त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६८ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे कार्यस्याचिन्त्यरूपत्वादचिन्त्यानन्तशक्तिकः । अपरिच्छिन्नसामर्थ्यः कार्यस्यानुगुणत्वतः ॥ ४२ ॥ स प्रपन्नान् समुद्धर्तुं प्रभवत्येव सर्वथा । अतस्तं सर्वभावेन शरणीकुरु सर्वदा ॥ ४३ ॥ निदर्शनं तेऽभिधास्ये शृणु प्रत्ययकारणम् । मितेश्वरोऽप्यत्र लोके चाकापट्यात् प्रसादितः ॥ ४४ ॥ सर्वात्मना योजयति स्वेष्टार्थैः श्रेयसे नरम् । एष लोकेश्वरो देवः सम्यग् येन प्रसादितः ॥ ४५ ॥ तस्मै किं न दिशेद् ब्रूहि भक्तलोकैकवत्सलः । पुरुषा हीश्वरा लोके चानवस्था अवत्सलाः ॥ ४६ ॥ निर्दयाश्च कृतघ्नाश्च तस्मात् तत् फलमस्थिरम् । परमेशो दयासिन्धुः कृतज्ञः सुव्यवस्थितः ॥ ४७ ॥ यह जगत्-रूप कार्य अचिन्त्य है [ इसका वास्तविक स्वरूप किसीकी समझमें नहीं आता ]। इसलिये इसका कर्ता भी अचिन्त्य और अनन्त शक्तिवाला होना चाहिये। तथा अपने इस कार्यके अनुसार उसका सामर्थ्य असीम होना चाहिये ॥ ४२ ॥ वह अपने शरणागतोंका उद्धार करनेमें सर्वथा समर्थ है ही। अतः आप सर्वदा सम्पूर्ण भावसे उनकी शरण लें ॥ ४३ ॥ आपके विश्वासके लिये मैं आपको एक दृष्टान्त देती हूँ। संसारमें जो सीमित ऐश्वर्यवाले स्वामी हैं वे भी अपने सेवकके निष्कपट-भावसे प्रसन्न होनेपर अपनी पूरी शक्तिसे उसे अभीष्ट पदार्थ प्राप्त करानेका प्रयत्न करते हैं ॥ ४४-४५ पू० ॥ ये भगवान् तो सम्पूर्ण लोकोंके स्वामी हैं और अपने भक्तोंपर इनका पूर्ण वात्सल्य है। फिर जो इन्हें प्रसन्न करले, बताइये, उसे ये क्या नहीं दे सकते ? ॥ ४५ उ०-४६ पू० ॥ संसारमें जो ऐश्वर्यवान् पुरुष हैं वे तो अस्थिर, स्नेहशून्य, निर्दय और कृतघ्न हैं। इसलिये उनसे जो फल मिलता है वह ठहरनेवाला नहीं होता। किन्तु भगवान् तो दयाके समुद्र, किये हुएको बहुत मानने- वाले और सुव्यवस्थित हैं। [ अतः उनसे जो फल प्राप्त होता है उसका कभी नाश या क्षय नहीं होता ] ॥ ४६ उ०-४७ ॥