमेव न तद्धि महदाश्रयम् ॥ ३७ ॥ शुष्कतर्कैकसंकॢप्तं शास्त्रं तन्त्याज्यमेव हि । अन्यैरप्युच्यते कैश्चिज्जगदेतत् सनातनम् ॥ ३८ ॥ अबुद्धिमत्कर्त्तृकं चेत्येतच्चाप्यसमञ्जसम् । क्रियाया बुद्धिपूर्वत्वादबुद्धौ तददर्शनात् ॥ ३९ ॥ बह्वागमोपष्टम्भाच्च कर्तात्र स्याद्धि बुद्धिमान् । बुद्धिमत्कर्त्तृकं कार्यं सर्वत्रैव हि दर्शनात् ॥ ४० ॥ एवं सत्तर्कागमाभ्यां जगदेतत् सकर्त्तृकम् । स कर्त्ता लौकिकेभ्यस्तु कर्त्तृभ्यः स्याद्विलक्षणः ॥ ४१ ॥ यद्यपि कोई-कोई शास्त्र इसे बिना किसी कर्ताके स्वयं ही उत्पन्न हुआ बतलाते हैं, किन्तु यह बात अनेकों युक्तिप्रधान शास्त्रवाक्योंसे सर्वथा बाधित हो जाती है ॥ ३६ ॥ जो [ चार्वाक आदि ] दर्शन केवल प्रत्यक्ष प्रमाणके ही बलपर आत्मनाश ( मृत्यु ) को ही पुरुषार्थ ( मोक्ष ) मानते हैं वे तो वास्तवमें [ दर्शन नहीं ] दर्शनाभास ही हैं। महापुरुष उन्हें कभी आश्रय नहीं देते । ऐसे शुष्क तर्क द्वारा कल्पना किये हुए शास्त्र त्यागने योग्य ही हैं ॥ ३७-३८ पू० ॥ कोई दार्शनिक कहते हैं कि यह संसार सदासे ऐसा ही है । यह किसी बुद्धिमान् ( ईश्वरादि चेतन ) की रचना नहीं है। यह बात भी ठीक नहीं है, क्योंकि क्रिया बुद्धिपूर्वक ही होती है, बुद्धिके विना कोई भी क्रिया नहीं देखी जाती ॥ ३८ उ०-३९ ॥ अनेकों शास्त्रोंके आधारसे भी इस लोकरचनामें बुद्धिमान् कर्ता ही सिद्ध होता है । तथा सभी जगह कोई भी कार्य बुद्धिमान् कर्ताके द्वारा ही होता देखा जाता है ॥ ४० ॥ इस प्रकार तर्क और शास्त्रके द्वारा यह जगत् किसी कर्ताका ही कार्य है । और वह कर्ता सारे लौकिक कर्ताओंसे विलक्षण ही है ॥ ४१ ॥ १. चार्वाक आदि नास्तिक दर्शन ।
६८ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे कार्यस्याचिन्त्यरूपत्वादचिन्त्यानन्तशक्तिकः । अपरिच्छिन्नसामर्थ्यः कार्यस्यानुगुणत्वतः ॥ ४२ ॥ स प्रपन्नान् समुद्धर्तुं प्रभवत्येव सर्वथा । अतस्तं सर्वभावेन शरणीकुरु सर्वदा ॥ ४३ ॥ निदर्शनं तेऽभिधास्ये शृणु प्रत्ययकारणम् । मितेश्वरोऽप्यत्र लोके चाकापट्यात् प्रसादितः ॥ ४४ ॥ सर्वात्मना योजयति स्वेष्टार्थैः श्रेयसे नरम् । एष लोकेश्वरो देवः सम्यग् येन प्रसादितः ॥ ४५ ॥ तस्मै किं न दिशेद् ब्रूहि भक्तलोकैकवत्सलः । पुरुषा हीश्वरा लोके चानवस्था अवत्सलाः ॥ ४६ ॥ निर्दयाश्च कृतघ्नाश्च तस्मात् तत् फलमस्थिरम् । परमेशो दयासिन्धुः कृतज्ञः सुव्यवस्थितः ॥ ४७ ॥ यह जगत्-रूप कार्य अचिन्त्य है [ इसका वास्तविक स्वरूप किसीकी समझमें नहीं आता ]। इसलिये इसका कर्ता भी अचिन्त्य और अनन्त शक्तिवाला होना चाहिये। तथा अपने इस कार्यके अनुसार उसका सामर्थ्य असीम होना चाहिये ॥ ४२ ॥ वह अपने शरणागतोंका उद्धार करनेमें सर्वथा समर्थ है ही। अतः आप सर्वदा सम्पूर्ण भावसे उनकी शरण लें ॥ ४३ ॥ आपके विश्वासके लिये मैं आपको एक दृष्टान्त देती हूँ। संसारमें जो सीमित ऐश्वर्यवाले स्वामी हैं वे भी अपने सेवकके निष्कपट-भावसे प्रसन्न होनेपर अपनी पूरी शक्तिसे उसे अभीष्ट पदार्थ प्राप्त करानेका प्रयत्न करते हैं ॥ ४४-४५ पू० ॥ ये भगवान् तो सम्पूर्ण लोकोंके स्वामी हैं और अपने भक्तोंपर इनका पूर्ण वात्सल्य है। फिर जो इन्हें प्रसन्न करले, बताइये, उसे ये क्या नहीं दे सकते ? ॥ ४५ उ०-४६ पू० ॥ संसारमें जो ऐश्वर्यवान् पुरुष हैं वे तो अस्थिर, स्नेहशून्य, निर्दय और कृतघ्न हैं। इसलिये उनसे जो फल मिलता है वह ठहरनेवाला नहीं होता। किन्तु भगवान् तो दयाके समुद्र, किये हुएको बहुत मानने- वाले और सुव्यवस्थित हैं। [ अतः उनसे जो फल प्राप्त होता है उसका कभी नाश या क्षय नहीं होता ] ॥ ४६ उ०-४७ ॥
सप्तमोऽध्यायः । ६६ अन्यथानादिसंसारे कुतोऽनिन्द्यत्वमाप्नुयात् । न्यवस्थिता जगद्धात्रा चापि वा स्यात् कथं वद ॥ ४८ ॥ अनवस्थस्य राज्यन्तु नष्टमालोक्यते यतः । तस्मादेव दयासिन्धुः सुव्यवस्थश्च कीर्त्तितः ॥ ४९ ॥ तमेव सर्वभावेन भक्त्याशु शरणीकुरु । श्रेयसि त्वां योजयेत् स त्वं न तत्परतां व्रज ॥ ५० ॥ उपासने बहुविधमार्त्यार्थित्वतोऽपि च । निर्हेतुकन्तु काचित्कं तत् सत्योपासनं भवेत् ॥ ५१ ॥ दृष्टमेतत् सर्वतो वै चार्त्तेनोपासितः प्रभुः । कदाचिद् दयाविष्ट आर्त्तिं तस्य विमोचयेत् ॥ ५२ ॥ उपेक्षेत कदाचिद्धोपास्तेर्वै तारतम्यतः । एवमेवार्थार्थिनोऽपि मितञ्चानियतं फलम् ॥ ५३ ॥ यदि ऐसा न होता तो बताइये इस अनादि संसार में वह कैसे अनिन्दित रहते, तथा उन जगत्कर्ताकी की हुई यह लोकव्यवस्था किस प्रकार नियमित रहती ॥ ४८ ॥ क्योंकि यह देखा जाता है कि जिसकी व्यवस्था ठीक नहीं होती उसका राज्य नष्ट हो जाता है। इसलिये भगवान् दयाके सागर और सुव्यवस्थित कहे जाते हैं ॥ ४९ ॥ अतः सम्पूर्ण भक्तिभावसे आप उनकी शरण ग्रहण करें। वे ही आपको श्रेयः-साधनमें लगा देंगे। आपको साधन ढूँढ़नेके पछड़ेमें पड़नेकी आवश्यकता नहीं है ॥ ५० ॥ उपासनामें आर्त्ति और अर्थिताके निमित्तसे भी अनेकों भेद हैं। निष्काम उपासना तो विरलोंकी ही होती है। किन्तु है वही सच्ची उपासना ॥ ५१ ॥ सब ओर प्रायः यही देखा जाता है कि आर्त्त (संकटग्रस्त) पुरुष प्रभुकी उपासना करता है। अतः भगवान् कभी तो दयाके वशीभूत होकर उसका कष्ट दूर कर देते हैं ॥ ५२ ॥ और कभी उपासनामें त्रुटि रह जानेपर उपेक्षा भी कर देते हैं। इसी प्रकार अर्थार्थी उपासकोंको मिलनेवाला फल भी सीमित और अनि- श्चित ही होता है ॥ ५३ ॥